कोरोना वायरस: चीन में वन्य जीव मांस पर लगी पाबंदी कितनी कारगर?

चीन के आन हुई में एक दुकान में बाघ की खाल बिक्री के लिए रखी हुई है

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इमेज कैप्शन, चीन के आन हुई में एक दुकान में बाघ की खाल बिक्री के लिए रखी हुई है
    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, बीबीसी पर्यावरण संवाददाता

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

दुनिया भर की कुछ संरक्षण संस्थाओं का कहना है कि चीन में वन्य जीव मांस पर लगी स्थायी पाबंदी बहुत कारगर नहीं होने वाली है क्योंकि अभी भी वन्य जीव उत्पादों का कारोबार दूसरे तरीक़ों से संभव है.

दरअसल वन्य जीव उत्पादों का इस्तेमाल चीनी दवाइयों, कपड़ों और आभूषणों में होता है और इन उत्पादों के कारोबार पर किसी तरह की पाबंदी नहीं है. संरक्षण विशेषज्ञों के मुताबिक़ ऐसे सामानों को मिली छूट के चलते वन्य जीव मांस की ख़रीद बिक्री अभी भी संभव है.

चीन के शहर वुहान के मांस बाज़ार में वन्य जीव मांसों की बिक्री से कोरोना वायरस संक्रमण फैला इसका संदेह जताए जाने के बाद से फ़रवरी से यहां के वन्य जीव मांस पर पाबंदी लगाई गई थी.

लेकिन दवाइयों, कपड़े और आभूषणों के ज़रिए अभी भी ब्लैक मार्केट में वन्य जीवों का मांस की बिक्री जारी रहने को लेकर चिंता जताई जा रही है.

परंपरागत दवायों में भरोसा

पैंगोलिन और तेंदुए जैसे संरक्षित वन्य जीव के मांस की बिक्री को इस पाबंदी से छूट मिली हुई है क्योंकि इनके शरीर के हिस्सों का इस्तेमाल चीन में परंपरागत दवाईयों को तैयार करने में होता है.

बर्डिंग बीजिंग के संस्थापक और वन्य जीव संरक्षण कंसल्टेंट के तौर पर चीन में कार्यरत टैरी टाउनशैंड बताते हैं, "वन्य जीव उत्पादों वाली दवाइयां बहुत फ़ायदेमंद होती हैं, इसकी वैज्ञानिक पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है लेकिन परंपरागत व्यवस्थाओं पर लोगों का भरोसा काफ़ी मज़बूत है."

टैरी यह भी कहते हैं, "उदाहरण के लिए, मेरी जान पहचान में एक बेहद शिक्षित परिवार है, जिनके दो बच्चे हैं. इस परिवार में से एक को फर्टिलिटी संबंधी समस्याएं हैं और दूसरा वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में ही काम करता है. ये लोग जानते हैं कि इन पारंपरिक दवाइयों की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन इसके बाद भी फर्टिलिटी संबंधी समस्या के निदान के लिए अंतिम उपाय के तौर पर वे पैंगोलिन के उत्पाद का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि इससे पहले वे बाक़ी सब उपाय कर चुके हैं."

पारंपरिक दवाइयों में इस्तेमाल किए जाने के चलते ही चीन में पैंगोलिन विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया है. इस जानवर की दुनिया भर में सबसे ज्यादा तस्करी होती है.

अनुसंधानों के मुताबिक़ पैंगोलिन उन वायरसों का करियर हो सकता है जिनमें से एक वायरस के चलते कोविड-19 संक्रमण हो सकता है. हालांकि नेचर जर्नल में प्रकाशित एक आलेख के मुताबिक़, कोरोना वायरस संक्रमण के फैलने में पैंगोलिन की भूमिका की पुष्टि नहीं हो सकी है.

भालू का गॉल ब्लैडर

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इमेज कैप्शन, चीनी पारंपरिक दवाइयों में भालू के गॉल ब्लैडर (पित्त की थैली) का इस्तेमाल होता है, वहीं भालू के दांतों और पंजों का इस्तेमाल पारंपरिक आभूषणों में किया जाता है.

वन्य जीवों का इस्तेमाल

चीन में वन्य जीवों को उनकी खाल हासिल करने के लिए तैयार किया जाता है. 2017 में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ़ इंजीनियरिंग के एक रिसर्च के मुताबिक़ ऊदबिलाव, रैकून कुत्ते और लोमड़ी में क़रीब 75 प्रतिशत वन्य जीवों का इस्तेमाल उनके खाल के लिए किया जाता है.

चीन में वन्य जीवों को क़ैद में रखकर ब्रीडिंग करा कर तैयार किए जा रहे फर और चमड़े के उद्योग के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाली संस्था एक्टएशिया के सह-संस्थापक और सीईओ पेई एफ सू बताते हैं, "2018 में क़रीब पाँच करोड़ जानवरों को उनके चमड़े के लिए मार डाला गया. इन्हीं ऊदबिलाव, रैकून कुत्ते और लोमड़ियों को कै़द में रखकर उनकी ब्रीडिंग कराई जाती है ताकि उनसे फर और चमड़ा हासिल किया जा सके और बाद में उनके मांस की बिक्री की जाए."

चीन के अकादमिक जगत से जुड़े एक्सपर्ट भी मानते हैं कि उनके देश में ऐसा होता है. चीन के शिंहुआ यूनिवर्सिटी के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. जियांग जिन सोंग कहते हैं, "वन्य जीव उत्पादों के कारोबार का लगभग तीन चौथाई हिस्सा फर उत्पादन से संबंधित है. जब तक फर संबंधित उत्पादों पर पाबंदी नहीं लगाई जाती है तब तक वन्य जीवों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाना संभव नहीं होगा. इतना ही नहीं, वन्य जीवों के संरक्षण की तमाम कोशिशें भी कामयाब नहीं होगी."

चीन के एनवायरनमेंटल इंपैक्ट ऑफ़ एसेसमेंट (ईआईए) के 2012 में हुई एक जाँच के मुताबिक़ चमड़े के लिए बाघों का क़ानूनी रूप से ब्रीडिंग कराने वाले कारोबारी बाघों की हड्डियों को दवाईयां और वाइन बनाने के लिए गै़रक़ानूनी ढंग से बिक्री करते हैं.

नई पाबंदी में सजावट के कामों के लिए भी वन्य जीव उत्पादों की बिक्री को छूट दी गई है. पैंगोलिन के मांस की ख़रीद बिक्री गै़रक़ानूनी है लेकिन सजावट के लिए इसके नाख़ूनों की बिक्री को मंज़ूरी मिली हुई है. इसका इस्तेमाल दवाइयों में भी ख़ूब होता है.

बाघ, भालू और अजगर के अलावा चीन में बड़े पैमाने पर मगरमच्छ और सैलामैंडर्स जैसे वन्य जीवों की ब्रीडिंग कराई जाती है.

बाघ की खाल

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भालू के पित्त का इस्तेमाल

चीन के वन्य जीव संरक्षकों के मुताबिक़ चीन में क़रीब 30 हज़ार भालूओं को छोटे-छोटे पिंजरों में कै़द रखकर उसकी फार्मिंग की जा रही है. इन भालूओं के ग्लैब्लैडर से पित्त रस निकाला जाता है जिसका इस्तेमाल परंपरागत चीनी दवाईयों में होता है.

यह मेटल ट्यूब के ज़रिए निकाला जाता है और इससे भालूओं को काफ़ी दर्द झेलना होता है और कई बार वे संक्रमण के शिकार भी हो जाते हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक़ मेटल ट्यूब का इस्तेमाल एक ही जगह पर बार-बार किया जाता है. इसके चलते संक्रमण होने और दूसरी मुश्किलों के चलते भालूओं की मौत भी होती है.

पाबंदी के बावजूद, परंपरागत दवाइयों में इस्तेमाल होने के चलते भालूओं की फार्मिंग को अनुमति दी गई है. वन्य जीव संरक्षकों के मुताबिक़ पित्त निकालने वाले कारोबारी ही गै़र-क़ानूनी ढंग से खाने लायक़ भालूओं के शरीर के दूसरे हिस्सों की भी आपूर्ति करते हैं.

चीन के कुछ हिस्सों में भालूओं के भूने हुए पंजों को स्वाद से खाया जाता है.

चाइनीज़ एकेडमी ऑफ़ इंजीनियरिंग के शोध के मुताबिक़ चीन में वन्यजीवों की फार्मिंग इंडस्ट्री क़रीब 1.4 करोड़ लोगों को रोज़गार मुहैया कराती है और इसका नेटवर्थ क़रीब 56 अरब डॉलर का है. लेकिन माना जा रहा है कि कोरोना वायरस महामारी के बाद चीनी लोगों के वन्य जीव मांस के खान-पान के तौर तरीक़ों में बदलाव आएगा.

खान पान में वन्य जीव मांस

चीन में हाल में हुए एक सर्वे के मुताबिक़, चीन की बहुसंख्यक आबादी एग्ज़ॉटिक (अनोखे) जानवरों के मांस खाने के पक्ष में नहीं है.

इस सर्वे में एक लाख एक हज़ार से ज़्यादा लोग शामिल हुए और इनमें क़रीब 97 प्रतिशत लोगों ने वन्य जीव उत्पादों के खाने का विरोध किया है. अधिकांश लोगों ने सरकार की मौजूदा पाबंदी का समर्थन भी किया है.

वहीं दूसरी ओर जो लोग पाबंदी के पक्ष में नहीं हैं, उनका कहना है कि इससे वन्य जीवों की फार्मिंग पर असर पड़ेगा.

इस सर्वे को पेकिंग यूनिवर्सिटी और सात अन्य संस्थाओं ने मिलकर किया है और इसे चीन की पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं माना जा सकता है.

यह सर्वे ऑनलाइन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर किया गया है. इसके चलते इसमें हिस्सा लेने वाले युवाओं की संख्या ज्यादा है. इसमें हिस्सा लेने वाले क़रीब एक तिहाई लोगों की आयु 19 से 30 साल के बीच है.

टैरी टाउनशैंड कहते हैं, "सर्वे में शामिल लोगों में शहरी तबक़ा ज्यादा है और इनमें से कई पर्यावरण मुद्दे पर काम करने वाले लोगों के दायरे में हैं. ऐसे में आम लोगों की तुलना में इन लोगों ने पाबंदी का ज्यादा समर्थन किया है."

हुआनान सीफूड मार्केट

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इमेज कैप्शन, चीन के वुहान में मौजूद हुआनान सीफूड मार्केट में वन्य जीव का मांस बेचने वाले एक रेस्त्रां का मेन्यू कार्ड. इस मेन्यू में सीवेट, बैंबू रैट और कई अन्य वन्य जीव शामिल हैं.

चीन के युवा लोग क्या सोचते हैं?

बीबीसी ने चीन के जिन युवाओं से बात की है, उन लोगों ने सर्वे के नतीजों का समर्थन किया है.

नाम ज़ाहिर न करने के अनुरोध के साथ बीजिंग के एक युनिवर्सिटी में अंतिम वर्ष की छात्रा शी (बदला हुआ नाम) ने बताया, "मेरे ख्याल से बाज़ार में वन्य जीव उत्पादों के गै़र-क़ानूनी ख़रीद-बिक्री पर रोक का हमें निश्चित तौर पर समर्थन करन चाहिए."

21 साल की शी बताती हैं, "हम अपने रोज़ाना के भोजन में वन्य जीवों का मांस नहीं खाते हैं. लेकिन दूसरे हिस्सों में रहने वाले मेरे कुछ दोस्तों के परिवार वाले उन्हें शार्क मछली के पंख, सांप और मुलायम शेल वाले कछुए इत्यादि खाने के लिए देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें मूल्यवान पोषक तत्व होते हैं."

शी बताती हैं कि स्कूली दिनों में वह कृत्रिम तौर पर तैयार बड़े मेढ़क खाया करती थी लेकिन जब उन्हें मालूम हुआ कि मेढ़कों में पैरासाइट्स हो सकते हैं तब उन्होंने इसे खाना बंद कर दिया.

शी बताती हैं, "कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के बाद चीन के कई युवाओं ने वन्य जीव मांस खाने की पुरानी आदत को छोड़ दिया है."

लेकिन क्या पाबंदी का असर होगा?

चीन की सरकार ने 2003 में सार्स वायरस संक्रमण फैलने के दौरान भी वन्य जीव उत्पाद के कारोबार पर पाबंदी लगाई थी लेकिन कुछ ही महीने के अंदर उसमें ढील दे दी गई. लेकिन वन्य जीव संरक्षकों के मुताबिक़ इस बार की पाबंदियां लंबे समय तक रहने की उम्मीद है.

कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के बाद चीन सरकार की वन्य जीव नीतियों का अध्ययन करने वाले ऑक्सफ़र्ड युनिवर्सिटी के वाइल्डलाइफ़ रिसर्चर युहान ली ने बताया, "कोविड-19 संक्रमण फैलने के बाद चीन की सरकार ने वन्य जीव से जुड़े 600 अपराधों की जाँच की है. इससे उम्मीद की जा रही है कि चीन में क़ानून को लागू कराने पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा."

लेकिन वन्य जीव संरक्षण संस्थाओं से जुड़े लोगों का कहना है कि दवाइयों, फर और आभूषणों के लिए पाबंदी में जो छूट दी गई है, उससे वन्य जीव मांस के ग़ैर-क़ानूनी कारोबार को बढ़ावा मिलेगा.

सरकारी अनुदान पर चलने वाली संस्था चाइना कंजर्वेशन एंड ग्रीन डेवलपमेंट फाउंडेशन के महासचिव जोऊ जिन फेंग ने कहा, "क़ानून में जो ख़ामियां हैं, वह अभी भी गंभीर मुद्दा है. हम इस मामले पर नज़र रखे हुए हैं. वन्य जीव उत्पादों के खान-पान पर लगी पाबंदी के साथ अन्य उपयोग पर भी पाबंदी लगा देनी चाहिए."

वहीं चीन के एनवायरनमेंटल इंपैक्ट ऑफ़ एसेसमेंट से जुड़े मिस्टर व्हाइट का कहना है, "अब सबकी नज़रें चीन के वन्य जीव संरक्षण क़ानून पर टिकी हैं, इस क़ानून को जल्द ही संशोधित किया जाना है. अगर संशोधन के समय में ख़ामियों को दूर नहीं किया जाता है तो फिर यह वास्तव मौक़ा गंवाने जैसा होगा."

प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संरक्षण समूह, द इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर, भी इससे सहमत है.

समूह के एशियाई क्षेत्रीय निदेशक अबान मार्कर काबराजी ने बताया, "चीन को यह सुनिश्चित करना होगा कि संशोधित क़ानून से वन्य जीव उत्पादों के गै़र-क़ानूनी कारोबार पर अंकुश लगाने में मदद मिले और कारोबार पर अंकुश लगाने की रणनीति को मज़बूती मिले."

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