कोरोना वायरसः दुबई, कुवैत, खाड़ी देशों की बदहाली से केरल का नुक़सान

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- Author, अरुण लक्ष्मण
- पदनाम, बीबीसी के लिए
केरल के कण्णूर ज़िले की रोसना एम दो साल पहले दुबई में अपने पति के साथ एक खुशहाल ज़िंदगी जी रही थीं.
लेकिन तभी संयुक्त अरब अमीरात की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की शुरुआत हुई और वहां रह रहे केरल के कई लोगों को घर वापस लौटना पड़ा.
इस उम्मीद से कि वे एक रोज़ फिर वहां वापस जा पाएंगे. लेकिन उम्मीदों की वो फसल अब सूखती हुई दिख रही है.
कण्णूर के पल्लिकुन्नु में रोसना अपने घर पर दो बच्चों और बूढ़ी मां के साथ रहती हैं.
वो कहती हैं, "संयुक्त अरब अमीरात पर कोविड-19 की महामारी की मार जिस तरह से पड़ी है कि मेरे पति की नौकरी तो हाथ से निकल ही गई है. हमें नहीं मालूम कि अब हमारा काम कैसे चलेगा. राज्य सरकार ने कुछ कदम तो उठाए हैं और अब हमारी एकमात्र उम्मीद राज्य सरकार के वादों पर टिकी हैं."
सरिता और सिराज की परेशानी

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तलश्शेरी की सरिता नांबियार कोरोना संकट शुरू होने से कुछ महीने पहले ही कुवैत से लौटी थीं.
उनके पति मनोज नांबियार टेक्निकल लाइन में काम करते हैं पर इन दिनों उन्हें नौकरी जाने का डर सता रहा है.
सरिता बताती हैं, "अगर उन्हें वापस लौटने के लिए मजबूर किया जाता है तो हम यहां तकनीकी सेवाएं मुहैया कराने वाली एक कंपनी शुरू करेंगे. इसके लिए हम राज्य सरकार के लघु उद्योग निगम से मदद भी मांगेंगे."
कोल्लम के सिराज केएम दुबई में सेल्स की फील्ड में काम करते थे. हाल ही में उनकी नौकरी चली गई है. इन दिनों वे वहीं फंसे हुए हैं.
फोन पर सिराज ने बताया, "वापस लौटकर हमें नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करनी होगी. उम्मीद है कि केरल सरकार वापस लौटने वाले हमारे जैसे हज़ारों लोगों की मदद करेगी. अपने गृह राज्य के अलावा जाने के लिए हमारे पास कोई दूसरी जगह नहीं है."
केरल की अर्थव्यवस्था
रोज़ी-रोटी के नुक़सान की ये कहानियां केरल की बेहद उदास तस्वीर पेश करती है.
तिरुवनंतपुरम स्थित सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट स्टडीज़ की साल 2014 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि केरल की अर्थव्यवस्था का एक तिहाई हिस्सा बाहर से आने वाले पैसे पर निर्भर करता है.
केरल एक ऐसा राज्य है जिसके लाखों लोग विदेशों में नौकरी करते हैं. इनमें से ज़्यादातर मध्य पूर्व के देशों में काम करते हैं.
कोविड-19 की महामारी से हुई बर्बादी के कारण राज्य में बाहर से आने वाले पैसे में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है क्योंकि विदेशों में काम कर रहे केरल के लोगों के सामने बड़े पैमाने पर रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.
वर्ल्ड बैंक की एक स्टडी में अनुमान लगाया गया है कि कोरोना संकट के कारण विदेशों में काम करने वाले भारतीय पिछले साल की तुलना में इस साल 23 फीसदी कम रकम ही भारत भेज पाएंगे. पिछले साल ये रकम 83 अरब डॉलर थी जो इस साल 64 अरब डॉलर रहने का अनुमान है.
कमाई में भारी कमी
वर्ल्ड बैंक की स्टडी में इस बात का भी ज़िक्र है कि विदेशों से होने वाली इस कमाई में गिरावट की बड़ी वजह बाहर काम करने वाले लोगों के लिए रोज़गार के मौकों में कमी और वेतन में कटौती होगी. कोरोना संकट के कारण किसी देश में सबसे पहले बाहरी लोगों की रोज़ी-रोटी पर ख़तरा आएगा.
तिरुवनंतपुरम स्थित सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर इरुदया राजन प्रवासन मामलों के विशेषज्ञ हैं. वे केरल के सामने आने वाले ख़तरे से आगाह करते हैं.
डॉक्टर इरुदया राजन कहते हैं, "केरल के 35 लाख लोग अलग-अलग देशों में काम करते हैं. उनमें ज़्यादातर मध्यपूर्व में हैं. इन लोगों के पास जो पैसा है, उसमें भारी कमी होने जा रही है."
सीडीएस, तिरुवनंतपुरम की एक स्टडी के मुताबिक़ साल 2018 में केरल में विदेश से 80 हज़ार करोड़ आए थे. अब डर ये है कि इस आमदनी में भारी कमी आने वाली है.
केरल के बैंकों में जो पैसा जमा है, उसका 38.5 फ़ीसदी हिस्सा विदेश में मौजूद केरल के लोगों द्वारा भेजा गया पैसा है.
साल 2019 के वित्तीय वर्ष में उसके पिछले साल की तुलना में ये 11.83 प्रतिशत बढ़ गया था लेकिन इस बार तस्वीर पहले जैसी नहीं रहने वाली है.
राज्य का सकल घरेलू उत्पाद
तिरुवनंतपुरम स्थित गुलाटी इंस्टीट्यूट ऑफ़ फिनांस एंड टैक्सेशन की स्टडी में भी निराशाजनक स्थिति का अनुमान लगाया गया है.
इंस्टीट्यूट के एक सीनियर कंसल्टेंट नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, "केरल सरकार ये उम्मीद कर रही है कि विदेशों में काम कर रहे राज्य के तीन लाख घर वापस लौटेंगे. कमाने वाले इन लोगों की वापसी के कारण पैसा जुटाने में तो राज्य का दम फूल जाएगा. क्योंकि राज्य के तकरीबन सभी उद्योग किसी न किसी तरह से इनके भेजे पैसे पर निर्भर हैं. ये उद्योग तो ठप पड़ जाएंगे."
अर्थशास्त्रियों की ये राय है कि मौजूदा वित्त वर्ष में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद नेगेटिव में चला जाएगा.
पांचवें राज्य वित्त आयोग के प्रमुख और अर्थशास्त्री डॉक्टर बी आल्विन प्रकाश कहते हैं, "सभी क्षेत्र इससे प्रभावित हैं. केरल नॉन रेजिडेंट केरलाइट्स के भेजे पैसे पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. अब केरल को उस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है जहां मध्य पूर्व के देशों में किसी की नौकरी जाने पर राज्य में आने वाला पैसा प्रभावित होगा."
केरल की तैयारी
ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार को स्थिति का अंदाज़ा नहीं है. सरकार ने वैकल्पिक इंतज़ामों पर काम शुरू कर दिया है.
मुख्यमंत्री पिनारी विजयन ने लॉकडाउन के दौरान हालात का डंटकर सामना किया है. हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, "ये आत्मनिरीक्षण का समय है. हमें छोटे उद्योग, खेती-बारी, पशुपालन और ऐसे दूसरे पेशों को बढ़ावा देना होगा जो हमारे पर्यावरण के लिए अनुकूल हों ताकि हमारे लोगों के वापस लौटने से हमें जो नुक़सान होगा, उसकी भरपाई हो सके."
कॉन्फेडेरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़ के केरल चैप्टर की एक स्टडी के मुताबिक़ 42 दिनों के लॉकडाउन के दौरान राज्य को 50 हज़ार करोड़ रुपये के कारोबार का नुक़सान हुआ है. इसकी वजह से राज्य को जीएसटी के जरिए होने वाली तीन हज़ार करोड़ की कमाई मार खा गई है.
राज्य के मुख्य सचिव टॉम जोसे ने बीबीसी को बताया, "सरकार छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने समेत वैकल्पिक तरीकों की योजना बना रही है. हम वित्तीय संस्थानों से इसके तमाम पहलुओं पर बात करेंगे."
कॉन्फेडेरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़ के केरल चैप्टर ने ये सुझाव दिया है कि सरकार को सभी किस्म के कर्ज पर 180 दिन के बजाय एक साल के लिए मॉरटोरीअम (ऋण स्थगन) लागू करना चाहिए.

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