कोरोना वायरस: इस महामारी से दुनिया भर की व्यवस्था कटघरे में क्यों?

कोरोना वायरस

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    • Author, स्टेफनी हेगार्टी
    • पदनाम, जनसंख्या संवाददाता

ये महामारी सबको बराबरी की नज़र से नहीं देखती. कुछ लोग खिली हुई धूप वाले बाग़ीचों में आइसोलेशन का पालन कर रहे हैं. तो, अन्य लोग अपने छोटे छोटे अपार्टमेंट की खिड़कियों से झांकते दिखाई देते हैं.

रिसर्च कहती है कि इस महामारी के कारण नौकरी गंवाने वालों में ज़्यादातर युवा और महिलाएं हैं. ये वो लोग हैं, जिनकी कमाई पहले से ही कम थी. और अब वायरस ने उनके रोज़गार छीन लिए हैं. अब तक के अध्ययन ये भी इशारा करते हैं कि कोरोना वायरस से अश्वेत लोग ज़्यादा संक्रमित हो रहे हैं.

रोज़ कमाने खाने वालों के लिए लॉकडाउन का मतलब है कि उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है. ये बात है तो बहुत दुखदायी मगर इसमें चौंकाने वाली कोई बात नहीं कि इस महामारी के संकट के कारण ग़रीब लोग और ग़रीब हो जाएंगे. लेकिन, आपदाएं, बदलाव का अवसर भी अपने साथ ही ले आती हैं. और ऐसा होता है तो ये पहली बार नहीं होगा.

2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद ब्राज़ील में सामाजिक सुरक्षा का नया ढांचा तैयार किया गया. एशिया में 1990 के दशक में आख़िर में आई आर्थिक सुस्ती के बाद थाईलैंड में सबके लिए मुफ़्त स्वास्थ्य व्यवस्था की शुरुआत हुई थी.

इससे भी पीछे जाकर इतिहास के पन्ने खंगालें, तो पिछली सदी के तीसरे दशक में अमरीका में आई महा मंदी से सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का उदय हुआ था. ब्रिटेन में दूसरे विश्व युद्ध के बाद ही बेहद मशहूर और सम्मानित नेशनल हेल्थ सर्विस की शुरुआत हुई थी.

आपदाओं के चलते तमाम समाज वो करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं, जिनकी कल्पना तक उससे पहले नहीं की जाती थी. तो क्या कोविड-19 की महामारी से हम ऐसे बलिदान कर सकेंगे, जिनसे हमारी दुनिया में फैली असमानता मिटेगी और जनता के बीच बराबरी बढ़ेगी?

महामारी में करोड़ों गंवा दिए

कुछ हफ़्ते पहले अमरीका के सिएटल में एक छोटी सी कंपनी के साथ यही हुआ था. बीबीसी ने इस साल की शुरुआत में ग्रैविटी पेमेंट्स पर एक प्रोफ़ाइल रिपोर्ट तैयार की थी. ये रिपोर्ट पांच साल पहले लिए गए एक ऐतिहासिक क़दम की सालगिरह पर दिखाई जाने वाली थी.

2015 में ग्रैविटी पेमेंट्स के सीईओ डैन प्राइस ने अपनी तनख़्वाह में दस लाख डॉलर की कटौती की थी. डैन प्राइस ने अपनी सैलरी में ये कटौती इसलिए की थी ताकि वो अपनी कंपनी के हर कर्मचारी को कम से कम 70 हज़ार डॉलर की तनख़्वाह दे सकें.

Dan Price

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इमेज कैप्शन, ग्रैविटी पेमेंट्स के सीईओ डैन प्राइस

डैन प्राइस का ये दांव अब तक तो बेहद कामयाब साबित हुआ था. कंपनी के कर्मचारियों की संख्या दोगुनी हो गई थी. कर्मचारी ख़ुश थे और लगन के साथ काम कर रहे थे. वो अब मकान ख़रीद सकते थे. या ज़्यादा बच्चे पैदा कर सकते थे. कंपनी का मुनाफ़ा भी बढ़ गया था.

और तभी कंपनी पर बिजली गिर पड़ी.

पिछले हफ़्ते एक वीडियो कॉल में सीईओ डैन प्राइस बहुत थके हुए दिख रहे थे. ये बहुत तनाव का दौर था.

डैन प्राइस ने कहा कि, 'मुझे कभी भी ऐसा सिरदर्द या और कुछ नहीं होता. लेकिन, पिछले पांच हफ़्ते से मुझे बहुत तेज़ सिर दर्द हो रहा है.'

ग्रैविटी पेमेंट्स, अमरीका के सिएटल में स्थित है. अमरीका में जिन जगहों पर सबसे पहले कोरोना वायरस का हमला हुआ था, उनमें सिएटल भी शामिल था.

ग्रैविटी पेमेंट्स छोटे और मध्यम दर्ज़े के कारोबारियों के कार्ड से भुगतान की प्रॉसेसिंग करती है. और इस लेन देन का एक हिस्सा कमीशन के तौर पर लेती है. इसके बहुत से ग्राहक ऐसे थे, जो लॉकडाउन से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं. जैसे कि बार, दुकानें, कैफ़े और रेस्टोरेंट.

डैन प्राइस कहते हैं कि पहले उनकी कंपनी जहां हर महीने चार अरब डॉलर की कमाई कर रही थी, वहीं अब ये घट कर दो अरब डॉलर पर आ गई है. चूंकि, ग्रैविटी पेमेंट्स अपने शानदार सैलरी पैकेज के लिए मशहूर है, तो इसका महीने का खर्च भी बहुत ज़्यादा था. अब अगर कंपनी की कोई कमाई नहीं होती है, तो उसे हर महीने क़रीब 15 लाख डॉलर का घाटा होगा. यानी ग्रैविटी पेमेंट्स कुछ ही महीनों में दिवालिया हो जाएगी.

डैन प्राइस को मालूम है कि वो किसी भी कर्मचारी को काम से नहीं निकालेंगे. ख़ास तौर से तब और जब उन्हें कंपनी से मिलने वाली स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं की और भी अधिक ज़रूरत है.

लेकिन, प्राइस को ये भी पता था कि उनके पास अपने ग्राहकों से मिलने वाला कमीशन बढ़ाने का विकल्प भी नहीं है. क्योंकि उनके ग्राहक भी इस लॉकडाउन से मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. और प्राइस को ये पता नहीं कि उनके पास और क्या विकल्प हैं. लेकिन, जल्द ही बहुत असाधारण बात होने वाली थी.

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तरक़्क़ी पर इंसानों को तरज़ीह

हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं, जब दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक प्रयोग हो रहे हैं. ये ऐसे तज़ुर्बे हैं, जो शायद हम अपनी ज़िंदगियों में दोबारा न देख पायें. जब नया कोरोना वायरस दुनिया के तमाम देशों में फैल रहा है. तो, एक के बाद एक हर देश ख़ुद को लॉकडाउन की भट्ठी में झोंक रहा है.

अपने देशों की अर्थव्यवस्थाओं की रफ़्तार पर ऐसे ज़बरदस्ती और अचानक ब्रेक लगा कर इन देशों की सरकारें अपने देश के अवाम और उनकी सेहत को आर्थिक तरक़्क़ी पर तरज़ीह दे रही हैं.

हम सब ये उम्मीद कर रहे हैं कि लॉकडाउन का ये दौर जल्द ख़त्म हो जाएगा. लेकिन, ऐसे बहुत से लोग हैं, जो हर समय विश्व बैंक के लिए सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों के बारे में सोचते रहते हैं. ऐसे ही एक इंसान हैं, इटली के यूगो जेंटिलिनी. जेंटिलिनी को ये उम्मीद है कि लॉकडाउन की कई विरासतें, इस महामारी के बाद ज़्यादा दिनों तक नहीं चलेंगी.

जेंटिलिनी ये मानते हैं कि ये समय बहुत सारी उम्मीदें पालने का है. क्योंकि, दुनिया में हर रोज़ कोई न कोई देश इस महामारी से प्रभावित सबसे ग़रीब लोगों के लिए किसी न किसी योजना का एलान करता है. जेंटिलिनी का रिसर्च ये कहता है कि नक़द भुगतान योजना से 62.2 करोड़ लोगों को इस महामारी के कुप्रभावों का सामना करने में मदद मिलेगी.

वो कहते हैं कि कई देशों की सरकार इस बात के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं कि उनकी योजनाओं का लाभ उन असल लोगों तक पहुंचे, जिन्हें इनकी सबसे ज़्यादा दरकार है. और जिनके लिए मदद की ये योजनाएं चलाई जा रही हैं.

अफ्रीका का मोरक्को और लैटिन अमरीकी देश कोलंबिया में सरकारें यू-ट्यूब पर वीडियो डाल रही हैं, ताकि इन्हें देख कर लोग सरकारी मदद के लिए अर्ज़ी दे सकें. एक अन्य अफ्रीकी देश युगांडा में किशोर उम्र की लड़कियों सरकारी मदद के लिए एक ट्रेनिंग लेनी पड़ती थी. लेकिन, अब उन्हें ये मदद बिना किसी प्रशिक्षण में शामिल हुए भी मिलेगी. भारत की सरकार कहती है कि वो अपनी सार्वजनिक कामगार योजना यानी मनरेगा के तहत पंजीकृत क़रीब पौने तीन करोड़ लोगों को तब तक नक़द भुगतान करेगा, जब तक वो काम पर नहीं आते. कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में क़रीब पांच लाख परिवारों को कैश दिया जा रहा है, बशर्ते वो घरेलू हिंसा न करें और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें.

ये उन योजनाओं के कुछ गिने चुने उदाहरण हैं, जो कोविड-19 की महामारी के बाद के कुछ हफ़्तों में ग़रीबों की मदद के लिए शुरू की गई हैं.

यूगो जेंटिलिनी कहते हैं कि ये योजनाएं कितनी कारगर होंगी, इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी. मगर उन्हें ये उम्मीद है कि जब ये योजनाएं एक बार ज़मीनी स्तर पर काम करने लगेंगी, तो आगे चल कर ये ग़रीबों की सामाजिक सुरक्षा के स्थायी ढांचे का हिस्सा बन जाएंगी.

एक क्रांतिकारी विचार

ग्लोबल जस्टिस नाऊ नाम की संस्था से जुड़ी सामाजिक अधिकार और पर्यावरण कार्यकर्ता डोरोथी गुएरेरो कहती हैं कि, 'अभी ऐसे संकट के वक़्त ये सवाल उठाना पागलपन होगा कि दुनिया में छोटे-छोटे देश होने चाहिए. बल्कि बेहतर होगा कि हम ज़्यादा सक्रिय सरकारों की मांग करें.'

वो कहती हैं कि, 'सवाल ये है कि इस संकट का मुक़ाबला करने के लिए सरकार की कितनी बड़ी और व्यापक भूमिका होनी चाहिए.'

डोरोथी इस बात को लेकर बहुत चिंतित हैं कि लॉकडाउन की वजह से तमाम देशों के ग़रीबों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है. लेकिन, वो ये भी मानती हैं कि इस महामारी से वैश्विक अर्थव्यवस्था के बुनियादी उसूलों को चुनौती मिलेगी.

डोरोथी कहती हैं कि, 'हमें पहले भी कहा जाता रहा है कि हमें सब कुछ बाज़ार के हाथ में छोड़ देना चाहिए. क्योंकि सबको ज़रूरी संसाधन बाज़ार ही मुहैया कराएगा. व्यवस्था की ख़ामियों को बाज़ार ही दुरुस्त करेगा. वही, हर समस्या का समाधान निकालेगा. लेकिन, इस महामारी से निपटने के लिए तमाम देश जो उपाय कर रहे हैं, वो बाज़ार आधारित नहीं हैं. बाज़ार इन मुश्किलों का हल नहीं सुझा रहा. इस महामारी से पैदा हुई मुश्किलों का समाधान सरकारें निकाल रही हैं.'

डोरोथी को लगता है कि अब समय आ गया है कि सबको बुनियादी आमदनी के रूप में कुछ रक़म देने के विचार में दिलचस्पी बढ़े. जबकि अब से कुछ समय पहले तक ये ख़याल बिल्कुल ख़याली ही था. मगर, अब तो कैथोलिक ईसाईयों के सबसे बड़े धर्म गुरू पोप ने भी ईस्टर के रविवार को जारी एक चिट्ठी में इस मुद्दे को उठाया था.

Pope Francis at his weekly audience

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पोप फ्रांसिस ने अपने ख़त में लिखा था कि, 'शायद अब वो समय आ गया है जब हम हर व्यक्ति को कुछ बुनियादी आमदनी तय करने के प्रस्ताव के बारे में सोचें. इससे आप जो अच्छा और ज़रूरी काम करते हैं, उसे नैतिक बल मिलेगा.'

डोरोथी गुएरेरो को भी ये लगता है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम की योजना पर विचार करना अच्छा होगा. क्योंकि जिन कामों को पहले कम हुनर वाली नौकरी कहा जाता था, जैसे कि सामान की डिलिवरी करने वाले, सामान की पैकेजिंग करने वाले, फल और सब्ज़ियां जमा करने वाले, वो आज हमारे अस्तित्व को बचाने के लिए बेहद ज़रूरी हो गए हैं.

डोरोथी कहती हैं कि, 'इटली में कामगार ज़्यादा तनख़्ववाह की मांग उठा रहे हैं. उन्हें अब सामाजिक सुरक्षा के ज़्यादा उपाय भी चाहिए. अब ये दान पुण्य का काम नहीं रह गया. अब ये लोगों की ज़रूरत और उनका अधिकार बन गया है.'

डोरोथी कहती हैं कि, 'मैं फिलीपींस की रहने वाली हूं. और मुझे मालूम है कि कोरोना वायरस के कारण फिलीपींस में बहुत सी नर्सों की मौत हो गई. इससे तनख़्वाह बढा़ने की मांग और तेज़ होगी. लोगों को और सामाजिक सुरक्षा की भी दरकार होगी.'

रिसर्च बताते हैं कि कमोबेश यही असर स्पेनिश फ्लू का भी हुआ था. उस महामारी के कारण मोलभाव की शक्ति मालिकों के हाथ से निकल कर कामगारों के हाथों में चली गई थी. और कुछ कंपनियों के मालिकों को इससे दिक़्क़त भी नहीं है.

इन सुविधाओं का भुगतान कौन करेगा?

डैन प्राइस ने अपनी कंपनी के कर्मचारियों को मार्च के आख़िर में एक ज़ूम कॉन्फ्रेंस कॉल के लिए इकट्ठा किया था. वो उनसे ग्रैविटी पेमेंट्स के भविष्य के बारे में बात करना चाहते थे. डैन प्राइस के पास केवल बुरी ख़बरें थीं. उस कॉन्फ्रेंस कॉल में कंपनी के 200 कर्मचारी शामिल हुए थे. इनमें सेल्स टीम के जेयर्ड स्पियर्स भी थे.

स्पियर्स कहते हैं कि, 'तीन हफ़्ते से ज़्यादा वक़्त बीत चुका था, तो हमें तो बस जहाज़ के डूबने का इंतज़ार था.' मीटिंग के लिए तैयारी करते हुए स्पीयर्स के ज़हन में बहुत बुरे ख़याल आ रहे थे.

जेयर्ड स्पियर्स कहते हैं कि, 'मैं ने कंपनी के दस साथियों को मैसेज भेज कर पूछा था कि क्या वो वक़्त आ गया है?'

कॉन्फ्रेंस कॉल में डैन प्राइस ने सभी कर्मचारियों के सामने वो समस्या रखी, जिसका सामना कंपनी कर रही थी. उन्होंने बताया कि कंपनी की आमदनी और ख़र्च में क़रीब 15 लाख डॉल का फ़र्क़ है. उन्होंने सभी कर्मचारियों से सलाह मांगी कि इस फ़ासले को कैसे दूर किया जाए. प्राइस ने कहा कि वो किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकालना चाहते हैं. न ही वो ग्राहकों की फ़ीस बढ़ाना चाहते हैं. जेयर्ड स्पियर्स कहते हैं कि ज़्यादातर कर्मचारी, डैन प्राइस की बात से सहमत थे.

किसी ने सुझाव दिया कि सभी कर्मचारियों की तनख़्वाह में कटौती की जाए. कुछ ने कहा कि ये तो नाइंसाफ़ी होगी. कंपनी के कर्मचारियों में मिले जुले लोग थे. कोई शादीशुदा था या ऐसे पार्टनर के साथ था जिसकी उसी हफ़्ते नौकरी चली गई थी. कई कर्मचारी ऐसे थे जो अकेले ही बच्चे पाल रहे थे. उन सबने मिल कर एक फ़ैसला किया. और वो ये था कि कर्मचारियों की सैलरी में कटौती का फ़ैसला पूरी तरह से कर्मचारियों पर निर्भर करेगा. और जो कर्मचारी इसके लिए आगे आते हैं, उनका नाम सार्वजनिक नहीं किया जाएगा. डैन प्राइस कहते हैं कि वो अपनी कंपनी के कर्मचारियों की ईमानदारी देख कर अचरज में थे.

प्राइस ने बताया कि मीटिंग में एक भले आदमी ने कहा कि, 'सुनो..मेरी पत्नी ख़ूब पैसे कमाती है. मुझे अभी सैलरी की ज़रूरत नहीं है.' ये बात सुन कर कॉन्फ्रेंस कॉल में शामिल कई लोग हंसे भी थे. लोगों ने कहा कि भला कोई ऐसी बात सरेआम भी कहता है!

फिर भी बहुत से कर्मचारियों को इस बात का भरोसा नहीं था कि तनख़्वाह में कटौती से वो कंपनी को बचा सकेंगे.

ग्रैविटी पेमेंट्स के सीईओ टैमी क्रोल कहते हैं कि, 'मेरे मन में इस प्रस्ताव को लेकर कई सवाल थे. मुझे लगता है कि हम सब आशंकित थे.'

लेकिन, सैलरी में कटौती के फ़ैसले से ग्रैविटी पेमेंट्स को अपना लक्ष्य पाने में सफलता मिली. बल्कि उन्हें कुछ कर्मचारियों से ये कहना पड़ा कि भाई तुम्हें अपनी सैलरी में इतनी कटौती करने की ज़रूरत नहीं है.

A group of people depart from a church where food and essential supplies are distributed

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इमेज कैप्शन, अमरीका में लोगों के सामने खाने की समस्या बढ़ रही है

डैन प्राइस कहते हैं कि, 'मुझे लगता है हमने दो हफ़्ते से भी कम वक़्त में अपने ख़र्च में लगभग दस लाख डॉलर की कटौती कर ली. मुझे तो ये देख कर सदमा सा लग गया था.'

लेकिन, जेयर्ड स्पीयर्स के लिए ये कोई चौंकाने वाली बात नहीं थी. उनके हिसाब से बस इसका समय ठीक नहीं था. क्योंकि वो कुछ दिनों पहले ही पिता बने थे. और उनकी पत्नी काम नहीं कर रही थीं. लेकिन, दोनों ने मिल कर ये तय किया कि वो सैलरी में 20 प्रतिशत कटौती का बोझ उठा सकते हैं.

स्पीयर्स मानते हैं कि जो उन्होंने किया वो कोई महान काम नहीं था. स्पीयर्स कहते हैं कि, 'मैं ये नहीं मानता हूं कि हमारी कंपनी में कोई अनोखी बात है. यहां हम जो दो सौ लोग काम करते हैं, वो हमारी प्रतिद्वंदी कंपनियों के कर्मचारियों से ज़्यादा दयानतदारी रखते हैं.' स्पीयर्स के मुताबिक़, उनकी कंपनी ने जो हासिल किया उसका सबसे बड़ा सबक़ ये है कि हर कर्मचारी को अपनी कंपनी से बात करनी चाहिए. लेकिन, कारोबार का ये कोई सामान्य तरीक़ा है ही नहीं.

ज़्यादातर कंपनियों के सीईओ को ये सिखाया जाता है कि आर्थिक मंदी में जिस में सबसे पहले कटौती होनी चाहिए, वो हैं कर्मचारी. लेकिन, जेयर्ड स्पीयर्स कहते हैं कि अगर कोई कंपनी अपने कर्मचारियों को बेशक़ीमती मानती है, तो वही कर्मचारी उस कंपनी को बचा भी लेते हैं.

ट्विटर पर डैन प्राइस रोज़ाना अरबपतियों से भिड़ते रहते हैं. उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं. हाल के दिनों में प्राइस, अमरीकी सरकार के उस आर्थिक राहत पैकेज पर निशाना साध रहे हैं, जो उनके हिसाब से छोटी कंपनियों की क़ीमत पर बड़ी कंपनियों की मदद करने वाला है.

असमानता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों का मानना है कि तमाम देशों की सरकारें आगे आने वाले कुछ महीनों या वर्षों में जो भी क़दम उठाएंगी, वो बेहद महत्वपूर्ण होगा. उन्हें तय करना होगा कि मंदी का बोझ कौन उठाएगा? वो इस महामारी से संघर्ष कर रहे ग़रीब या मध्यम वर्ग के लोग होंगे, या फिर अमीर तबक़ा.

लंदन के किंग्स कॉलेज में विकास का अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले एंड्र्यू सुमनर कहते हैं कि, 'ये अतिरेक की दोनों ही दिशाओं में जा सकता है.' सुमनर ने एक बेहद भयावाह रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें ये चेतावनी दी गई थी कि इस महामारी के चलते ब्रिटेन में पांच लाख से अधिक लोग ग़रीबी रेखा से नीचे जा सकते हैं.

सुमनर कहते हैं कि, 'हो सकता है कि कुछ देशों में इस बात को लेकर संवेदनशीलता हो कि जिनके पास ज़्यादा पैसा है, वो ज़्यादा टैक्स भरें. इससे सबका भला होगा. या फिर ये होगा कि दुनिया एक नए तरह के रंगभेद यानी आर्थिक नस्लवाद की शिकार हो जाएगी.'

आर्थिक मानव विज्ञानी जैसन हिकेल कहते हैं कि, 'ये इस बात पर निर्भर करता है कि तमाम देश इस महामारी से कैसे निपटते हैं. और इस संकट को लेकर राजनीतिज्ञ कौन सा रुख़ अपनाते हैं.'

हिकेल कहते हैं कि, 'हमें एक ऐसी अर्थव्यवस्था की दरकार है, जो दो बुनियादी उपलब्धियां हासिल कर सके. एक तो इससे सामान्य मानव का कल्याण हो. दूसरा इससे पर्यावरण में स्थिरता आए. अगर हमारी अर्थव्यवस्था इन दो लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाती है, तो हमें ये सवाल उठाना चाहिए कि ऐसी आर्थिक नीतियों का फिर मतलब ही क्या है?'

Dutch former Green Party leader Femke Halsema (file pic 2013)

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इमेज कैप्शन, नीदरलैंड के एम्सटर्डम शहर की मेयर फेमके हैलसेमा

कई बार राष्ट्रीय नेताओं की तुलना में शहरों के मेयर फ़ैसला करने की बेहतर स्थिति में होते हैं. कोरोना वायरस की महामारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित कुछ यूरोपीय शहरों के मेयर ये कह रहे हैं कि महामारी की वजह से आई मंदी से उबरने का तरीक़ा, ख़र्च में कटौती नहीं है.

इन मेयरों में से एक हैं नीदरलैंड के एम्सटर्डम शहर की फेमके हैलसेमा. वो कहती हैं कि एम्सटर्डम शहर अब समृद्धि को मापने के लिए आर्थिक तरक़्क़ी के पैमानों को त्याग देगा. हैलसेमा कहती हैं कि, 'इसके बजाय हम अब अपनी समृद्धि इस आधार पर तय करेंगे कि शहर के लोग किस रफ़्तार से उन्नती करते हैं.'

जैसन हिकेल कहते हैं कि, 'इससे पहले मुख्यधारा की राजनीति करने वालों ने कभी भी इस तरह का प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ाया. ये बहुत महत्वपूर्ण लम्हा है.'

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