दिल्ली हिंसा: आख़िर नौ दिनों से लापता धर्मेंद्र कहां है?

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली के बृजपुरी तंग गलियों के एक जाल में हमें 'पेंटर' बीर सहाय के घर की तलाश है.
जिससे भी पूछते हैं वो पहलें ऊपर से नीचे तक देखता है, आगे का रास्ता बताता है और अपनों से फुसपसाता है, "आ गए ये मीडिया वाले."
पिछले शुक्रवार बीर सहाय से एक गली के मुहाने पर मुलाक़ात हुई थी.
हाथ में अपने पंद्रह साल के बेटे धर्मेंद्र की तस्वीर लिए एक दूध की डेरी की सीढ़ियों पर बैठे थे.
पता चला कि धर्मेंद्र 23 फ़रवरी की शाम से घर नहीं लौटा था. यानी वो छठा दिन था धर्मेंद्र के लापता होने का.
दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा में अभी तक 42 लोगों के मरने और 200 से ज़्यादा लोगों के घायल होने की पुष्टि हुई है.
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रोने-बिलखने की आवाज़ें
बीर सहाय का घर ज़्यादा दूर नहीं है चाँदबाग और मुस्तफ़ाबाद से.
इन दोनो इलाक़ों में भी 23-24 फ़रवरी के बीच इन्सानी हिंसा की कुछ दर्दनाक मिसालें देखने को मिली थीं. निशान आज भी दिखते हैं.
जला हुआ एक पेट्रोल पम्प, दर्जनों झुलसे हुए घर और जाल कर कोयले से भी ज़्यादा राख हो चुकी टायर की दुकानें जिन्हें बार-बार देख कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
धर्मेंद्र भी 23 फ़रवरी की शाम से नहीं मिला है. पिता का कहना था, "उसके जेब में सौ रुपये थे और उसे चावल भी ख़रीदने थे, खेलने के बाद."
आख़िरकार हम बीर सहाय के एक मंज़िले घर की संकरी सीढ़ियों तक पहुँच गए. ऊपर चढ़ते समय रोने-बिलखने की आवाज़ें तेज़ होती चली गईं.

किराये के मकान में...
छोटी सी छत के एक कोने में घूँघट ओढ़े चार महिलाएँ सिसक रहीं थीं और मुंडेर पर टेक लगाए धर्मेंद्र के दो बड़े भाई खड़े हुए थे.
धर्मेंद्र की माँ, कमलेश अपाहिज हैं और पिछले एक हफ़्ते में कई दफ़ा खाना न खाने की वजह से बेहोश हो चुकी हैं. बग़ल में धर्मेंद्र की सौतेली माँ उन्हें सहारा दे रहीं थीं.
उन्होंने बताया, "हम लोग घर पर नहीं थे. शाम को हम वापस आए तो फिर ढूँढने लगे लेकिन पता नहीं चला. उस शाम हंगामा हो रहा था तो चाँदबाग़ की तरफ़ भी नहीं जा सके. हमें डर भी लगा रहा था. हमार बच्चा कहाँ है, किस हाल में है, किसी ने क़ैद कर रखा है, जहाँ भी है, हमें अपना बच्चा वापस चाहिए."
उत्तर प्रदेश के बदायूँ ज़िले के रहने वाले बीर सहाय पेशे से पेंटर हैं और क़रीब डेढ़ दशक पहले उत्तर-पूर्वी दिल्ली के बृजपुरी में आकर बस गए थे.
आठ लोगों का परिवार किराये के मकान में रहता है और बीर के अलावा पत्नी भी दूसरों के घरों में काम करके कुछ पैसे काम लेती हैं.

लाचार पिता का दिल
इन दिनों घर में चूल्हा बमुश्किल ही जल रहा है. बीर सहाय पिछले आठ दिनों से अपनी दिहाड़ी के काम पर नहीं गए हैं.
पड़ोस के घरों से खाना आ जाता है और पूरे मोहल्ले को इंतज़ार एक अच्छी ख़बर का है, बस. सोमवार- 2 मार्च- को धर्मेंद्र की गुमशुदगी के नौ दिन हो गए हैं.
एफ़आईआर लिखी जा चुकी है और पुलिस से आश्वासन कुछ इस तरह का मिला है, "अब आप घर पर जाकर बैठिए. धर्मेंद्र को ढूँढ़ना अब पुलिस का काम है."
एक लाचार पिता का दिल कहाँ मानने वाला इस दिलासे पर. दिन-रात मोहल्ले में बेटे की तस्वीर लिए घूमते रहते हैं.
हमारे साथ गुरु तेग बहादुर अस्पताल चलने को तुरंत राज़ी हो गए बीर सहाय.

धर्मेंद्र का नाम
बीर सहाय के पिता बोले, "सीधे शवगृह चलते हैं. नौ दिन में चार बार जा चुका हूँ, अभी तक ऊपर वाले ने साथ दिया है. अब तक कोई सुराग़ नहीं मिला है. हम घायलों को भी देखते रहते हैं. अस्पताल में दाख़िल नहीं होने देते और कुछ बताते भी नहीं हैं. रजिस्टर देख कर बताते हैं बाक़ी कहीं नहीं जाने देते."
सोमवार भी उनके चेहरे पर थोड़ी राहत मिली जब लिस्ट में धर्मेंद्र का नाम कहीं नहीं मिला.
शवों की सूची तैयार करने वाले दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर से भी उंनकी मुलाक़ात करवाई और उन्होंने साफ़ कहा, "अब अंदर शवगृह में सिर्फ़ एक ही शव बचा है बिना शिनाख्त का और वो किसी चालीस साल के आस-पास वाले पुरुष का लगता है."
इस बीच वहाँ मौजूद कई सामाजिक कार्यकर्ता भी आ गए और धर्मेंद्र की तस्वीर की फ़ोटो के अलावा बीर सहाय के घर का पता भी नोट कर गए. बीर सहाय की जान में जैसे फिर से जान आ गई. आगे-आगे चल पड़े, तेज़ क़दमों से. हमने पूछा, "अब किधर?"
जवाब मिला, "चलिए ज़रा. इमरजेंसी में एक बार फिर देख लेते हैं घर लौटने के पहले. नींद तो इन दिनों आती नहीं, थोड़ी तसल्ली ज़रूर मिल जाती है."

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