मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे संदेशों को रोकने के लिए गुजरात पुलिस ने क्या किया?

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- Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद (गुजरात) से
गुजरात की अहमदाबाद सिटी पुलिस ने हाल ही में ज़िले के सभी थानों में एक सर्कुलर भेजा है कि वे क्षेत्र में फैल रहीं अफ़वाहों को लेकर सतर्क रहें ताकि कोई अप्रिय घटना ना हो.
पुलिस विभाग का कहना है कि उन्होंने हाल ही में पाया कि कुछ लोग मुसलमान समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे संदेशों को बढ़ावा दे रहे हैं.
दरअसल, दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाक़े में लॉकडाउन से पहले हुए तब्लीग़ी जमात के एक कार्यक्रम में सैकड़ों लोग जुटे थे जिनमें से कई लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाये गए थे. और तभी से सोशल मीडिया पर कई तरह के भ्रामक और भड़काऊ मैसेज शेयर किये जा रहे हैं.
तब्लीग़ी जमात से जुड़े कोरोना के मामले सामने आने के बाद प्रशासन ने यह डर ज़ाहिर किया था कि इस धार्मिक कार्यक्रम में शिरकत करके लौटे लोगों के ज़रिए कोरोना वायरस अन्य राज्यों में भी फैल सकता है. इसलिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के ज़रिए उन लोगों की पहचान की जा रही है जिन्हें कोरोना वायरस संक्रमण का ख़तरा है.
लेकिन सोशल मीडिया पर जो मैसेज शेयर किये जा रहे हैं, उनमें दावा किया जा रहा है कि मुसलमान दुकानदार जानबूझकर सामानों और फल-सब्जियों के ज़रिये कोरोना वायरस को फैला रहे हैं.
अहमदाबाद पुलिस की स्पेशल ब्रांच के जॉइंट कमिश्नर परमवीर सिंह का कहना है कि "देश वैसे ही मुश्किल समय में है, ऐसे में हम तनाव की कोई घटना नहीं चाहते, इसीलिए पुलिस को चौकन्ना कर दिया गया है."
परमवीर सिंह ने कहा कि "रोज़ कई फल-सब्ज़ी बेचने वाले सड़कों पर चक्कर लगा रहे होते हैं, ऐसे में हम नहीं चाहते कि कोई इन भ्रामक संदेशों को पढ़कर इन लोगों पर हमला करे या इनसे मारपीट करे."
पुलिस का कहना है कि अभी तक तो कोई ऐसी घटना सामने नहीं आई है जब किसी को धर्म के आधार पर तंग किया गया हो, लेकिन गुजरात के कई मुस्लिम नेता मानते हैं कि ऐसे संदेशों से दो समुदायों के बीच दीर्घकालिक असर ज़रूर देखने को मिल सकता है.

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लॉकडाउन शुरू होने के क़रीब एक सप्ताह बाद निज़ामुद्दीन स्थित मरकज़ को लेकर हंगामा शुरू हुआ था. 1 से 15 मार्च के बीच कार्यक्रम में शामिल हुए काफ़ी लोग वापस अपने घरों को लौट चुके थे. पर काफ़ी लोग 22 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा होने तक मरकज़ की इमारत में ही थे.
वडोदरा की एमएस यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जेएस बंदूकवाला मानते हैं कि प्रशासन तो अपना काम कर रहा था, पर मीडिया ने स्थिति को तनावपूर्ण बना दिया.
वे कहते हैं, "निज़ामुद्दीन की घटना के बाद कोरोना वायरस से सारा फ़ोकस मुसलमानों पर शिफ़्ट हो गया. अगर वहाँ कुछ लोग रुके भी हुए थे, जो उसे अपनी मजबूरी बता रहे हैं, तो उनकी ग़लती की सज़ा पूरे समुदाय को देना कैसे सही है."
दिल्ली की सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी यूं तो तब्लीग़ी जमात की विचारधारा के ख़िलाफ़ बोलती रही हैं, उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर चुकी हैं, लेकिन इस घटना पर उनकी राय है कि कोरोना वायरस फैलाने का आरोप पूरे समुदाय पर लगा देना बहुत बड़ी ज़्यादती है.
उनका मानना है कि इससे मेहनतकश मुस्लिम नौजवानों के लिए रोज़गार की मुश्किलें बढ़ेंगी और उन्हें दुर्भावना का शिकार होना पड़ेगा.

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मुंबई के व्यापारी जफ़र सरेशवाला जो पीएम मोदी के नेतृत्व में कई बड़े व्यापारिक कार्यक्रमों में शिरकत करते रहे हैं, उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "ये चंद लोगों की हरकतें होती हैं जो कट्टरवादी सोच रखते हैं. ऐसा हमने पहले भी देखा है. पहले सोशल मीडिया नहीं था तो ये लोग पर्चे बाँटते थे. पर ऐसे लोग किसी के मौक़े नहीं छीन पाए. जिन मुसलमानों को बुलंदियों पर जाना था, वे गए."
वे बताते हैं, "मुझे आज भी याद है, 1985 के सांप्रदायिक दंगों के बाद अमहदाबाद में भड़काऊ पर्चे बाँटे गए थे जिनमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ बेबुनियाद बातें लिखी थीं. कुछ दिन उनपर चर्चा हुई, फिर सब सामान्य हो गया."
हालांकि नामी सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर हनीफ़ लाखड़ावाला की राय इससे थोड़ी अलग है.
वे बीते 40 वर्षों से ग़रीब व पिछले मुसलमानों के अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं. उनका मानना है कि मुसलमानों से नफ़रत समाज के सभी वर्गों में नीचे तक फैल गई है और सोशल मीडिया पर चल रहे ऐसे मैसेज उनकी इस नफ़रत को बाहर लाने का ज़रिया भर हैं.
डॉक्टर हनीफ़ कहते हैं, "ये लोग क्या करेंगे. क्या यूँ ही इन्हें ताने दिए जाते रहेंगे. बस बहाना हर दफ़े नया ढूंढ़ लिया जाएगा. ये देश इनका भी तो है."
वे कहते हैं कि "कट्टरपंथी सोच वाले लोगों ने भारतीय मुसलमानों को उनके ही देश में ग़ैर में भूमिका में ला खड़ा किया है और ये परिस्थितियाँ धीरे-धीरे हिन्दुस्तान को तबाही की ओर ले जा रही है."



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