कोरोना की आड़ में सत्ता विरोधियों को चुप कराने के आरोप

आनंद तेलतुंबड़े

इमेज स्रोत, Hindustan Times

    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

देश भर में जारी कोरोना लॉकडाउन के इस माहौल में 'प्रिवेंशन ऑफ़ अनलॉफुल एक्टिविटी एक्ट' यानी यूएपीए से जुड़े मामलों की चर्चा आम दिनों की तरह नहीं हो रही है.

जून 2018 से कई नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर यूएपीए के तहत मामले दर्ज किए गए हैं. आनंद तेलतुम्बड़े और गौतम नवलखा से लेकर गौहर गीलानी तक, लगातार जारी एफआईआर और गिरफ़्तारियों का यह अनवरत सिलसिला अब कोविड लॉकडाउन की रौशनी में इस क़ानून के 'बढ़-चढ़कर इस्तेमाल' और न्यायिक प्रणाली पर कई ज़रूरी सवाल खड़े कर रहा है.

कश्मीर से लेकर दिल्ली और महाराष्ट्र तक, यूएपीए से जुड़ी ताज़ा कहानियाँ बहुत हैं - लेकिन शुरुआत करते हैं 70 वर्षीय शिक्षाविद, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और जातिगत भेदभाव पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखने वाले आनंद तेलतुम्बड़े से.

14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती के दिन राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) के सामने आत्मसमर्पण करने वाले आनंद को फ़िलहाल न्यायिक हिरासत में मुंबई की तालोजा जेल में भेज दिया गया है.

उन्हें 31 दिसंबर 2017 को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगाँव में आयोजित कार्यक्रम में तथाकथित रूप से शामिल होने और उसके बाद 1 जनवरी 2018 को वहां भड़की हिंसा के संबंध में गिरफ़्तार किया गया था.

यूएपीए के तहत दर्ज हुए मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने छापामारी के दौरान बरामद हुए एक संदिग्ध ख़त के आधार पर दावा किया कि आनंद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश में शामिल थे. आनंद ने सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए ख़ारिज तो किया है लेकिन मामला यूएपीए के तहत दर्ज होने की वजह से अंतरिम ज़मानत की उनकी सारी अर्ज़ियाँ ख़ारिज हो गई हैं.

गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

इमेज स्रोत, Hindustan Times

इमेज कैप्शन, गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता रोना विल्सन के घर से बरामद हुई इस विवादित चिट्ठी को आधार बनाकर महाराष्ट्र पुलिस ने रोना विल्सन साहित सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरनॉन गोंज्लविज, अरुण फरेरा, सुरेंद्रा गडलिंग, सुधीर धावले, शोमा सेन, महेश राउत और वरवर राव जैसे नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को यूएपीए के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया था.

तक़रीबन बीस महीने से महाराष्ट्र की अलग-अलग जेलों में बंद इन सभी लोगों पर यूएपीए के तहत लगाई गई धाराओं की जांच अब एनआइए के हाथों में है.

इन नामी-गिरामी और सार्वजनिक जीवन में लंबे समय से सक्रिय रहे लोगों को गिरफ़्तारी के बाद ज़मानत नहीं मिली है जबकि ज़्यादातर लोग ख़ासे उम्रदराज़ हैं. आनंद तेलतुम्बड़े के साथ-साथ गौतम नवलखा का आत्मसमर्पण इसी सिलसिले की एक कड़ी है.

आनंद के वक़ील निहाल सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि जिस पुराने आतंकवाद निरोधक क़ानून यानी पोटा में सुधार की बात ख़ुद यूएपीए की प्रस्तावना में लिखी गई थी, 2019 में हुए नए संशोधन के बाद अब उसी यूएपीए क़ानून का इस्तेमाल उसकी ही प्रस्तावना के ख़िलाफ़ किया जा रहा है.

निहाल सिंह कहते हैं, "पोटा क़ानून का इतना दुरुपयोग हुआ कि उसे निरस्त करना ही पड़ा. सत्ता में आते ही वर्तमान सरकार ने नागरिक अधिकारों के लिए दशकों से लड़ रहे और लंबे सार्वजनिक अहिंसक जीवन का रिकॉर्ड रखने वाले मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को पकड़ना शुरू कर दिया".

निहाल सिंह यूएपीए के तहत मामला दर्ज करने के बारे में कहते हैं, "इस सख़्त क़ानून के तहत मामले दर्ज करने का साफ़ मतलब यही है कि सरकार उन लोगों की आवाज़ दबाना चाहती है जो संविधान को ठीक-ठीक लागू करने के लिए आवाज़ उठा रहे हैं".

राकेश सिन्हा

इमेज स्रोत, Rakesh Sinha

लेकिन भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ऐसा नहीं मानते, उनका कहना है कि मामले विचाराधीन हैं और अदालत अपना काम कर रही है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "जो भी मुक़दमे दर्ज हुए हैं वह सब अदलात में जाएँगे. दोषियों और सज़ा होगी और यदि दोष न हुआ तो बरी हो जाएँगे. इन निजी मामलों पर मैं नहीं बोलना चाहता."

कोरोना के वर्तमान दौर में आनंद को वापस न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बारे में निहाल सिंह कहते हैं, "लॉकडाउन के इस समय में जब सामाजिक दूरी की बात कही जा रही है तब इन लोगों को वापस जेलों में डाला गया है. इस समय हमारी वर्तमान चिंता इन सभी गिरफ़्तार नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के स्वास्थ्य को लेकर है.

आनंद समेत यह सभी अलग-अलग तरह की दवाइयों पर हैं और बीते डेढ़ एक महीनों से वकीलों तक का उनसे सम्पर्क नहीं हो पा रहा है. हमें नहीं पता कि उनकी दवाइयों के स्टॉक की क्या स्थिति है. और जेल की भीड़ में कोरोना का डर तो है ही".

इन कार्यकर्ताओं की ज़मानत के लिए लड़ने के अनुभव पर बात करते हुए निहाल कहते हैं कि इस बीच अदालतों ने मानवीय दृष्टिकोण से विचान करना बहुत कम कर दिया है. वे कहते हैं, "ऐसे लोगों के बारे में जिन पर अभी तक कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ है, जिनकी हिंसा की कोई पृष्ठभूमि नहीं, जो अदलात और पुलिस की सभी जाँचो और बुलावों पर बिना नागा पहुँचते रहे हो, बीमार हों - उनकी ज़मानत की अर्ज़ियाँ ख़ारिज करते हुए यह पूछा जाना कि उन्हें लॉकडाउन के वक़्त में 'लिबर्टी' या आज़ादी क्यों चाहिए - यही बताता है कि अदालतें किस तरह सोच और चल रही हैं".

उधर आनंद के स्वास्थ की चिंता में डूबे उनके परिवार के बारे में बताते हुए उनके बहनोई प्रकाश अम्बेडकर पूछते हैं कि लोकतंत्र, गणतंत्र और देशद्रोह एक साथ कैसे चल सकता है?

बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "आनंद की दो बेटियाँ हैं और पूरा परिवार अब हर वक़्त इसी चिंता में डूबा रहता है कि उन्हें ज़मानत कब मिलेगी? वे 70 साल के हैं और पहले से ही बीमार हैं".

एल्गार परिषद के समर्थन में प्रदर्शन

इमेज स्रोत, Hindustan Times

अंबेडकर कहते हैं, "एल्गार परिषद के उस कार्यक्रम के आयोजन में आनंद की कोई भूमिका ही नहीं थी. और न ही एल्गार परिषद से ही उनका कोई लेना देना है. सिर्फ़ एक संदिग्ध और विवादित चिट्ठी को वजह बताकर उन्हें उठा लिया गया और यूएपीए जैसे सख्त क़ानून के तहत बंद कर दिया गया! क्या लोकतंत्र में ऐसा होता है?"

'मुंबई राइज़ेज फ़ॉर डेमोक्रेसी' नाम के नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के एक समूह से जुड़ी सुष्मिता "कोरोना संक्रमण के भय से यूएन ने भी बिना पर्याप्त सबूतों के गिरफ़्तार किए गए सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने की बात कही है. लिखने-पढ़ने, प्रकाशन और आंदोलन के इतने विस्तृत इतिहास के बाद भी आनंद तेलतुम्बड़े जैसे लोगों को राजनीतिक बंदी मानकर रिहा नहीं किया गया".

सुष्मिता संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के जिन दिशा-निर्देशों का ज़िक्र कर रही हैं, 25 मार्च को उन्हें जेनेवा में पारित करते हुए यूएन की मानव अधिकार आयुक्त मिशेल बैचेले ने कहा था कि कई विकासशील देशों की भीड़ भरी जेलों में कोरना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए बूढ़े, बीमार और छोटे अपराधों वाले क़ैदियों को रिहा कर देना चाहिए.

राजनीतिक बंदियों के बारे में बात करते हुए उन्होंने जोड़ा, "सिर्फ़ सरकारों का विरोध करने या विपरीत पक्ष रखने की वजह से गिरफ़्तार किए गए कार्यकर्ताओं और बिना पर्याप्त सबूतों के हिरासत में रखे गए राजनीतिक बंदियों को तो ऐसे वक़्त में निश्चित ही रिहा कर दिया जाना चाहिए".

क्या है यूएपीए की कहानी?

यूएपीए के धागे भारत के सबसे पहले आतंकवाद वोरोधी क़ानून टाडा से जुड़ते हैं. पंजाब में बढ़ते अलगाववाद से निपटने के लिए लाया गया यह क़ानून तक़रीबन एक दशक तक लागू किए जाने के बाद 1995 में निरस्त कर दिया गया.

इसके बाद 2002 में संसद पर हुए हमले के बाद नया आतंकवाद विरोधी क़ानून पोटा के रूप में लाया गया. इन दोनों ही क़ानूनों में सुरक्षा एजेंसियों को असीमित अधिकार दिए गए. साथ ही 'बर्डन ओफ़ प्रूफ़' या ख़ुद को निर्दोष साबित करने का ज़िम्मा आरोपी पर डाल दिया गया. बड़ी संख्या में हुई गिरफ़्तारियों के बाद भी इन क़ानूनों में सज़ा दर बहुत कम रही.

उदाहरण के लिए 2 साल के जीवन काल में पोटा के तहत दर्ज हुए 4349 मामलों में मात्र 13 लोगों के ख़िलाफ़ गुनाह साबित हुआ और उन्हें सज़ा हुई. सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी ताक़त का ज़रूरत से अधिक इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से इन दोनों कानूनों को काफ़ी आलोचना का सामना करना पड़ा. और आख़िरकार एक के बाद एक इन्हें निरस्त भी कर दिया गया.

यूएपीए यूं तो 1967 में पारित हुआ था लेकिन इसमें लगतार संशोधन होते रहे. 2004 में पोटा के निरस्त होने के बाद उसके आंशिक स्वरूप को यूएपीए में शामिल कर इसे दोबारा संशोधित किया गया. मुंबई हमलों के बाद भी इसमें कुछ तब्दीलियाँ हुईं लेकिन यूएपीए क़ानून में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संशोधन 2019 में आया.

सरकार ने बीते साल संसद में यूएपीए का नया संशोधन विधेयक पारित करके किसी भी व्यक्ति को अदालत में सुनवाई से पहले ही आतंकवादी घोषित करने का रास्ता साफ़ कर दिया. इससे पहले किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने के लिए उसका किसी प्रतिबंधित आतंकवादी समूह से सम्बंध साबित करना अनिवार्य था लेकिन अब ऐसा नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट में नागरिक अधिकारों की वरिष्ठ वक़ील वृंदा ग्रोवर ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पहले तो किसी को गिरफ़्तार करने के लिए उसका किसी प्रतिबंधित संगठन से सम्बंध स्थापित करना पड़ता है. लेकिन अब तो आप सिर्फ़ संदेह के आधार पर किसी को भी अर्बन नक्सल कहकर उसे इस क़ानून के तहत अंदर डाल सकते हैं".

बीजेपी के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा का कहना है कि "देश की एकता को ठेस पहुँचने वाले सभी लोगों पर क़ानून अपनी कार्यवाही करेगा."

'संदेह' के आधार पर चलने वाले यूएपीए की सुरंग कितनी लंबी?

नए संशोधित क़ानून में 'आतंकवादी' की परिभाषा अस्पष्ट होने की हद तक विस्तृत है. साथ ही क़ानून के इस नए संस्करण में 'संदेह' की बड़ी भूमिका है. सिर्फ़ आंतकवादी होने के संदेह पर, आतंकवादी कृत्य किए जा सकने की संभावना के संदेश या अंदेशे के आधार पर किसी भी नागरिक को गिरफ़्तार किया जा सकता है.

उस नागरिक का किसी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन से जुड़ा होना ज़रूरी भी नहीं. इसके बाद यूएपीए की लंबी सुरंग में बिना चार्जशीट दाखिल किए आरोपी को 6 महीने तक पुलिस हिरासत में रखे जा सकने का प्रावधान है. ज़मानत मिलना लगभग नामुमकिन है और हिरासत के शुरुआती छह महीनों में अदलात में पेशी की भी अनिवार्यता नहीं है.

सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ़ आरोप लगाने हैं जबकि ख़ुद को निर्दोष साबित करने की पूरी ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति पर जिस पर आरोप लगाया गया है.

वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "इन मामलों में न्याय की प्रक्रिया को ही इतना दुरूह और दुष्कर बनाया जाएगा कि वह आपके लिए सबसे बड़ी सज़ा बन जाए. इसका उद्देश्य सिर्फ़ विरोधी स्वरों को दबाना और एक डर का माहौल पैदा करना है."

दो कश्मीरी पत्रकारों पर यूएपीए के तहत मुक़दमे

बीते हफ़्ते कश्मीरी लेखक और पत्रकार गौहर गिलानी और फ़ोटो-जर्नलिस्ट मसर्रत ज़ारा पर उनकी सोशल मीडिया पोस्ट के लिए यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया.

कश्मीर पुलिस के अनुसार सोशल मीडिया पर लिखी गई उनकी पोस्ट और प्रकाशित की गई तस्वीरें "देशद्रोही और भड़काऊ" हैं. साथ ही 'द हिंदू' अख़बार के पत्रकार पीरज़ादा आशिक़ के ख़िलाफ़ भी खबर में 'तथ्यात्मक फेरबदल' करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है.

जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने गौहर केअंतरिम बेल की अर्ज़ी स्वीकर करते हुए मामले में पुलिस को 'स्टेट्स रिपोर्ट' दाख़िल करने के लिए कहा है और 20 मई की अगली तारीख़ दी है.

मसर्रत ज़ेहरा

इमेज स्रोत, Massarat Zehra

अपने ख़िलाफ़ लगे सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए गौहर कहते हैं, "अगस्त 2019 से लेकर अब तक मैं 21 ऐसे कश्मीरी पत्रकारों के नाम गिना सकता हूँ जिनके ख़िलाफ़ या तो एफआइआर हुए है, या जिन्हें सुरक्षा बलों ने पूछताछ के लिए बुलाया हो. बीते चार दिनों में ही यहां 3 पत्रकारों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज हुए जिनमें से कि दो यूएपीए के तहत दर्ज मामले हैं. यह एक तरह से हमें हमारा काम करने के लिए प्रताड़ित करना है".

गौहर का कहना है, "अब पुलिस और साइबर सेलों के साथ-साथ काउंटर इंसर्जेंसी सेल के लोग भी हम पर नज़र रखकर इस तरह मात्र सूचनात्मक सोशल मीडिया पोस्ट्स पर यूएपीए जैसे क़ानून के तहत मुकदमे कर रहे हैं."

कश्मीर प्रेस क्लब से जुड़े मोअज्ज़म मोहम्मद ने कश्मीरी पत्रकारों के ख़िलाफ़ दर्ज हुए मामलों को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि पत्रकारों के ख़िलाफ़ इस तरह से यूएपीए का इस्तेमाल एक ख़तरनाक परिपाटी स्थापित कर रहा है. "हम लगतार सरकार और पत्रकारिता से जुड़े संगठनों से बातचीत कर रहे हैं. हमारी कोशिश है कि यह मामले वापस लिए जाने चाहिए. मसर्रत, गौहर और पीरज़ादा सिर्फ़ अपना काम कर रहे थे. वे पत्रकार हैं और पत्रकारिता कोई गुनाह नहीं".

सरकार या सत्ताधारी पार्टी का रुख़ इससे काफ़ी अलग है, बीजेपी सांसद राकेश सिन्हा कहते हैं, "जहां तक कश्मीर का सवाल है, इतने खून-ख़राबे के बाद राज्य वापस शांति की ओर लौट रहा है. प्रेस की स्वतंत्रा अपनी जगह है. लेकिन यदि कुछ लोग वहां की शांति और अखंडता भंग करके भारत की राष्ट्रीय एकता को ठेस पहुँचाने की कोशिश करेंगे तो क़ानून अपना काम करेगा. बाक़ी अदलात की सुनवाई में सारे मामलों का सच सामने आ जाएगा".

आज़ादी एक बार खो जाए तो आसानी से वापस नहीं मिलती

सिद्धार्थ वरदराजन

इमेज स्रोत, Twitter

इस बीच 'द वायर' के संस्थापक और वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन के साथ-साथ वरिष्ठ वक़ील प्रशांत भूषण और पूर्व आइएएस अधिकारी कण्नन गोपीनाथन पर भी उनके ट्विटर पोस्ट के लिए मामले दर्ज किए गए.

अंतरराष्ट्रीय संगठन कमेटी फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) की प्रतिनिधि आलिया इफ़्तेख़ार ने न्यूयॉर्क से एक ईमेल इंटरव्यू में बीबीसी को बताया कि सीपीजे भारत में हो रही पत्रकारों की गिरफ़्तारियों से बहुत चिंतित है.

उन्होंने कहा, "एक स्वतंत्र और निर्भीक प्रेस किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी निशानी है और आम लोगों तक सही जानकारी पहुँचाने का ज़रिया भी, लेकिन लगता हैं कि कोरोना जैसी वैश्विक आपदा के इस दौर में भारत सरकार इस महामारी से निपटने की बजाय पत्रकारों को अपराधी बताने पर ज़्यादा आमादा है."

नक्शे पर

दुनिया भर में पुष्ट मामले

Group 4

पूरा इंटरैक्टिव देखने के लिए अपने ब्राउज़र को अपग्रेड करें

स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

आलिया की बात को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट में नागरिक अधिकारों के वक़ील अपार गुप्ता कहते हैं, "ऐसी महामारी के वक़्त में आज़ादी एक बार खो जाए तो आसानी से वापस नहीं मिलती. यह पत्रकार और मानव अधिकार कार्यकर्ता देश में आम लोगों की आवाज़ के पहली पंक्ति के सिपाही हैं. विवादास्पद सबूतों के आधार पर गिरफ़्तार किए गए ऐसे लोगों को जो तहक़ीक़ात के साथ पूरा सहयोग कर रहे हों उन्हें ज़मानत मिल जानी चाहिए थी".

क्या कोरोना की आड़ में ये मुक़दमे नागरिक स्वतंत्रता का दमन हैं?

पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एनटोनियो गुटेरेस ने कहा कि बढ़ती ऑनलाइन निगरानी, पत्रकारों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमलों के बीच कोरोना की स्वास्थ्य आपदा मानवीय आपदा में न बदल जाए. उन्होंने यह बात भारत के बारे में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के बारे में कही है.

गुटरेस की स्वर को प्रतिध्वनित करते वरिष्ठ अमरीकी लेखक और शिक्षाविद प्रोफ़ेसर स्टीव हैंक ने बीबीसी से एक साक्षात्कार में कहा कि, "आपदाओं का सहारा लेकर हमेशा ही सरकारें नागरिक स्वतंत्रता का क्षरण करती रही हैं"

राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक अपूर्वानंद ने बीबीसी से बातचीत में कहा, कि इन मुक़दमों से सबसे बड़ा नुक़सान आम जनता का हो रहा है. "नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर इस तरह के हमले यही बताते हैं कि सरकार इस समय का इस्तेमाल अपने खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को दबाने के लिए करना चाहती है. इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि यह नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार जिन आम लोगों की आवाज़ बनते थे, वे लोग बेज़ुबान हो जाएँगे".

प्रेस पर हमेशा से होते रहे हैं हमले : लेकिन अब क्या है फ़र्क़?

इन मुक़दमों के बारे में बात करते हुए सिद्दार्थ वरदराजन कहते हैं कि यह लगभग अघोषित आपातकाल जैसा समय है. "ख़ास तौर पर पत्रकारों के ख़िलाफ़ यूएपीए लागाकर सरकार यह कहना चाहती है कि हम न सिर्फ़ आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गुनाह बना देंगे बल्कि आपके साथ एक आतंकवादी की तरह भी पेश आएँगे. आख़िरकर यह सारे लोग छूट भी जाएँगे तब भी उस प्रक्रिया में इनके जीवन के कई साल बर्बाद हो जाएँगे".

वर्तमान सरकार का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए सिद्दार्थ जोड़ते हैं, "ऐसा नहीं हैं कि पुरानी सरकारों में प्रेस और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले नहीं होते थे. इमेरजेंसी तो घोषित ही थी. छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर और कश्मीर जैसी जगहों पर हमेशा ही पत्रकारों पर हमले हुए हैं. लेकिन मौजूदा सरकार में हम इस पैटर्न को बहुत बड़े पैमाने पर उभरता हुआ देख रहे हैं".

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी
लाइन
कोरोना वायरस हेल्पलाइन

इमेज स्रोत, GoI

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)