फ़ारूक़ अब्दुल्लाह की रिहाई और कश्मीर में राजनीति की आहट

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत प्रशासित कश्मीर में अधिकारियों ने फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को शुक्रवार को रिहा कर दिया जो वहाँ भारत-समर्थक नेताओं में सबसे क़द्दावर नाम है.
रिहाई के बाद उन्होंने कड़ी सुरक्षा वाले गुपकार एवेन्यू स्थित अपने आवास के छज्जे से बाहर मौजूद रिपोर्टरों और समर्थकों से कहा कि वो अपनी आवाम के संघर्ष को संसद के भीतर जारी रखेंगे.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने 2019 में श्रीनगर की लोक सभा सीट से चुनाव जीता था. इसी साल 5 अगस्त को कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया और उन्हें दर्जन भर दूसरे नेताओं के साथ "पब्लिक ऑर्डर को ख़तरे" के नाम पर नज़रबंद कर दिया गया.
सात महीने बाद पहली बार लोगों के सामने अपनी बात रखते हुए अब्दुल्लाह ने कहा, अल्लाह का शुक्र है कि अब मैं एक आज़ाद नागरिक हूँ. मगर ये आज़ादी दूसरे राजनेताओं के बिना अधूरी है. मैं तब तक कोई राजनीतिक बयान नहीं दूँगा जब तक कि उमर अब्दुल्लाह, महबूबा मुफ़्ती और अन्य राजनेताओं को रिहा नहीं किया जाता.
जानकारों का मानना है कि फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को रिहा करने का फ़ैसला दिल्ली सरकार का कश्मीर में राजनीतिक गतिविधियों को बहाल करने की एक कोशिश है.
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'अपनी पार्टी' का उदय
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की पार्टी से अलग हुए उनके पूर्व सहयोगी अल्ताफ़ बुखारी ने हाल ही में एक नई राजनीतिक पार्टी - अपनी पार्टी - का गठन किया है जिसमें महबूबा की पार्टी पीडीपी और फ़ारूक़ की पार्टी नेशनल कॉन्फ़्रेंस के असंतुष्टों को शामिल किया गया है.
कश्मीर में राजनीतिक शून्यता के माहौल में एक नई पार्टी के वजूद में आने को पीडीपी और एनसी ने ख़ारिज कर दिया है और इसे "असल प्रतिनिधियों" को हाशिए पर ले जाने की दिल्ली की एक तिकड़म बताया है.
बुखारी ने पिछले सप्ताह अपनी पार्टी के गठन के मौक़े पर इस बात पर ज़ोर दिया था कि वो लोगों को जनमत सर्वेक्षण और स्वायत्ता के नाम पर झूठे वादे नहीं करेगी.
उनका इशारा फ़ारूक़ अब्दुल्लाह और अलगाववादी नेताओं की ओर था.

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जानकार मानते हैं कि अल्ताफ़ बुखारी के इस क़दम से फ़ारूक़ अब्दुल्लाह जैसे राजनेताओं की रिहाई का रास्ता खुल गया है.
पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार तारिक़ अली मीर कहते हैं, "अपनी पार्टी से कश्मीर में राजनीति के लिए रोड ओपनिंग पार्टी का रास्ता तैयार हुआ है. या तो फ़ारूक़ ने बुख़ारी को एक ख़तरे की तरह देखा और दिल्ली को सहयोग का भरोसा दिया या फिर बुख़ारी का कश्मीर में राजनीति को बहाल करने के मक़सद से इस्तेमाल कर लिया गया."
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह, महबूबा मुफ़्ती और आधे दर्जन से ज़्यादा बड़े राजनेता अभी भी क़ैद में हैं.
'अभी भी 1000 लोग बंद'
गृह मंत्रालय ने पिछले महीने संसद में एक लिखित जवाब में माना कि 5 अगस्त 2019 के बाद से 5000 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया.
सरकार के मुताबिक़ उनमें से अधिकतर लोगों को रिहा कर दिया गया है.

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आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि अभी भी लगभग 1000 लोग पब्लिक सेफ़्टी ऐक्ट (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) के तहत बंद हैं. ये वही ऐक्ट है जिसके तहत फ़ारूक़ और दूसरे नेताओं को बंद किया गया था.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टीकाकार शेख़ क़य्यूम कहते हैं कि फ़ारूक़ अब्दुल्ला की रिहाई से भारत सरकार की अंतरराष्ट्रीय छवि को दुरुस्त करने में मदद मिलेगी जिसे पिछले महीनों में काफ़ी धक्का लगा है.
शेख़ क़य्यूम ने कहा, ये अभी देखना होगा कि फ़ारूक़ अब्दुल्लाह अपनी रिहाई के बाद दिल्ली को क्या पेशकश करते हैं.
उनकी पार्टी ने अभी तक 5 अगस्त के फ़ैसले को स्वीकार नहीं किया है और दिल्ली ने उन्हें इशारों में ये संदेश दिया है कि अल्ताफ़ बुख़ारी जैसी ताक़तें कश्मीर में राजनीतिक शून्य को भरने के लिए तैयार हैं.
वो कहते हैं, बड़ा सवाल अब ये है कि अगर फ़ारूक़ कोई क़दम उठाते भी हैं तो क्या वो उनके बेटे और पार्टी के युवा समर्थकों को मंज़ूर होगा.
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