शाहीन बाग़ की औरतें: आख़िर इन प्रदर्शनों में जोश का 'करंट' किसने पहुंचाया?

- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
26 जनवरी की सुबह, दिल्ली का राजपथ. देश की झांकियां देख रहे लोगों पर फूल बरसाने वाले हेलिकॉप्टर कहां तक जाते हैं? कहीं भी जाते हों. लेकिन इतना तय है कि ये हेलिकॉप्टर शाहीन बाग़ नहीं जाते हैं.
शाहीन बाग़ में जो औरतें देश की झांकी पूरी दुनिया को दिखा रही हैं, वो फूल से महरूम रहती हैं.
हरिशंकर परसाई ने सालों पहले लिखा था- 'सत्यमेव जयते' हमारा मोटो है मगर झांकियां झूठ बोलती हैं. राज्यों को वो ख़ास बात दिखानी चाहिए, जिसकी वजह से वो राज्य मशहूर हुआ.
अगर परसाई की इस सलाह को अपनाया जाता है तो यक़ीनन उत्तर प्रदेश की झांकी में बर्तन धोते लड़के को गोली मारना ज़रूर दिखता. या फिर झांकी में किसी मां का बेटे के जाने के बाद आंसू को पोंछना तो पक्का दिखता.
महाराष्ट्र की झांकी पर सजाए पेड़ों पर फांसी लगा चुके किसानों की छूटी रस्सी तो लटकी ही होती. बंगाल और केरल की झांकियों में राइट लेफ्ट के मारे कार्यकर्ताओं की ख़ून से सनी तस्वीरों की आर्ट गैलरी बनी होती.
झांकियों में शाहीन बाग़ भी नहीं दिखा. जेंडर इंक्वॉलिटी वाली ठंडक परेड में सिर्फ़ मोटर साइकिल पर करतब दिखाती लड़कियों को देखकर हासिल कर ली गई. राजपथ में भीड़ व्यवस्थित बैठी रही. 14 किलोमीटर दूर अव्यवस्थित सी दिखने वाली भीड़ ने दादियों, अम्मियों और लड़कियों की अगुवाई में बिना फूल बरसाते हेलिकॉप्टर का इंतज़ार किए बगैर तिरंगा फहरा दिया.

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शाहीन बाग़ ने कौन सा चांद देख लिया?
तंग गलियों, बंद दुकानों और गालों में तिरंगा चिपकाए आते-जाते लोग. दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में औरतों और लड़कियों की इतनी तादाद अकसर सिर्फ़ ईद पर देखने को मिलती है.
न जाने कौन सा चांद शाहीन बाग़ ने देख लिया कि इनकी ईद ही पूरी नहीं हो रही.
मंच पर उमर खालिद खड़े हैं. मैंने उंगली पर गिना तो कम से कम 30 से ज़्यादा चीज़ों से नारे लगाकर आज़ादी मांगी गई. मंच के नीचे बुर्के और हिजाब में बैठी ज़्यादातर औरतों को देखा तो धरनास्थल से मिसिंग एक नारा मन में मैंने जोड़ दिया- औरतों को जबरन पर्दे में रखने से लेंगे आज़ादी?
धरनास्थल पर जहां औरतें बैठी हैं, अगर उस तरफ़ कोई आदमी बढ़े तो कुछ आदमी रोक देते हैं- 'औरतें बैठी हैं. आप प्लीज़ इससे पीछे रहें.' तिरपाल पर जमी धूलों को लड़के झाड़ू से साफ़ कर रहे हैं.
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पीछे की तरफ सड़कों के ज़्यादातर हिस्से पुते हुए हैं. कहीं हुक्मरानों पर तंज करती पेंटिंग्स. हिजाब पहने लड़कियां माइक से आज़ादी के नारे लगा रही हैं. शाहीन बाग़ में एक इंडिया गेट भी बना है, जो अब इलाक़े की पहचान है.
'हेलो, अरे कहां है? कब से देख रा तेरे को.
भैय्ये यहीं आ जा. इंडिया गेट के पास खड़ा हूं.'
फ़ोन पर किसी के ये कहते ही मन में खयाल आया कि दोनों इंडिया गेटों के बीच कितने सारे बंद दरवाज़ें हैं. शाहीन बाग़ इन दरवाज़ों को खोलने का काम कर रहा है.
शाहीन बाग़ बस स्टैंड पर बनी फ़ातिमा शेख़ लाइब्रेरी में एक लड़की 'भारत गांधी के बाद' किताब पढ़ रही है. कुछ दूरी पर डिटेंशन कैंप का ढांचा बना हुआ है.
फुटब्रिज पर एक बैनर लगा है- जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं?

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शाहीन बाग से कालिंदी कुंज की तरफ़ बढ़ते-बढ़ते आप सड़क पर देखेंगे कि 'हम देखेंगे' नज़्म के कागज़ी पुर्ज़ों से सड़क पटी पड़ी है.
अकसर मॉल्स में हाइजिन के चलते 20 की बजाय 70 रुपये का पानी ख़रीदने वाले लड़के और लड़कियां सड़क पर बैठे पाउच से पानी पी रहे हैं. शाम की तैयारी हो रही है. ई-रिक्शों को तिरंगे से सजाया जा रहा है.

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तिरंगे ही तिरंगे...
शाहीन बाग़ से जामिया की तरफ बढ़ें तो लगभग एक-दो किलोमीटर तक सिर्फ़ तिरंगे ही तिरंगे हैं.
जिस सड़क और जामिया की लाइब्रेरी में स्टूडेंट्स हिंसा का शिकार हुए थे, अब वहीं आज़ादी आज़ादी के नारे लग रहे हैं. स्टूडेंट्स ने अपने छोटे-छोटे अलग गुट बनाए हैं लेकिन सबका नारा एक ही है- आज़ादी.
कोई ये सवाल पूछ सकता है कि आज़ादी न मिली होती तो सड़क जाम करके नारे लगा रहे होते? कोई ये जवाब दे सकता है कि आज़ादी मिलने से ज़्यादा बचाए रखने की चीज़ होती है.
मैं इस सवाल जवाब में नहीं पड़ता हूं. सड़क में आगे बढ़ता हूं.
जामिया के गेट नंबर-1 के पास सड़क पर पीएम नरेंद्र मोदी समेत कई और पेंटिंग्स बनाई जा रही हैं. सड़क अपेक्षाकृत ख़ाली है. आर्टिस्ट का जमावड़ा है. ई-रिक्शा से ऑडी की गाड़ियों से तिरंगा लहरा रहा है.
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चौकीदार का जागते रहो और शाहीन बाग़ का जागना
शाहीन बाग़ की असली ताक़त रात में पता चलती है. दोपहर से रात होने के इंतज़ार में मैं दोस्तों के साथ जामिया के पास ही सिनेमाहॉल में कंगना रनौत की 'पंगा' फ़िल्म देखने में लगता हूं.
ये सवाल मन में आता है कि कुछ किलोमीटर की दूरी पर रील और रियल दोनों जगह व्यवस्था से 'पंगा' चल रहा है. 'जो सपने देखते हैं, वो पंगा लेते हैं.'
पंगा फ़िल्म चौकीदार के 'जागते रहो' से शुरू होती है. शाहीन बाग़ में बिना चौकीदार के कहे सैकड़ों औरतें महीनों से जाग रही हैं. न जाने चौकीदार को ये बात बुरी लग रही है या अच्छी?
फ़िल्म में एक जगह कंगना कहती हैं- कबड्डी वालों को कौन पहचानता है? मन में खयाल आता है कि ऐसा ही हाल विरोध प्रदर्शन वालों का भी है.
जाने-अनजाने कंगना ने फ़िल्म 'पंगा' में शाहीन बाग़ मसले पर अपनी चुप्पी तोड़ी है. बस आपको कंगना के इन डॉयलॉग्स के साथ कुछ ब्रिज बनाने होंगे.
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1. 'आपका खयाल कौन करेगा? आपको स्ट्रॉन्ग कौन करेगा?'
ब्रिज: संविधान
2. 'सारी वीमेन इंपावरमेंट की बातें हवा वो जाएंगी. मां के सपने नहीं होते.'
ब्रिज: होते हैं कंगना, यक़ीन न हो तो शाहीन बाग़ की मांओं से पूछ लो.
3. 'बचकर नहीं तोड़कर निकलना होगा.'
ब्रिज: शाहीन बाग़ को सलाह देने के लिए शुक्रिया.
4. 'जया निगम (कंगना) का बेटा पूछता है- आप कब खेलोगे मम्मा?'
ब्रिज: शाहीन बाग़ की औरतों के बच्चे ये सवाल अब नहीं पूछेंगे.

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'हम न रहे तो बच्चे किसको गले लगाएंगे'
फ़िल्मों में अकसर हीरो या हीरोइन का कसरत करता हुआ कमबैक किसी गाने से शुरू होता है और गाना पूरा होते-होते कमबैक हो चुका होता है.
अंधेरा होते ही ख़त्म हो चुकी 'पंगा' फ़िल्म में ऐसा ही हुआ. शाहीन बाग़ में भी ऐसा ही होता दिख रहा है. आज़ादी आज़ादी का गाना जब हर जगह फैल जाएगा, तब लोकतंत्र का कमबैक हो चुका होगा.
रात को शाहीन बाग़ में खड़ा किया भारत का नक्शा दूर से ही चमकता है. औरतें अपने बच्चों के साथ शाहीन बाग़ जा रही हैं.
एक औरत से मैंने पूछा- आपा क्यों आती हैं इधर बच्चों के साथ, पुलिस से डर नहीं लगता?
वो कहती हैं, ''ये NRC बीमारी है, पूरे शरीर में फैलेगी. अभी न रोकी तो आगे दिक़्क़त होगी. अगर हम बच्चों को छोड़कर यहां आए और हमें कुछ हो गया तो हमारे बच्चे किसे गले लगाएंगे. जहां हम, वहीं हमारे बच्चे.''
दुकानें सुबह की ही तरह बंद हैं. सड़क पर कुछ रेहड़ी वाले हैं. वेद प्रकाश गजक बेच रहे हैं. मैं पूछता हूं कि भइया ये प्रदर्शन कब तक चलेगा?
जवाब मिला- एक महीना तो भइया चलेगा ही.
मैं उनसे पूछता हूं कि बड़ी दुकानें तो बंद हैं लेकिन आपकी तो ख़ूब चल रही होगी. वो हां में जवाब देते हैं. मेरे कानों में तभी कहीं से 'है हक़ हमारा...' वाला नारा गूंज उठा.
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शाहीन बाग़ को सिर्फ़ एक डर
जिस डंडे पर सुबह तिरंगा लहरा रहा था, अब उसे टेढ़ा करके तिरंगा उतारा जा रहा है. इस दौरान किसी को वीडियो नहीं बनाने दिया जा रहा है.
मेरे वजह पूछने पर एक लड़का जवाब देता है- भइया ये गोदी मीडिया वाले पता नहीं क्या दिखा दें कि हम तिरंगे का अपमान कर रहे हैं. अभी ज़रा वेल्डिंग हो जाए इस खंभे की. तब आप बना लेना वीडियो.
शाहीन बाग़ के मंच पर जेएनयू छात्रसंघ प्रेसिडेंट आइशी घोष आई हैं. लोगों पर इस ऐलान का ख़ास असर नहीं है क्योंकि सब अपने आज़ादी के नारों में व्यस्त हैं.
एक लड़का किसी का नाम लेते हुए नारे लगा रहा है- ''चूड़ी पहनकर डांस करो...चूड़ी पहनकर डांस करो.''
तभी पीछे से आकर उस लड़के के हाथ से माइक छीनकर ऐसा करने से मना करता है. इसी झुंड से अगला नारा था- JNU ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद.
कुछ इंग्लिश बोलने वाले लड़के लोगों को पोस्ट-कार्ड पकड़ाकर बोल रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को कुछ लिखना चाहें तो लिखिए. मैंने पूछा कि ये क्या है और आप क्या स्टूडेंट हैं?
वो बोला- डेटा एनालिस्ट का काम करता हूं, अच्छा ख़ासा बिजनेस है. लेकिन अब ये एक लाख कार्ड छपवाए हैं, लोगों से लिखवाकर सुप्रीम कोर्ट भेजेंगे.

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पॉलिथीन से कार्ड निकालते हुए एक पेन का ख़ाली रैपर ज़मीन पर गिरता है. वो लड़का उसे उठाने बढ़ता है तो मैं कहता हूं कि पेन नहीं है, ख़ाली रैपर है भाई.
वो जवाब देता है- गंदगी नहीं फैलानी है भाई.
मंच के पास एक लड़की सड़क पर पड़ा तिरंगा उठाकर सम्मान से बाइक पर रखती है. मैं उसके कपड़ों से उसे पहचानता, इससे पहले माथे पर बिंदी दिख गई. पहचानने की सारी नई परिभाषाएं वहीं धराशायी हो गईं.
शाहीन बाग़ में औरतों या बच्चों की एक भीड़ ऐसी भी थी, जो खाने के फ्री पैकेट देखते ही दौड़ पड़ती. आज़ादी के 72 साल बाद भी कुछ लोग ये दौड़ क्यों लगा रहे हैं? ये कहानी फिर सही.
धरना स्थल के स्टेज के पास क़रीब 50 साल के आलम अपनी बेगम से कहते हैं- यहीं बैठ जाओ. मैं लेने आ जाऊंगा. पीछे ही खड़ा हूं.
मैं आलम से पूछता हूं कि मुसलमान समाज में इस तरह औरतें कभी बाहर नहीं निकली थीं, अब क्या हो गया? क्या वाक़ई औरतों को 500 रुपए मिल रहे हैं?
वो जवाब देते हैं, ''अब अपनी पर आ गई है तो निकलेंगे ही. हमारी ज़िंदगी तो कट गई लेकिन हमारे बच्चों का क्या होगा. अपने बच्चों के लिए तो आना ही पड़ेगा. रही बात 500 रुपए वाली तो भाईजान यहां रईस घरों की औरतें भी आती हैं, कई-कई तो फ्लैट हैं. तुम इन्हें 500 रुपए में ख़रीदोगे?''
मंच से कुछ ही दूरी पर बच्चों की लाइब्रेरी में रौनक बढ़ गई है. सेल्फियां खींची जा रही हैं. नारे बुलंद होते जा रहे हैं.
गणतंत्र दिवस की वजह से पूरे देश में सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम थे. शाहीन बाग़ और जामिया में हज़ारों लोगों की काफी भीड़ थी लेकिन 'सदैव आपके साथ' नारे वाली दिल्ली पुलिस आपको यहां साथ क्या...दूर खड़ी भी नज़र नहीं आएगी.
26 जनवरी जैसे-जैसे 27 जनवरी की ओर बढ़ रही थी. शाहीन बाग़ में औरतें बढ़ रही हैं.
मैं उन्हीं तंग गलियों से घर की तरफ लौट पड़ता हूं. बिना 500 रुपए लिए या किसी को 500 रुपए देते हुए देखे बिना.
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