कोरोना वायरस : क्या पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी दाने दाने को तरस रहे हैं?

कोरोना वायरस

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    • Author, मोहर सिंह मीणा
    • पदनाम, राजस्थान से, बीबीसी हिंदी के लिए

भारत में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग जारी है. इसके प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को भी एक महीने से ज़्यादा समय बीत चुका है.

इसकी वजह से भारत के अलग-अलग कोनों में रहने वाले लोगों को तमाम तरह की दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है.

भारत सरकार इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कई तरह से मदद देती हुई दिख रही है.

लेकिन पाकिस्तान से भारत आए हिंदू शरणार्थी खाने पीने के सामानों से जुड़ी समस्याओं का सामना करने पर मजबूर हैं.

पाकिस्तान के सींदड़ा से दिसंबर 2014 में भारत आए 40 वर्षीय लिमू भील और उनका परिवार भी ऐसी ही दुश्वारियों का सामना कर रहे हैं.

वे कहते हैं, "एक ओर पूरा देश ही समस्याएं झेल रहा है लेकिन उनकी समस्याएं काफ़ी परेशान करने वाली हैं. पूरा देश जूझ रहा है लेकिन हम थोड़ा ज़्यादा परेशान हैं. देश के नागरिकों के पास तो राशन कार्ड हैं, हमारे पास वो भी नहीं हैं. सरकारी जमीन पर रहते हैं. सरकार की किसी भी योजना में हमें कुछ नहीं मिलता है."

भील के परिवार को अभी भारतीय नागरिकता नहीं मिली है, इसलिए ये सभी सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

बड़ा परिवार और लॉकडाउन

लिमू भील के तीन बेटे हैं और तीन बेटियां हैं.

उन्हें और पत्नी को मिलाकर घर में कुल 8 सदस्य हैं और इस दौर में उनके लिये अपने परिवार का भरण पोषण करना एक विषम समस्या बन चुका है.

पहले वह सिलाई का काम करके दिन के 200 रूपए तक कमा लेते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद काम मिलना बंद हो चुका है.

जैसलमेर सिटी के पास ही सरकारी सेटलमेंट में रह रहे लिमू कहते हैं, "सरकार ने दिया था लेकिन संस्थानों ने दिया या नहीं, ये मालूम नहीं, लेकिन महीने में पहली बार चावल और गेहूं परसों (22 अप्रैल) को ही मिला है."

लिमू भील अपने 5 भाई, बहन, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता समेत 30 सदस्यों के साथ पाकिस्तान से आ गए थे.

अब सभी जैसलमेर में आसपास ही रहते हैं, किसी को भारतीय नागरिकता नहीं मिली है और लॉकडाउन सभी परेशानी से जूझ रहे हैं.

वह बेहद खुशी के साथ कहते हैं कि हम तो रूखी सूखी रोटी खाकर गुजार लेंगे, लेकिन हम बहुत भाग्यशाली हैं कि पाकिस्तान से भारत में आ गए हैं. हमारे लिए सबसे बड़ी बात तो यही है.

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भारतीय नागरिकता मिलने वालों का हाल

भील की ही तरह साल 2004 में पाकिस्तान से आए प्रेम भील इन दिनों जोधपुर में पाक विस्थापितों की कॉलोनी में रह रहे हैं.

इन्हें भारतीय नागरिकता तो हाल ही में मिल गई है, लेकिन सरकारी लाभ से अभी भी वंचित हैं.

प्रेम भील बताते हैं कि जनवरी 2020 में ही भारतीय नागरिकता मिली है, लेकिन राशन कार्ड, आधार कार्ड, भामाशाह कुछ भी आईडी प्रूफ नहीं बना है.

वह कहते हैं कि परेशानी ही परेशानी है. काम धंधे बंद पड़े हैं. सरकार की तरफ से महीने में एक बार ही 10 और एक बार 5 किलो आटा आया और हम परिवार में 11 सदस्य हैं.

वह जोधपुर में ही सिलाई की दुकान पर काम करते हैं. साथ ही में इनका भाई भी काम कर परिवार पालन में हाथ बंटाता है.

लेकिन अब काम बंद होने से इनके सामने परिवार पालने के लिए समस्याएं खड़ी हो गई हैं.

11 लोगों के परिवार में औसत हर दिन आधा किलो आटा मिलने से क्या इनकी भूख मिट पाएगी. यह सवाल इनकी परेशानी बयां करने लिए काफ़ी है.

वहीं, 5 महीने पहले पाकिस्तान के अमरकोट से परिवार के साथ जैसलमेर आईं सेजा देवी के परिवार में एक बेटा और दो बेटियों को मिलाकर कुल पांच लोग हैं.

वे कहती हैं, "पहले 400-500 रुपए दिहाड़ी मजदूरी पर जाते थे यह (मनोहर लाल), लेकिन अब तो घर ही बैठे हैं हम सब. एक दफा सरकार ने पांच दिन पहले ही 5 किलो आटा, तेल, मसाला दिए थे. लेकिन अब कुछ राशन नहीं है अब, कहां से लें हम?"

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क्या कर रही है सरकार?

राजस्थान की गहलोत सरकार 4 हज़ार पाकिस्तानी विस्थापितों को सहायता मुहैया कराने का दावा कर रही है.

लेकिन राजस्थान के अलग-अलग जिलों में बसे कई परिवारों तक यह सहायता नहीं पहुंच पाई है.

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीती 22 अप्रैल को कहा कि सरकार ने ज़रूरतमंद पाक विस्थापितों को भी राशन एवं अन्य सहायता उपलब्ध करवाई है.

जयपुर, जोधपुर, पाली, जालौर, सिरोही, जैसलमेर, बाड़मेर समेत प्रदेश में रह रहे पाक विस्थापितों को राशन सामग्री उपलब्ध करवाने के लिए जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए थे.

4 हजार पाक विस्थापित परिवारों को राशन सामग्री मुहैया कराई गई है.

25 साल से पाकिस्तानी विस्थापितों के लिए कार्य कर रहे सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढ़ा कहते हैं, "यह परिवार बेहद परेशानी में हैं. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा समेत किसी भी सरकारी योजना में यह नहीं हैं आते हैं. रजिस्टर्ड दिहाड़ी मजदूरों में भी यह शामिल नहीं हैं."

सोढ़ा बताते हैं कि "2004 से अब तक पाकिस्तान से करीब 40 हजार शरणार्थी आए हैं. इनमें 95 प्रतिशत तक भील आदिवासी और दलित हैं. जो मेहनतकश मजदूर हैं और दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार पालन कर रहे हैं.

विस्थापितों की सुविधा और मदद के लिए सरकार को कई बार पत्र लिखे जिसके बाद सरकार ने इनको एक बार तो राशन दिया है, हालांकि सभी को नहीं मिला है.

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क्या कहते हैं अधिकारी?

पाक विस्थापित परिवारों के लिए की गई खाद्य सामग्री की व्यवस्थाओं के सवाल पर राजस्थान के खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रमेश चंद मीणा ने बीबीसी को बताया कि, प्रशासन के माध्यम से सभी जिला कलेक्टर को निर्धारित किया गया है.

राजस्थान में पांच करोड़ लोगों को राशन दिया जा रहा है.

पाक विस्थापित किसी भी योजना का हिस्सा नहीं हैं, उनको कैसे राशन दिया जा रहा है?

इस सवाल पर मंत्री रमेश चंद कहते हैं कि इस समय में हम किसी को भी कोई समस्या आने ही नहीं दे रहे हैं.

एक महीने में एक ही बार राशन दिया जा रहा है, ऐसे में 11 सदस्यों का एक परिवार इस राशन में कैसे गुजारा करेगा?

इस सवाल पर कहते हैं मंत्री बताते हैं कि, ऐसा नहीं है. हम हर 10 दिन में राशन दे रहे हैं. एसडीएम और कलेक्टर के यहां मॉनीटरिंग है. वहां तक सूचना पहुंच जाती है तो तुरंत एक्शन लेते हैं.

जोधपुर डिवीजन में जोधपुर, सैलमेर समेत 6 जिले शामिल हैं. यहीं इन दोनों जिलों में सबसे ज़्यादा पाकिस्तानी विस्थापित परिवार रह रहे हैं.

इन परिवारों के लिए की गई व्यवस्थाओं के सवाल पर जोधपुर डिवीजन के डिवीजनल कमिश्नर बाबू लाल कोठारी कहते हैं कि, हमारे पास इस तरह की जानकारी संग्रहित नहीं की जाती है.

डिवीजनल कमिश्नर बाबू लाल कोठारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कहते हैं कि, संभागीय आयुक्त का अलग तरह का काम होता है. यह काम नहीं होता है.

भारतीय नागरिकता का इंतज़ार

सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढ़ा बताते हैं कि, 1971 के बाद करीब 1 लाख 45 हजार लोग पाकिस्तान से राजस्थान आए. यहां इनका परिवार बड़ा हुआ और अब इनकी तीसरी पीढ़ी चल रही है. सभी को नागरिकता मिल गई है.

वह कहते हैं, कि वर्तमान में करीब 25 हजार लोग भारतीय नागरिकता लेने की कतार में हैं. जबकि 13 हजार को 2004 में नागरिकता मिल गई है.

राजस्थान के जोधपुर, जैसलमेर में सर्वाधिक संख्या में पाक विस्थापित परिवार रह रहे हैं. इनको नागरिकता नहीं मिलने से बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

सरकारी दावों में तो राजस्थान का कोई भी परिवार भूखा नहीं है. सरकार कह रही है कि सभी को हर दस दिन में राशन दिया जा रहा है.

प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं.

हालांकि, पाकिस्तान से आए इन परिवारों से पूछें तो पता चलता है कि इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.

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