रोशनबाग़: सीएए के ख़िलाफ़ महिलाओं में बढ़ रहा है आक्रोश

इलाहाबाद, रौशनबाग

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, इलाहाबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
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रोशनबाग़, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) शहर की घनी आबादी वाले उस इलाक़े का एक मोहल्ला है जिसे शहर के आम लोग मुस्लिम इलाक़ा कहते हैं.

इसी इलाक़े के मंसूर पार्क में बड़ी संख्या में महिलाएं पिछले 12 जनवरी से नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ धरने पर बैठी हैं.

मंसूर पार्क की चहारदीवारी के भीतर चारों ओर पतली रस्सी से सीमांकन किया गया है जिसके बाहरी ओर तमाम पुरुष भीतर की ओर धरने पर बैठी महिलाओं की हौसला अफ़ज़ाई कर रहे हैं.

पार्क के एक ओर मंचनुमा जगह है जिसके पीछे बड़ा सा पोस्टर लगा है. चारों ओर कई छोटे-बड़े पोस्टर लगे हैं, मंच से कुछ लोग भाषण दे रहे हैं और सामने ज़मीन पर बैठकर महिलाएं हाथों में पोस्टर और तख़्तियां लिए उन्हें सुन रही हैं और नारेबाज़ी कर रही हैं.

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अगली पंक्ति में बैठी 65 वर्षीया रेहाना बेगम हमें वहां आने की वजह बताती हैं, "हम आज़ादी लेने के लिए यहां आए हैं."

शोर में आवाज़ दब जाती है लेकिन रेहाना बेगम मेरे आग्रह पर अपना जवाब दोहराती हैं. मैंने कहा, "आज़ादी तो हमें 1947 में ही मिल गई थी."

उन्होंने तत्काल इसका भी जवाब दिया, "मोदी जी जो एनआरसी लाए हैं, हमें उससे आज़ादी चाहिए. हम चाहते हैं कि मोदी जी एनआरसी वापस ले लें."

मैंने कहा, "लेकिन एनआरसी तो आया ही नहीं है. मोदी जी ने भी मना किया है."

उनका कहना था, "मोदी जी ने कहा है कि जिनके पास डॉक्यूमेंट नहीं है, उन्हें यहां से निकाला जाएगा."

'लेकिन मोदी जी ने तो ऐसा नहीं कहा है'. मेरे हस्तक्षेप करने पर वो मुस्कराते हुए बोलीं, "अमित शाह कह रहे हैं."

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रेहाना बेगम के ये जवाब बानगी भर हैं. वहां मौजूद लगभग सभी महिलाएं सीएए, एनआरसी और एनपीआर जैसे शब्दों से तो बख़ूबी परिचित हैं लेकिन इनके मायने क्या हैं?

इसके जवाब में उन्हें यही पता है कि 'मोदी और अमित शाह ने कोई क़ानून बनाया है जिससे वो मुसलमानों को हिन्दुस्तान से बाहर का रास्ता दिखा देंगे.'

लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी महिलाएं इस क़ानून के बारे में वही जानती हैं जो रेहाना बेगम या फिर कुछ अन्य महिलाएं.

रेहाना बेगम की बातों को पूरा करने की कोशिश करते हुए सारा अहमद कहने लगीं, "पहली अप्रैल से एनपीआर यानी नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर लागू कर रहे हैं जो एनआरसी का ही शुरुआती रूप है. पीएम कह रहे हैं कि एनआरसी नहीं लाएंगे लेकिन गृह मंत्री कह रहे हैं कि हर हाल में लाएंगे. ये सब क्या है? हमें सीएए से भी आपत्ति है क्योंकि ये धर्म के आधार पर विभाजित करने वाला क़ानून है."

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सारा अहमद किसी निजी कंपनी में नौकरी करती हैं और मंसूर पार्क में धरना शुरू करने वाली कुछ प्रमुख महिलाओं में से एक हैं.

फ़िलहाल उन्होंने नौकरी छोड़ दी है क्योंकि धरना कब तक चलेगा, पता नहीं और इतने लंबे समय तक के लिए उन्हें कोई छुट्टी नहीं देगा.

वो कहती हैं, "यहां न सिर्फ़ मुस्लिम महिलाएं हैं बल्कि पूरे इलाहाबाद से तमाम दूसरे धर्मों से जुड़ी महिलाएं भी हैं. बहुत सी हिन्दू महिलाएं और विश्वविद्यालय की छात्राएं भी हमारे साथ हैं."

एनआरसी, सीएए और एनपीआर के विरोध में इस पार्क में महिलाओं की संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है. उनके समर्थन में कुछ राजनीतिक दलों के लोग भी शामिल हैं लेकिन स्वयंसेवक की तरह, न कि राजनीतिक दल के कार्यकर्ता की तरह. शहर में धारा 144 लागू होने के बावजूद पार्क में तंबू लगा दिया गया है.

ये अलग बात है कि कुछ नामज़द महिलाओं के अलावा बड़ी संख्या में अज्ञात महिलाओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई है. प्रयागराज के एसपी सिटी ब्रजेश श्रीवास्तव कहते हैं, "जो क़ानून तोड़ने की कोशिश करेगा, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी."

हालांकि इस सवाल के जवाब में वो कुछ नहीं कहते कि धारा 144 लागू होने के बावजूद ये महिलाएं वहां कैसे डटी हैं?

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शोध छात्रा नेहा यादव शुरू से ही धरने में शामिल हैं और उनका नाम भी नामज़द लोगों में है. वो कहती हैं, "प्रशासन ने हर तरह से महिलाओं को हटाने की कोशिश की. पुलिस कार्रवाई की धमकी भी दी जा रही है और की भी जा रही है, फिर भी महिलाओं की तादाद लगातार बढ़ रही है. उसकी वजह ये है कि प्रशासन को कार्रवाई का कोई मौक़ा नहीं मिल रहा है, धरना पूरी तरह से शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में हो रहा है."

वहां मौजूद सबीहा मोहानी बताती हैं, "प्रशासन ने काफ़ी कोशिश की कि हम लोग यहां से हट जाएं, लेकिन हमने मना कर दिया. पुलिस के कुछ अधिकारी आए थे. उन्होंने बहुत ही तहज़ीब से हमें समझाया कि आप लोग ज्ञापन देकर यहां से चली जाएं अन्यथा पार्क में पानी भर दिया जाएगा. हम लोगों ने भी उन्हें साफ़तौर पर बता दिया कि हम शांतिपूर्वक अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और वो इसी तरह से जारी रहेगा."

आंदोलन के समर्थन में जुटी महिलाओं के साथ आए पुरुषों ने पतली रस्सी से बनी बैरिकेडिंग के बाहर डेरा डाल रखा है. पुरुषों को वहां आने की इजाज़त नहीं है लेकिन कुछ वकील, पत्रकार या फिर बाहर से उन्हें समर्थन देने आए लोगों को इस नियम में ढील दी गई है.

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घरेलू महिलाओं के अलावा छात्राएं भी यहां काफ़ी संख्या में हैं. चारदीवारी के बाहर चारों ओर चाय, समोसे और पान-मसाले की तमाम दुकानें हैं जिन पर लोगों की भीड़ लगी है. ये दुकानें पहले भी थीं, लेकिन धरने की वजह से इनकी संख्या और कमाई दोनों बढ़ गई है.

धरने में शामिल तमाम महिलाओं के साथ उनके छोटे बच्चे भी हैं. बच्चों को वहां लाने के सवाल पर एक महिला का जवाब था, "बच्चों को हम कहां छोड़कर आएं? और फिर क्यों छोड़कर आएं? आख़िर हम लोग इन्हीं बच्चों के भविष्य के लिए ही तो रात-दिन धरने पर बैठे हैं."

सीएए और एनआरसी के बारे में लोगों में व्याप्त कथित भ्रम को दूर करने के लिए सरकार के कई मंत्री राज्य भर में घूमे, कई रैलियां हुईं, प्रयागराज में भी इसके लिए कार्यक्रम हुए लेकिन इन महिलाओं के पास कोई नहीं आया.

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वहां मौजूद रुख़साना कहती हैं कि केंद्र सरकार इस बारे में पहले अपने भ्रम को दूर करे, तब आम लोगों को समझाए. ऐसा वो इसलिए कहती हैं क्योंकि केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बारे में कही गई बातों में फ़र्क है.

रुख़साना कहती हैं, "अगर उनके दिमाग़ में कुछ नहीं है तो आख़िर ऐसा कर ही क्यों रहे हैं? देश में इतनी दिक़्क़तें हैं, उन पर ध्यान दें. रोज़गार मिल नहीं रहा है, महंगाई आसमान छू रही है, लेकिन इनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा दूसरे देशों के लोगों को नागरिकता देना बन गया है. कुछ न कुछ तो दाल में काला है. दूसरी ओर, हमें बदनाम किया जा रहा है कि हमें पैसे मिल रहे हैं."

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धरने में शामिल महिलाओं को जितनी आपत्ति सीएए और एनआरसी से है, उससे ज़्यादा हैरानी इस बात पर भी है कि उनकी बात सुनने के लिए कोई नहीं आ रहा है.

एमकॉम की छात्रा शाहिदा परवीन रुंधे गले से बोलीं, "आख़िर क्या अमित शाह जी हमारे गृह मंत्री नहीं हैं, जो वो हम लोगों के लिए ऐसी बात कह रहे हैं. रैली करके लोगों को समझा रहे हैं लेकिन हमारे पास आने का भी तो वक़्त निकाल सकते हैं. हम अख़बार में पढ़ते हैं रोज़ कोई न कोई मंत्री शहर में आ रहा है लेकिन हमारे पास कोई मिलने तक नहीं आया."

प्रयागराज में इस समय हर साल संगम किनारे लगने वाला माघ मेला चल रहा है तो 27 जनवरी से पांच दिवसीय गंगा यात्रा भी शुरू हो गई है.

लेकिन वहां मौजूद महिलाओं का यही कहना है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि इनमें से कोई उनका हाल जानने नहीं आएगा.

मंसूर पार्क में धरने पर बैठी महिलाओं को न्यायपालिका के अलावा सिर्फ़ प्रधानमंत्री पर भरोसा है कि वो उनकी बात सुन सकते हैं और मान सकते हैं.

हालांकि ऐसी महिलाओं की संख्या भी बेहद कम है. लेकिन इस बात की आशंका सभी को है कि वीआईपी आगमन, धारा 144 और क़ानून-व्यवस्था के नाम पर उनके धरने को ख़त्म करने की कोशिश की जा सकती है. लेकिन लक्ष्य तब तक यहीं बैठने का है, जब तक कि उनकी मांगें मान नहीं ली जातीं.

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