भारत में कोरोना वायरस से कम मौतों का रहस्य क्या है?

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- Author, सौतिक विश्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोविड-19 की चपेट में आए दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत में इस संक्रमण से काफी कम लोगों की मौत हुई है. इसकी खूब चर्चा हो रही है. कुछ लोग इतनी कम मृत्यु दर के रहस्य पर बात कर रहे हैं तो कुछ का कहना है कि भारत कोरोना वायरस की घातक मार से खुद को बचाने में कामयाब दिख रहा है. कुछ लोग कोरोनावायरस के ग्लोबल हॉटस्पॉट्स की तुलना में प्रमुख भारतीय शहरों में कम मौतों पर सवाल कर रहे हैं.
भारत में कोविड-19 संक्रमण का पहला पॉजिटिव केस दो महीने पहले रिकॉर्ड किया गया था. लेकिन तब से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले इस देश में कोरोना वायरस संक्रमण के 29,000 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं. अब तक इस संक्रमण से यहां 900 से अधिक मौतें हुई हैं.
भारत में कोरोना वायरस से मौतें किस कदर बढ़ रही हैं, इसे समझने के लिए यह देखना होगा ये कितने दिनों में दोगुनी हो रही हैं. भारत में इस वक्त मौतें नौ दिनों में दोगुनी हो रही हैं. 25 अप्रैल तक यहां 825 मौतें हो चुकी थीं, जबकि 16 अप्रैल को ये मौतें लगभग इनकी आधी थीं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारत के लिए बेहद राहत की बात है क्योंकि संक्रमण के इस स्टेज में न्यूयॉर्क में दो या तीन दिन में ही मौतों का आंकड़ा दोगुना तक पहुंच जा रहा है.
पब्लिक हेल्थ सेक्टर के कई विशेषज्ञों और पेशेवरों का कहना है कि भारत में संक्रमण और मौतें अगर काबू में हैं तो इसके पीछे एक महीने से ज्यादा वक्त से चल रहे कड़े लॉकडाउन का रोल हो सकता है. मेडिकल जर्नल लान्सेट ने भी इसकी पुष्टि की है और कहा है कि लॉकडाउन, संक्रमण के बढ़ते ग्राफ को सपाट करने में मुफीद साबित हुआ है.

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कुछ लोगों का मानना है कि भारत में युवा आबादी ज्यादा है और इस वजह से संक्रमण से मौतें कम हो रही हैं. बुजुर्गों में इस संक्रमण से मौत का जोखिम ज्यादा होता है. कुछ हलकों में इस बात पर भी चर्चा हो रही है भारत में जिस वायरस का अटैक हुआ है, वह कम खतरनाक किस्म का है.
साथ ही कुछ लोग यह भी अंदाजा लगा रहे हैं कि शायद भारत के गर्म मौसम की वजह यह वायरस उतनी तेजी से यहां नहीं फैल रहा है, जितनी तेजी से ठंडे मौसम वाले पश्चिमी देशों में. हालांकि इन दावों और कयासों की अभी तक कोई पुष्टि नहीं हुई है. इसके उलट, कोविड-19 के गंभीर मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि भारत में फैला कोरोना वायरस उतना ही संक्रामक है, जितना किसी और दूसरे देश में हो सकता है. तो क्या यह माना जाए कि भारत सचमुच कोरोना वायरस से होने वाली मौतों के मामले में काफी पीछे है?
क्या भारत में कम टेस्टिंग की वजह से मौतों का आंकड़ा कम?
कुछ लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते. भारतीय मूल के अमरीकी चिकित्सक और कैंसर रोग विशेषज्ञ सिद्दार्थ मुखर्जी ने पत्रकार बरखा दत्त से हाल में कहा, "साफ कहूं तो भारत में इतनी कम मौतों के बारे में मैं कुछ नहीं जानता. दुनिया को भी इसके बारे में कुछ पता नहीं है. इतनी कम मौतें एक रहस्य है. मेरा तो मानना है कि कुछ हद तक कम टेस्टिंग इसके लिए जिम्मेदार है. भारत में हम पर्याप्त संख्या में टेस्टिंग नहीं कर रहे हैं. अगर हम ज्यादा टेस्टिंग कर रहे होते तो हमें इस सवाल का जवाब मिल सकता था.''
वह साफ तौर पर दोनों तरह के टेस्ट- डायगोनेस्टिक (संक्रामक लोगों की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला) और एंटीबॉडी टेस्ट (संक्रमित और ठीक हो चुके व्यक्ति का टेस्ट) की ओर इशारा कर रहे थे.
एक बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत कोविड-19 से हुई मौतों का पता नहीं लगा पा रहा है.

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कोरोनावायरस संक्रमण से प्रभावित कई देशों ने अनजाने में ही सही, मौतों की अंडर रिपोर्टिंग की है. मौतों के आंकड़ों की स्टडी के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स ने पाया कि कोरोनावायरस से संक्रमण के दौरान मार्च में अमेरिका में कम से कम और 40 हजार मौतें हुई थीं. इन मौतों में कोविड-19 के साथ दूसरी वजहों से हुई मौतें भी शामिल थीं.
'फाइनेंशियल टाइम्स' ने हाल में कोरोनावायरस संक्रमण के दौरान 14 देशों में हुई मौतों का विश्लेषण किया था. अखबार के मुताबिक कोरोना वायरस से हुई मौतें आधिकारिक आंकड़ों से 60 फीसदी ज्यादा हो सकती हैं. हालांकि 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और 'फाइनेंशियल' टाइम्स की स्टडी में भारत को शामिल नहीं किया गया था.
भारत की महत्वाकांक्षी 'मिलियन डेथ स्टडी' का नेतृत्व करने वाले टोरंटो यूनिवर्सिटी के प्रभात झा कहते हैं कि मौतों के आंकड़ों की रिपोर्टिंग सही तरीके से हो. कोरोना वायरस से हुई जिन मौतों की गिनती छूट गई हैं, उन्हें इसमें शामिल करना जरूरी है.
प्रभात झा का कहना है कि भारत में ज्यादातर मौत घरों में होती है, और यहां आगे भी ऐसा ही होता दिखता है. इसलिए मौतों के सही आंकड़े के लिए दूसरे तरीके आजमाने भी जरूरी हैं.
भारत में 80 फ़ीसदी मौतें घरों में इसलिए रिपोर्टिंग में दिक्कत
डॉक्टर प्रभात झा का कहना है कि भारत में अभी भी 80 फीसदी मौतें घरों में होती हैं. इनमें मलेरिया और न्यूमोनिया जैसी संक्रामक बीमारी से होने वाली मौतें शामिल हैं. प्रसव के दौरान मौत, हार्ट अटैक और दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग तो अक्सर अस्पतालों से हो जाती है. काफी लोगों को कुछ वक्त तक इलाज मिल जाता है. फिर वे लौट जाते हैं और घरों में उनकी मौत हो जाती है.
इसलिए सिर्फ अस्पताल से हुई मौतों की गिनती से ही हम यह पता नहीं लगा सकते कि भारत में वास्तव में कोविड-19 से कितने लोगों की मौत हुई है.
श्मशान या कब्रों में लाई गई लाशों का हिसाब रख कर मौतों का सही आंकड़ा पता करना काफी पेचीदा और मुश्किल काम है. भारत के गांवों और सुदूर इलाकों के बड़े हिस्से में लाशों का खुले में अंतिम संस्कार कर दिया जाता है. कोई श्मशान घाट या निर्धारित कब्रिस्तान नहीं होता. भारतीयों की बहुत छोटी आबादी के पास अंतिम संस्कार के लिए खास सुविधा है.
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के श्रीनाथ रेड्डी ने मुझसे कहा कि अस्पतालों में होने वाली मौतों में इधर जो तेज इजाफा हुआ है, उन पर लोगों की नज़र तो गई ही होंगी. ( मसलन,हाल के वर्षों में उत्तर भारत के अस्पतालों में हुई बच्चों के मौतों रिपोर्टिंग सही हुई है. और यह लोगों की नजर में है. देश में लोगों को यह बात पता है). इसी तरह प्रोफेसर रेड्डी का मानना है कि इतने लंबे समय से घरों में होने वाली मौतों में जो इजाफा हो रहा है, वे भी लोगों की नजर में होगी.
मौतों के सही रिकॉर्ड के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पब्लिक हेल्थ सिस्टम में मजबूत निगरानी तंत्र के अभाव में मोबाइल फोन का इस्तेमाल मौतों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है. इन्फ्लुएंजा से होने वाली मौतों के लिए मोबाइल से रिपोर्टिंग की जा सकती है ताकि यह पता किया जा सके कि क्या इन मौतों का संबंध कोविड-19 से था.
भारत में 85 करोड़ लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं. उन पर इस बात के लिए जोर दिया जा सकता है कि वे अपने गांव में किसी भी असामान्य मौत के बारे में एक टोल-फ्री नंबर पर जानकारी दें. इसके बाद अधिकारी परिवार से संपर्क कर मौत के बारे में मौखिक जानकारी ले सकते हैं.
भारत में मौतों की गिनती का विज्ञान कभी भी सटीक नहीं रहा है.

भारत में हर साल एक करोड़ लोगों की मौत हो जाती है. 'मिलियन डेथ स्टडी' ने पाया कि कुछ मौतों के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर आकलन किया जाता है (मसलन भारत में 2005 में एचआईवी से प्रीमैच्योर मौतों की संख्या एक लाख थी, यह डब्ल्यूएचओ के आकलन की सिर्फ एक चौथाई थी). खुद भारत सरकार ने माना है कि भारत में सिर्फ 22 फीसदी मौतें डॉक्टरों की ओर से सर्टिफाइड होती हैं.
एक सवाल यह भी है कोविड-19 से हुई मौत को परिभाषित कैसे किया जाए. कुछ भारतीय डॉक्टरों का कहना है कि कई लोग कोविड-19 के लक्षणों से मर रहे हैं. लेकिन न तो उनकी टेस्टिंग हुई थी और न ही उन्हें इलाज मिला था. इस तरह गलत डायग्नोसिस का भी सवाल पैदा होता है. अक्सर गलत डाइग्नोसिस भी मौत की वजह बन जाती है.
बेल्जियम के इरेसमी यूनिवर्सिटी अस्पताल के प्रोफेसर ज्यां लुई विंसेंट ने मुझसे कहा कि भारत समेत कई देशों में कोविड-19 से हुई मौतों की अंडर रिपोर्टिंग हुई है. वह कहते हैं "जब आपसे कोई कहता है कि मौत से पहले किसी शख्स को बुखार था या सांस से जुड़ी कोई दिक्कत थी, तो आपको लगता है कि यह कोविड-19 की वजह से हुई मौत हो सकती है. लेकिन हो सकता है कि यह कुछ और हो."
अस्पताल में मरीजों को ट्रैक करना
मौत अक्सर किसी संक्रमण के बाद होती है, और कई बार यह बहुत मामूली होता है. लेकिन अगर आप इसकी जांच नहीं करते हैं तो मान लेंगे कि कोविड-19 से मौत हुई होगी. या फिर आप इसे पूरी तरह नकार भी सकते हैं. यही वजह है कि 1918 के स्पेनिश फ्लू से हुई मौतों के आंकड़ों में इतना अंतर है.
डॉ. विंसेंट को नहीं लगता कि संक्रमण के बारे में पूरी कहानी मौतों के आंकड़ों से ही पता चलती है. वह कहते हैं "इस बीमारी की गंभीरता का जायजा लेने के लिए इससे हुई मौतों का रिकॉर्ड ज्यादा कारगर नहीं है. बीमारी कितनी प्रचंड है, यह जानना हो तो अस्पताल में मरीजों की भर्ती पर नजर रखना ज्यादा अच्छा तरीका होगा. लेकिन इसमें भी पेच यह है कि अस्पताल से बाहर घरों या दूसरी जगहों पर मरने वाले मरीज इसमें शामिल नहीं हो सकेंगे."
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ज्यादातर सरकारें इस बात को लेकर चिंतित हैं कि मौतों की रिपोर्टिंग से दहशत फैल सकती है. सरकारों यह चिंता स्वाभाविक है.
डॉक्टर प्रभात झा कहते हैं कि कोई भी जानबूझ कर मौतों के आंकड़ों को नहीं छिपा रहा है. आप इस तरह बड़ी तादाद में हो रही मौतों को छिपा भी नहीं सकते.
वह कहते हैं कि केसों की तुलना में मौतों को ट्रैक करना विश्वसनीयता के लिहाज से ज्यादा मुश्किल काम है क्योंकि इसमें टेस्टिंग से जुड़े कई पूर्वाग्रह सामने आ जाते हैं. इसलिए यह पक्का करना जरूरी है कि सारी मौतों का रिकॉर्ड रखा जाए. अच्छे रैंडम सैंपल लिए जाएं या हर मरने वाले मरीज की तस्वीर ली जाए.
हो सकता है कि भारत कोरोना से हो रही कुछ मौतों का आंकड़ा नहीं जुटा पा रहा हो. हर मरीज की सही डायग्नोसिस न हो पा रही हो लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि कोरोना वायरस से भारत में होने वाली मौतें कम हैं. फिर भी यह कहना जल्दबादी होगी कि भारत ने इस घातक बीमारी की मार से काफी हद तक खुद को बचा लिया है. लेकिन एक बात साफ है और जैसा कि मुझे एक एक्सपर्ट ने कहा- इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकते.

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