कोरोना पर पश्चिम बंगाल में क्यों हो रही है सियासत

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल में कोरोना वायरस के मरीज़ों और इससे मरने वालों की तादाद बढ़ने के बाद अब इस मुद्दे पर सियासत तेज़ हो गई है.
विपक्षी दलों ने सरकार पर कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा छिपाने और दोनों हाथों से ख़ज़ाना लुटाने का आरोप लगाया है. वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिख कर कोरोना से मुक़ाबले के लिए 25 हज़ार करोड़ रुपए की सहायता के अलावा विभिन्न मद में राज्य की बक़ाया रक़म भी शीघ्र जारी करने की मांग की थी.
मौतों का आंकड़ा छिपाने के विपक्ष के आरोपों के बाद अब सरकार ने रविवार को पाँच सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है जो कोरोना संक्रमण के बाद मरने वाले लोगों के मेडिकल हिस्ट्री की जाँच के बाद इस बात की पुष्टि करेगी कि उनकी मौत कोरोना संक्रमण के चलते ही हुई है या किसी और बीमारी से. लेकिन विपक्ष ने इसे लीपापोती का प्रयास क़रार दिया है.
दरअसल, कोरोना से मरने वालों की तादाद अचानक सात से घट कर तीन पर आने की वजह से विपक्ष के आरोपों को बल मिला है.
पहले कोरोना से सात लोगों के मरने की बात कही जा रही थी. लेकिन उसके बाद मुख्य सचिव राजीव सिन्हा ने हड़बड़ी में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि कोरोना की वजह से राज्य में महज़ तीन लोगों की ही मौत हुई है, जबकि बाक़ी चार लोगों की मौत दूसरी बीमारियों की वजह से हुई है.
सिन्हा ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताया है और कहा है, "ऐसे संकट के समय में कोई भी मृतकों का आंकड़ा बढ़ाएगा या घटाएगा नहीं. यह एक गंभीर मामला है."
उनका दावा है कि मीडिया में जिन चार अन्य लोगों की मौत की ख़बरें आई हैं उनकी वजह दूसरी बीमारियां हैं, कोरोना नहीं. हालांकि उन्होंने स्वीकार किया है कि उन चारों की जाँच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी. वह कहते हैं कि सबके लिए हर चीज़ को जानना ज़रूरी नहीं है.

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लेकिन भाजपा का दावा है कि सरकार अब कोरोना के मुद्दे पर राजनीति कर रही है और मौतों के आंकड़े छिपा रही है.
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष सवाल करते हैं, "आख़िर मरने वालों का आंकड़ा अचानक सात से तीन पर कैसे आ गया? जब बाक़ी चार लोग भी कोरोना की चपेट में थे तो सरकार पक्के तौर पर कैसे कह सकती है कि उनकी मौत की वजह दूसरी थी?"
कोरोना से होने वाली मौतों पर विवाद बढ़ने के साथ राज्य सरकार ने ऐसे मरीज़ों की पुष्टि के लिए एक पाँच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है.
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया, "कोरोना से मरने वालों की तादाद पर उपजे विवाद को दूर करने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के सलाहकार डॉ बीआर सतपथी की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया है. समिति इस बात का पता लगाएगी कि अब तक मृत सात लोगों की मौत कोरोना के चलते ही हुई है या किसी और बीमारी से."
हालांकि भाजपा इससे संतुष्ट नहीं है. दिलीप घोष कहते हैं, "कटघरे में खड़े होने के बाद अब सरकार अपने फ़ैसले पर समिति की मुहर लगवाने का प्रयास कर रही है."

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विपक्षी दलों ने केंद्र से 25 हज़ार करोड़ की मदद मांगने पर भी ममता बनर्जी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है. केंद्र से मदद मांगने के बाद सरकार ने बीते सप्ताह अपने ख़र्चों में कटौती का भी ऐलान किया था. इसके अलावा तमाम विभागों से अब तक ख़र्च नहीं होने वाली रक़म को लौटाने को कहा गया है.
भाजपा नेता दिलीप घोष आरोप लगाते हैं कि कोरोना फैलने से पहले सरकार विभिन्न उत्सवों पर दोनों हाथों से पैसे लुटा रही थी. राज्य के तमाम क्लबों को एक हज़ार करोड़ से ज़्यादा की रक़म बांटी गई है.
विपक्ष का आरोप है कि कोरोना का संक्रमण शुरू होने के पहले से ही सरकार भारी क़र्ज़ में फंसी थी. लेकिन उसने पहले इस जाल से निकलने के लिए बजट में योजनागत और ग़ैर-योजनागत ख़र्चों में कटौती का प्रयास नहीं किया.
विपक्ष का कहना है कि सरकार कोरोना की आड़ में अपने वित्तीय कुप्रबंधन को छिपाने का प्रयास कर रही है.

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माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "सरकार ने हमेशा अनावश्यक मद में भारी रक़म ख़र्च की है. पहले इस पर रोक लगाने का प्रयास नहीं किया गया. लेकिन अब अगर कटौती के नाम पर रोज़गार का सृजन रोक दिया गया तो बंगाल को और गंभीर वित्तीय संकट से जूझना होगा."
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौजूदा स्थिति के लिए पूर्व की वाममोर्चा सरकार को ज़िम्मेदार ठहराती हैं.
वह कहती हैं, "राज्य को लगभग तीन लाख करोड़ का क़र्ज़ विरासत में मिला था. इसके अलावा केंद्र सरकार के पास लगभग 90 हज़ार करोड़ की रक़म बक़ाया है. लेकिन तमाम दिक्क़तों के बावजूद सरकार ने कर्मचारियों को पहली तारीख़ को वेतन का भुगतान कर दिया है."
ममता ने 2020-21 के दौरान से फिस्कल रेस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (एफआरएमबी) एक्ट, 2003 की सीमा सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) के पाँच फीसदी तक बढ़ाने की अपील की है ताकि राज्य सरकार और ज़्यादा क़र्ज़ ले सके. फ़िलहाल यह सीमा तीन फीसदी है. इस अधिनियम के तहत केंद्र से क़र्ज़ लेने के लिए राज्यों के लिए अपना राजस्व घाटा तीन फीसदी या उससे कम रखना अनिवार्य है.
मुख्यमंत्री ने इससे पहले बीते फ़रवरी में भी केंद्र को पत्र भेज कर बक़ाया रक़म शीघ्र जारी करने का अनुरोध किया था.

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वित्त मंत्री अमित मित्र दावा करते हैं, "जीएसटी के हिस्से के तौर पर केंद्र से लगभग 11 हज़ार करोड़ का भुगतान अब तक नहीं मिला है. इसके अलावा विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के मद में लगभग 38 हज़ार करोड़ रुपए बक़ाया हैं."
राज्य के वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में केंद्र से विभिन्न करों और चुंगी के मद में 65,835 करोड़ की रक़म मिलने का ज़िक्र किया गया है. यह पिछले वित्त वर्ष के मुक़ाबले 11 फीसदी ज़्यादा है.
बजट में कहा गया था कि सरकार पर बक़ाया क़र्ज़ की रक़म बीते साल के मुक़ाबले 10 फीसदी बढ़ कर 4.75 लाख करोड़ तक पहुंच गई है. बजट में सरकार ने अपने क़र्ज़ पर ब्याज और मूल धन की वापसी पर 77 हज़ार करोड़ के ख़र्च का प्रावधान किया है.
तृणणूल कांग्रेस के महासचिव और राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं, "महामारी के मौजूदा दौर में विपक्ष को कोरोना से मुक़ाबले के लिए सरकार के साथ मिल कर काम करना चाहिए. कोरोना और इससे निपटने के उपायों पर राजनीति ठीक नहीं है."

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