कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की पहचान सार्वजनिक क्यों कर रही है असम सरकार

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, गुवाहाटी से
अभी हाल ही में पुणे में अधिकारियों ने उन लोगों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोरोना वायरस संक्रमित रोगियों की पहचान को सार्वजनिक कर रहे थे.
लेकिन इसके बिलकुल उलट असम सरकार के स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा अपने लगभग हर संवाददाता सम्मेलन में राज्य में कोविड 19 संक्रमित मरीजों के नाम और उनका पता प्रेस कांफ्रेंस में बता रहे हैं.
ऐसे में ये सवाल लाजमी है कि क्या ऐसा करने से उन मरीजों और उनके परिवार की सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी? क्या उनके रिश्तेदारों के साथ 'छुआछूत' जैसा दुर्व्यवहार होगा?
क्योंकि बीते दिनों में देशभर से ऐसी खबरें सामने आई थी जहां डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ पर मकान मालिक किराए के घर खाली करने का दबाव बना रहे थे.
इन मकान मालिकों को लगता था कि कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की सेवा कर रहे डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ के कारण उनको भी यह बीमारी हो जाएगी.

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असम का मामला
असम में कोविड 19 संक्रमित मरीज का नाम या फिर उनका पूरा पता सार्वजनिक करने को बहुत से लोग सही ठहरा रहे हैं.
साथ ही ये लोग राज्य सरकार को यह भी सुनिश्चित करने को कह रहें है ताकि सोशल मीडिया पर इन मरीजों की पहचान सार्वजनिक कर कोई भी व्यक्ति यहां सांप्रदायिक माहौल खराब न कर दें.
क्योंकि शनिवार शाम 5 बजे तक असम में कोविड 19 संक्रमित के जो कुल 25 मामले सामने आए है उनमें 24 मामले दिल्ली के निजामुद्दीन तबलीगी जमात के मरकज से जुड़े हुए है.
असम के स्वास्थ्य मंत्री सरमा इस बात को मानते हैं कि एचआईवी और एड्स जैसी कुछ बिमारियों में मरीजों की प्राइवेसी का ध्यान रखा जाता है. लेकिन कोविड 19 संक्रमित लोगों के नाम सार्वजनिक करने से उनके संपर्क में आए लोगों का पता आसानी से लगाया जा सकता है और उन्हें तुरंत क्वारंटीन में भेज कर इस बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है.

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लोग डरे हुए हैं...
आधिकारिक तौर पर अबतक किसी भी मरीज या फिर उनके रिश्तेदारों की तरफ से पहचान उजागर करने को लेकर कोई शिकायत नहीं की गई है. लेकिन जिस गांव में कोविड 19 संक्रमित मरीज मिले हैं, वहां के लोग थोड़ा इस बात को लेकर जरूर डरे हुए हैं.
बोको विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में 2 अप्रेल को कोरोना वायरस से संक्रमिक व्यक्ति की पहचान होने के बाद उनके पड़ोस में रहने वाले 20 साल के जाकिर हुसैन (बदला हुआ नाम) कहते हैं, "कोविड 19 संक्रमित व्यक्ति का नाम और पता सार्वजनिक करके सरकार एक तरह से ठीक कर रही है. इससे जमीनी स्तर पर लोग अलर्ट होंगे और अगर बीमारी के लक्षण है तो सामने भी आएंगे. लेकिन दिक्कत इस बात कि है कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर इस महामारी को लेकर हिंदू-मुसलमान कर रहें है. यह उचित नहीं है. क्या कोई जान बूझकर बीमार होना चाहता है?"
असम में कोरोना वायरस से संक्रमित होने के सबसे ज्यादा मामले गोलाघाट जिले में सामने आए है. गोलाघाट सिविल अस्पताल में जिन आठ मरीजों का इलाज चल रहा है वे सभी निजामुद्दीन तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए थे.
पिछले दो-तीन दिनों से इस जिले में खासकर मुसलमानों को लेकर गांवों में कई तरह की अफवाहें फैलाने की खबरें सामने आई हैं.

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प्रशासन का क्या कहना है?
गोलाघाट जिले के पुलिस अधीक्षक पुष्पराज सिंह ने बीबीसी से कहा, "कोविड 19 संक्रमित व्यक्ति का नाम उजागर करने का मतलब यह नहीं है कि प्रशासन किसी को विक्टिमाइज करने की कोशिश कर रहा है. हमारा इरादा किसी को बदनाम करना नहीं है."
"कई बार मरीज के लिए ये बता पाना संभव नहीं होता कि पिछले पांच-छह दिनों में वह कितने लोगों से मिला है. लिहाजा कोविड 19 मरीज का नाम और पता जब प्रकाशित होता है तो उससे संपर्क में आए लोग सामने आ जाते है. इस बीमारी को फैलने से रोकना ही बड़ी चुनौती है. एक भी व्यक्ति छूट गया तो पूरे समाज के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है."
लेकिन पहचान उजागर होने के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की सांप्रदायिक बातें हो रही है. उसको रोकने के लिए प्रशासन क्या कर रही है?
इस सवाल का जवाब देते हुए पुलिस अधीक्षक कहते हैं, "सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस को लेकर एक विशेष धर्म के लोगों को निशाना बनाने की घटनाएं मीडिया के जरिए सामने आई है. हमारे जिले में भी दो दिन पहले किसी ने गांव मे ऐसी ख़बर फैला दी की दो लोगों (मुसलमान) को देखा है."
"इसके बाद गांव के लोग टॉर्च लेकर रात में तलाशने बाहर आ गए. इस तरह की गतिविधियों को रोकने के लिए शुक्रवार से पुलिस ने लीगल एक्शन लेना शुरू कर दिया है. हम लगातार माइक के जरिए घोषणा कर रहें है कि सोशल मीडिया की खबरों पर ध्यान न दे. अगर किसी खबर की सच्चाई पता करनी है तो प्रशासन से संपर्क करें. घर से बाहर निकलने वाले लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी."

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गलत व्यवहार नहीं होना चाहिए...
कामरूप ग्रामीण जिले में कोविड 19 संक्रमित पाए गए एक व्यक्ति के छोटे भाई शाकिर अली (बदला हुआ नाम) भी मानते हैं कि इस बीमारी से पीड़त व्यक्ति की पहचान को सार्वजनिक करना जरूरी है ताकि अन्य लोगों को संक्रमित होने से बचाया जा सके. लेकिन मरीज के रिश्तेदारों के साथ गलत व्यवहार नहीं होना चाहिए.
वो कहते हैं, "मेरे बड़े भाई 18 मार्च को निजामुद्दीन तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल होकर वापस आए थे. उस समय उनका स्वास्थ्य ठीक था. उसके बाद 22 मार्च को आशा कार्यक्रता ने उन्हें घर से निकलने के लिए मना कर गए थे. लेकिन बाद में उनकी तबीयत जब खराब हुई तो जांच की गई और वे कोविड 19 संक्रमित पाए गए."
"अब इन सबमें हमारा क्या कसूर है? गांव के कुछ लोग हमारी आलोचना कर रहें है. डॉक्टर और प्रशासन के लोगों ने हमें घर से बाहर निलकने के लिए मना कर रखा है और हम उनकी बात का पालन कर रहें है. घर पर बच्चे है. बुढ़ी मां है. अगर कोई खाने-पीने का समान चाहिए तो बाहर जाना होगा. लेकिन गांव के लोगों ने हमारा बाहर निकलना बंद कर दिया है. जबकि मेरे बड़े भाई का घर 50 मीटर दूरी पर है और उनका हमारे यहां आना-जाना नहीं है."
सांप्रदायिक बयानबाजी
प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार बैंकुठ नाथ गोस्वामी भी कोरोना संक्रमित मरीजों की पहचान को सार्वजनिक करने की बात को सही ठहराते है.
वो कहते है, "यह एक अलग तरह की बीमारी है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती है. इसलिए संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों की पहचान करने के लिए रोगी का नाम पब्लिक करना एक सही फैसला है. इससे लोग और सतर्क होंगे. लेकिन प्रदेश में बीजेपी की सरकार है लिहाजा कुछ कट्टरवादी विचार धारा के लोग इस बीमारी की आड़ में सांप्रदायिक बयानबाजी करेंगे."
"सरकार को ऐसे लोगों से तुरंत निपटने की जरूरत है ताकि एक विशेष धर्म के लोगों को यह भरोसा मिल सके कि इलाज को लेकर उनके साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा. यह देखना बेहद जरूरी हो गया है कि मुसलमानों को कोरोना वायरस का कैरियर के तौर पर प्रचार कर कोई उन्हें प्रताड़ित ना करें."

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हिमंत बिस्वा सरमा की अपील
हालांकि स्वास्थ्य मंत्री सरमा ने शनिवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में स्पष्ट किया कि उनका विभाग सभी मरीजों की देखभाल और इलाज बहुत बेहतरीन तरीके से करवा रहा है.
उन्होंने मरीजों को दिए जा रहे खाने की तस्वीरें दिखाते हुए कहा, "कुछ लोग सोशल मीडिया पर मरीजों को खराब खाना देने की झूठी अफवाह फैला रहें है लेकिन लॉकडाउन की इस स्थिति में अस्पताल में भर्ती मरीजों और क्वारंटीन में लाए गए लोगों को जो पौष्टिक आहार दिया जा रहा है, वैसा खाना मुझे अपने घर में नहीं मिल रहा है."
"इसके अलावा सभी मरीजों को कोविड 19 नाम से मोबाइल फोन दिया गया है ताकि वे अपने घर वालों से बात कर सके. साथ ही मनोचिकित्सक से लेकर हमारे डॉक्टर वीडियो कॉलिंग के जरिए उन्हें गाइड कर रहें है."
"हम चाहते है कि निजामुद्दीन तबलीगी जमात में शामिल हुए लोग छिपे नहीं बल्कि सामने आए ताकि हम उनकी जांच कर बाकि लोगों को संक्रमित होने से बचा सके."

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