कोरोना वायरस: कमाने आए थे, जान बचाने का संकट आ गया

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

अट्ठाईस साल के प्रेमचंद पीठ पर एक बैग टांगे हुए रामपुर में हाईवे पर बरेली की ओर आगे बढ़ रहे हैं. हाईवे पर वो अकेले नहीं हैं बल्कि उनके जैसे सैकड़ों लोग पूरे रास्ते में देखे जा सकते हैं. उनसे कुछ ही दूरी पर चल रहे तीन लोग अपनी-अपनी पीठ पर बैग भी टांगे हुए हैं और एक बड़े बैग को बारी-बारी से दो लोग पकड़ रहे हैं.

मुँह पर मास्क लगाए हुए प्रेमचंद बताते हैं कि दिल्ली में एक दफ़्तर में वो अस्थाई नौकरी करते थे, लॉकडाउन के कारण दफ़्तर बंद हो गया और उनकी नौकरी भी ख़त्म हो गई. जमा-पूंजी जो थी, उससे दो-चार दिन तक भी पेट भरना मुश्किल था, सो गांव की ओर निकल पड़े. लेकिन उन्हें शायद ही पता रहा हो कि गांव पहुंचने का उनका ये फ़ैसला एवरेस्ट फ़तह करने से कम मुश्किल नहीं था.

प्रेमचंद

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प्रेमचंद बताते हैं, "ट्रेन-बस सब बंद हैं. पैदल चलकर आनंद विहार आए कि वहां से शायद कोई सवारी मिल जाएगी लेकिन नहीं मिली. फिर कुछ लोग पैदल ही आगे बढ़ते गए, उन्हीं के साथ हम भी हो लिए. बैग में बिस्किट इत्यादि कुछ रखे हुए हैं, उसी से पेट भर रहे हैं. तीन दिन चलते-चलते यहां तक पहुंच आए हैं. आगे भी कोई सवारी नहीं मिली तो ऐसे ही चले जाएंगे. बचे रहेंगे तो घर पहुंच ही जाएंगे, नहीं तो जो होना है, वही होगा."

इतना कहते-कहते प्रेमचंद की आंखों से आंसू निकल पड़े और क़दम आगे बढ़ने लगे. पुलिस और प्रशासन के लोगों से उन्होंने कोई मदद क्यों नहीं मांगी, इस सवाल पर उनका जवाब था, "हमारी क़िस्मत अच्छी थी कि दो सौ किलोमीटर तक चलने पर भी पुलिस का डंडा नहीं खाए, मदद की बात छोड़ दीजिए. साथ चल रहे कई लोग मार खा चुके हैं."

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प्रेमचंद का घर फ़ैज़ाबाद यानी अयोध्या में है. उन्हें इतना मालूम है कि इसी रास्ते पर आगे बरेली पड़ेगा, उसके बाद लखनऊ और फिर फ़ैज़ाबाद. यानी वो अपने घर से अब भी क़रीब 350 किमी. दूर हैं. इसी रास्ते पर कुछ दूसरे लोग भी अपने गंतव्य की ओर जा रहे हैं. कुछ को बरेली तक ही जाना है. काफ़ी थके होने के बावजूद उनके चेहरे पर ख़ुशी के भाव हैं क्योंकि मंज़िल अब नज़दीक दिख रही है.

दीनानाथ अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ दिल्ली के मंडावली से पैदल ही निकल पड़े थे. पीलीभीत जाना है. साथ में थोड़ा बहुत खाने का भी सामान रखे थे और रास्ते में कहीं कहीं कुछ सामान दुकानों पर मिल भी गया. ख़ुशक़िस्मत थे कि रास्ते में एक-दो जगह उन्हें कुछ साधन मिलते गए और पूरी यात्रा पैदल तय करने से बच गए. बावजूद इसके, क़रीब सौ किलोमीटर की यात्रा उन्होंने पैदल ही तय की.

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यह सिलसिला तब से चल रहा है जिस दिन जनता कर्फ़्यू लगाया गया था. दरअसल, तमाम दफ़्तरों, मॉलों और दूसरे प्रतिष्ठानों को उससे पहले ही बंद कर दिया गया था और वहां काम करने वाले तमाम दिहाड़ी मज़दूरों को छुट्टी पर भेज दिया गया था. इसके अलावा निर्माण क्षेत्र में लगे बड़ी संख्या में मज़दूर भी काम बंद होने के बाद अपने घरों को जाने को विवश हो गए क्योंकि यहां उनके पास न तो रहने का कोई साधन है और न ही खाने के लिए पैसे.

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गुरुवार को भी दिल्ली की ओर से सैकड़ों की तादाद में पैदल लोगों के समूह बरेली, रामपुर, मुरादाबाद और लखनऊ की ओर कूच करते नज़र आए. दिल्ली से पैदल ही लखीमपुर खीरी जा रहे दिलावर ने लगभग रोते हुए बताया कि उसके सारे पैसे ख़त्म हो गए हैं और ऐसे में यदि उसे कोई साधन मिल भी जाता है तो उसके पास किराये के भी पैसे नहीं हैं.

यह हाल न सिर्फ़ एक-दो जगह का है बल्कि दिल्ली, फ़रीदाबाद जैसी जगहों से उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों की ओर जाने वाले जो भी हाईवे या संपर्क मार्ग हैं, उन सब पर लोगों की ये भीड़ देखी जा सकती है. फ़रीदाबाद से बदायूं की ओर निकले तीन लोगों ने बदायूं में स्थानीय पत्रकार बीपी गौतम को बताया कि पुलिस ने उन्हें परेशान तो नहीं किया लेकिन सीमा पार कराने के लिए सौ-सौ रुपये ज़रूर ले लिए.

यूपी पुलिस

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बाहर रह रहे मज़दूरों की इस विकट समस्या को देखते हुए गुरुवार शाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को सख़्त निर्देश दिए कि ऐसे कोई भी यात्री भूखे न रहने पाएं और उनकी हर संभव मदद की जाए. सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि डायल 112 पर फ़ोन करके किसी भी वक़्त और कहीं भी मदद मांगी जा सकती है. लेकिन इन रास्तों से अपने घरों की ओर लौट रहे तमाम लोग ऐसे भी हैं जिनके पास या तो मोबाइल फ़ोन नहीं हैं और यदि हैं भी तो फ़ोन की बैटरी डिस्चार्ज हो चुकी है.

डायल 112 के एडीजी असीम अरुण कहते हैं, "हमें पता लगा है कि ऐसे कई लोग हैं जो सड़कों या हाईवे पर हैं. उनकी मदद करने के लिए ज़रूरी है कि वे हमें सूचित करें. कोई ख़ुद फँसा हो या फिर किसी को फंसा देख रहे हैं तो 112 पर कॉल कर बताएं. हमने वॉट्सऐप नंबर भी जारी किए हैं, उसके ज़रिए भी सूचना दी जा सकती है. हरसंभव मदद की जाएगी और मदद की भी जा रही है."

हालांकि कई लोगों की यह भी शिकायत है कि 112 नंबर या तो मिलता नहीं है या फिर मिलने के बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती है. फ़ोन पर अधिक लोड होने के चलते फ़ोन न मिलने की बात एडीजी असीम अरुण भी स्वीकार करते हैं लेकिन फ़ोन करने के बाद कार्रवाई न होने की बात वो सिरे से नकारते हैं.

मजदूर

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सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो वायरल हुए हैं जिनमें पुलिस ऐसे राहगीरों पर डंडे बरसाते हुए या फिर उन्हें अन्य तरीक़े से शारीरिक दंड देते हुए दिख रही है. बदायूं में अपने घरों की ओर जा रहे ऐसे ही कुछ लोगों को मेंढक बनाकर चलाने का वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुआ और पुलिस के इस कृत्य की निंदा भी हुई लेकिन ऐसे पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

यूपी पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, "दरअसल, पब्लिक सोचती है कि हमारी हर समस्या का इलाज पुलिस के पास है और सरकार में बैठे बड़े अधिकारी सोचते हैं कि सरकार के हर फ़ैसले को लागू करने की ज़िम्मेदारी पुलिस पर ही है. पुलिस वाले जगह-जगह परेशान लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन मदद मांगने वालों की बातें आप सुन लेंगे तो ख़ुद परेशान हो जाएंगे. मंगलवार को एक व्यक्ति ने फ़ोन किया और कहने लगा कि मैं तीन दिन से भूखा हूं, जल्दी मेरे यहां राशन भिजवाइए नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा. अब बताइए, इन परिस्थितियों में पुलिस वाले क्या करें."

ये अधिकारी कहते हैं, "पहले तो कहा गया कि कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं निकलेगा, जो जहां है, वहीं रहे. लेकिन बाद में आंशिक छूट दी जाने लगी. यही वक्त है कि शुरुआत में पुलिस ने राह चलते लोगों पर सख़्ती ज़रूर दिखाई लेकिन अब उन लोगों को नहीं मार रही है जो अपने घरों को जा रहे हैं. हां, ऐसे लोगों पर ज़रूर सख़्ती की जा रही है जो केवल मौज-मस्ती के लिए घरों से बाहर निकल रहे हैं."

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