कोरोना वायरस: विमान कंपनियाँ क्या टेक ऑफ़ कर पाएंगी?

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनिया भर में जारी कोरोना महामारी का बड़ा असर उड्डयन क्षेत्र पर पड़ा है और भारत भी इससे अछूता नहीं.
भारत की घरेलू विमान कंपनी इंडिगो ने मौजूदा स्थिति को 'युद्ध' के समान बताया है.
सेंटर फ़ॉर एविएशन यानी कापा का अनुमान है कि इससे विमानन क्षेत्र को 3.3 अरब डॉलर से 3.6 अरब डॉलर तक का नुक़सान होगा. साथ ही कोरोना महामारी की वजह से बिगड़ी आर्थिक परिस्थिति का असर इस क्षेत्र की 29 लाख नौकरियां भी ख़तरे में हैं.
पिछले दिनों ब्रिटेन की विमान कंपनी ब्रिटिश एयरवेज़ ने आने वाले दिनों में 12 हज़ार नौकरियों को ख़त्म करने की घोषणा की थी.
भारत में बाक़ी सेक्टर्स की तरह विमानन क्षेत्र के लिए भी लॉकडाउन बिना किसी चेतावनी के लागू कर दिया गया. लॉकडाउन लागू होने के बाद 24 मार्च आधी रात के बाद से न सिर्फ़ सैकड़ों प्लेन एयरपोर्ट पर खड़े हैं बल्कि हवाई जहाज़ कंपनियों को आगे की बुकिंग के रिफंड का नुक़सान भी उठाना पड़ा है.
प्राइवेट एयरपोर्ट्स पर टेक-ऑफ़-लैंडिंग्स फ़ी, रिटेल और ड्यूटी-फ्री शॉप्स की बिक्री जैसी कमाई भी बंद है. हवाई अड्डों पर फ़िलहाल या तो सिर्फ़ पार्किंग में खड़े विमानों और दूसरे उपकरणों की देख-रेख का काम जारी है, या वहां से कुछ मालवाहक हवाई जहाज़ समय-समय पर उड़ान भर रहे हैं.
व्यापक असर

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विमानन और हवाई यात्रा के क्षेत्र में काम करनेवाले संगठन सेंटर फ़ॉर एशिया पैसिफ़िक एविएशन का कहना है कि कोविड-19 से उपजे संकट का असर भारतीय विमानन क्षेत्र के ट्रैफ़िक, नए विमानों की ख़रीदी और टिकटों के दाम पर बड़े पैमाने पर होगा.
ये भी हो सकता है कई एयरलाइंस बंद हों या उनका विलय हो जाए.
भारतीय विमानन क्षेत्र की देख-रेख करने वाले संगठन नागरिक उड्डयन महानिदेशालय ने गृह मंत्रालय के नए ऑर्डर के बाद तमाम उड़ानों को 17 मई तक के लिए रद्द कर दिया है.
गृह मंत्रालय ने शनिवार को 3 मई को ख़त्म होनेवाले लॉकडाउन को दो हफ़्ते और आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया है.
डीजीसीए के डिप्टी डायरेक्टर जनरल सुनील कुमार ने भारत से उड़ान भरनेवाली तमाम देसी और विदेशी विमानन कंपनियों को कहा है कि उड़ानों के बारे में उन्हें उचित समय पर सूचित किया जाएगा.

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3 मई को ख़त्म हो रहे लॉकडाउन को सरकार ने दो सप्ताह के लिए आगे बढ़ा दिया है. साथ ही कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या के आधार पर पूरे देश को कई ज़ोन - ग्रीन, रेड, ऑरेंज में बांट दिया है.
विमानन क्षेत्र के जानकार अश्विनी फडणीस कहते हैं कि उड़ान की इजाज़़त मिलने के बाद भी चीज़ों को सामान्य होने में ख़ासा वक़्त लगेगा और विमानन कंपनियों को फ़्लाइट-प्लान व्यावसायिक आधार पर नहीं बल्कि सरकार के कहे मुताबिक़ करना होगा.
उदाहरण के तौर पर गुड़गांव जानेवाला पैसेंजर दिल्ली एयरपोर्ट तक पहुंचकर करेगा भी क्या, क्योंकि दिल्ली से गुड़गांव की सड़क बंद की हुई है.
और इस बात की भी आशंका रहेगी कि हवाई अड्डे पर उतरने के बाद फिर से क्वारंटाइन में भेजे जा सकते हैं तो कम से कम वैसी स्थिति में 'बिज़नेस ट्रैवेलर्स' (व्यावसायिक कामों से उड़ान भरनेवाले) उड़ानों से परहेज़ करेंगे.
विमानन क्षेत्र हो या होटल इंडस्ट्री बिज़नेस ट्रैवेलर्स लगातार कमाई करवानेवाला ग्रुप माना जाता है.
क्या होगा जब शुरू होगी विमान यात्रा

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अश्विनी फडणीस कहते हैं, "उड़ान की इजाज़त मिलने के फ़ौरन बाद शुरुआती दिनों में पैसेंजर काफ़ी मिलेंगे क्योंकि बहुत सारे लोग जगह-जगह पर फंसे हुए हैं और वो अपने ठिकानों पर पहुंचना चाहते हैं."
डीजीसीए के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक़ मार्च माह में पिछले साल के मुक़ाबले पैसेंजर ट्रैफ़िक में 33 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
अप्रैल-जून का महीना भारतीय नागरिक विमानन क्षेत्र के लिए बेहतर माना जाता है लेकिन इस बार वो अधिकांश हिस्सों में बंद ही है.

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एयर इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक और लेखक जितेंद्र भार्गव कहते हैं "सोशल डिस्टेंसिंग के कारण इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि फ़्लाइट्स की मिडिल सीट - यानी हर तीन सीटों के बीच की एक सीट को ख़ाली रखा जाए, साथ ही हर कुछ क़तार के बाद भी कुछ सीटों को पूरी तरह ख़ाली रखा जाए ताकि किसी की तबियत बिगड़ने की सूरत में उनका इस्तेमाल किया जा सके - लेकिन इनका मतलब होगा लोड-फ़ैक्टर का (यानी एक फ़्लाइट की कितनी सीटें भरी हैं) कम होना जिसका असर कंपनियों की बैलेंस-शीट पर होगा."
1990 के दशक से जब से बेहतरी-और-कर्मठता के नाम पर ज़ोर-शोर से इस क्षेत्र का निजीकरण शुरु हुआ, तब से भारतीय नागरिक उड्डयन क्षेत्र कभी संकटकाल से उबर नहीं पाया है और एक के बाद एक हवाई जहाज़ कंपनियों पर ताला लगा है.
पिछले साल ही तब की टॉप विमान कंपनी मानी जानेवाली जेट एयरवेज़ बंद हुई. उसके बंद होने और तेल के दामों के गिरावट का फ़ायदा प्राइवेट एयरलांइस को हो सकता था लेकिन तभी कोरोना महामारी का संकट सिर पर आ गया.
बढ़ सकती है टिकटों की क़ीमतें

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जितेंद्र भार्गव कहते हैं कि भारतीय कंपनियाँ 92 फ़ीसदी तक सीट लोड फ़ैक्टर से काम चलाती थीं लेकिन अब उसमें से अगर 40 फ़ीसदी कम करने को कहा जाएगा तो फिर उसे धंधे में बने रहने के लिए टिकट की क़ीमतें बढ़ानी होंगी.
भारतीय पैसेंजर पहले से ही क़ीमतों को लेकर बहुत संवेदनशील रहा है और फ़िलहाल तो मंदी के हालात बनते दिख रहे हैं.
जितेंद्र भार्गव ने 'डिसेंट ऑफ़ एयर इंडिया' नाम की किताब भी लिखी है जो ख़ूब चर्चित रही.
उनके मुताबिक़, "सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से और कई तरह के बदलाव होंगे- एयरपोर्ट में घुसने से लेकर ठिकाने तक पहुंचने में पैसेंजर को कम से कम पांच या छह लोगों से डील करना होता है (सीआईएसएप, चेक-इन काउंटर, बैगेज - यानी सामान देना, विमान के अंदर एयर होस्टेस और फिर ठिकाने पर बैग कलैक्ट करना) इन सब पर भी क्षेत्र से जुड़े लोगों को फ़िक्र करनी होगी."
अश्विनी फडणीस कोविड-19 से उपजी स्थिति की तुलना 9/11 के बाद से करते हैं जब नए सुरक्षा नियमों को लागू होने और पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में महीनों लग गए थे.
समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग ने स्पाइसजेट एयरलाइंस के चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर अजय सिंह के हवाले से कहा है कि ये सही समय है कि विमानन क्षेत्र में बदलाव लाया जाए.
उन्होंने विमान में इस्तेमाल होने वाले ईंधन और एविएशन टर्बाइन ईंधन को जीएसटी के भीतर लाने के साथ-साथ जिस आधार पर एयरपोर्ट या उससे जुड़े कामों के ठेके दिए जाते हैं, उनमें भी बदलाव की मांग की है.
उन्होंने तेल के टैंकों का उदाहरण देते हुए कहा कि इसे दिल्ली में बनाने में 25 करोड़ रुपए का ख़र्च आता है, जिसका इस्तेमाल एयरलाइंस करती हैं, लेकिन एयरपोर्ट ऑपरेटर को इससे सालाना 450 करोड़ की कमाई होती है.

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कापा ने भी सरकार से क्षेत्र के लिए नक़द की मदद के अलावा एयरपोर्ट चार्जेस में छूट का मशविरा दिया है.













