अपनी-अपनी भारतीयता बनाने-बचाने की लड़ाई जारी है: नज़रिया

विरोध प्रदर्शन करते लोग

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    • Author, प्रियदर्शन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

देश में जैसे आंदोलनों, जलसों और जुलूसों का मौसम है. उत्तर भारत की कड़कड़ाती ठंड को चुनौती देते हुए दिल्ली से अहमदाबाद-हैदराबाद तक अलग-अलग शहरों और विश्वविद्यालयों के युवा और छात्र कहीं नागरिकता संशोधन कानून, कहीं राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर, कहीं छात्रों की पिटाई और कहीं फीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ सड़क पर हैं.

केरल, असम और बंगाल तक इनकी अनुगूंजें ही नहीं, इनका विराट रूप दिखाई पड़ रहा है. दिलचस्प यह है कि कहीं-कहीं इन आंदोलनों के विरोध में भी जुलूस निकल रहे हैं. यानी एक पक्ष ने अगर नागरिकता क़ानून के विरोध में जुलूस निकाला है तो दूसरा उसके समर्थन में निकाल रहा है.

बेशक दिल्ली में होने और अपने शानदार एकैडमिक इतिहास के चलते जेएनयू इन आंदोलनों की नब्ज़ बना हुआ है. अचानक हम पा रहे हैं कि सारे मुद्दों के बीच जेएनयू का समर्थन या विरोध सबसे अहम मुद्दा बनता जा रहा है. दीपिका पादुकोण जेएनयू जाकर छात्रों के साथ खड़ी भर होती हैं कि सोशल मीडिया की दुनिया उनके समर्थन और विरोध में बंट जाती है.

कुछ लोग उनकी फिल्म 'छपाक' इसलिए देखना चाहते हैं कि उन्होंने जेएनयू के छात्रों के समर्थन में खड़े होकर अपने लोकतांत्रिक विवेक का परिचय दिया है और एक तरह से सरकार के साथ खड़े जेएनयू प्रशासन का विरोध किया है जबकि कुछ लोग उनकी फिल्म के बहिष्कार पर आमादा हैं क्योंकि उन्होंने जेएनयू जाकर 'राष्ट्रवाद पर तेज़ाब फेंका' है. यहां तक कि केंद्र सरकार की कुछ प्रमोशनल योजनाओं से दीपिका पादुकोण को अलग किया जा रहा है.

दीपिका पादुकोण जेएनयू में

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समर्थन और विरोध की परस्पर टकराती इस राजनीति के बीच आंदोलन के जो मूल मुद्दे हैं- वे या तो खो गए हैं या फिर लगभग अप्रासंगिक हो चले हैं. सरकार कहती है- और ठीक ही कहती है- कि नागरिकता संशोधन क़ानून से किसी भारतीय की नागरिकता नहीं जाएगी और एनआरसी- यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को असम के बाहर लागू करने का अभी कोई प्रस्ताव नहीं है.

लेकिन फिर वह कौन-सी चीज़ है जो नागरिकों को इस क़दर डरा रही है कि वे पढ़ाई, कारोबार, घर-बाज़ार- सबकुछ छोड़ कर लगातार आंदोलन कर रहे हैं? आख़िर शाहीन बाग की औरतें अपने घर और रसोई की सिमटी और उलझी हुई दुनिया से बाहर आकर क्यों जलसे-जुलूस और धरने को अपना घर-बिस्तर बनाए हुए हैं? सरकार कहती है कि इन्हें विपक्ष ने भरमाया हुआ है. लेकिन यह विपक्ष पिछले छह साल में इस देश को भरमा क्यों नहीं पाया जो नागरिकता क़ानून या एनआरसी या जेएनयू-जामिया के मुद्दे पर भरमाने में कामयाब रहा है?

दरअसल, यह वह सवाल है जिसका जवाब कुछ वर्तमान की राजनीति में मिलता है और कुछ उस इतिहास में जिसे हम अब तक पीछे छोड़ नहीं पाए हैं. मसला न सिर्फ नागरिकता क़ानून का है और न सिर्फ़ जेएनयू की फीस बढ़ोतरी का. यह भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीयता की उस परिभाषा का है जो कई तरह से संकटग्रस्त की जा रही है. मामला दो तरह की भारतीयताओं के टकराव का है जो अपनी-अपनी दृष्टि को वैध मानती हैं और सामने वाली दृष्टि को विभाजनकारी.

अगर पिछले तीन साल से जेएनयू लगातार किसी न किसी वजह से विवाद में है तो उसके पीछे भी यही परस्पर टकराती वैचारिक दृष्टियां हैं.

इन वैचारिक दृष्टियों और इनके आधार पर बंटी हुई दो भारतीयताओं की पहचान बहुत आसान है.

मॉब लिंचिंग

पहली धारा

जो आरक्षण विरोधी हैं, वे उदारीकरण के समर्थक भी हैं, वही कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के साथ हैं, वही अफज़ल की फांसी के समर्थक हैं, वही रोहित वेमुला के पक्ष में चली राजनीति के विरोधी हैं, वही राम मंदिर बनाए जाने की कल्पना से खुश हैं, वही तीन तलाक के पक्ष में हैं, वही नक्सवालद के ख़ात्मे के नाम पर ग्रीन हंट जैसी कार्रवाइयों के समर्थक हैं.

वही लोग गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग करने वाली भीड़ को सहानुभूति से देखते हैं और कभी-कभी उसे माला भी पहना देते हैं, वही लोग वंदे मातरम को देशभक्ति की कसौटी मानते हैं, वही लोग भारत के इतिहास को एक हज़ार साल की गुलामी के इतिहास की तरह पढ़ते हैं और मुगलों को आक्रांता मानते हैं, वही लोग आर्यों को भारत का मूल निवासी मानना चाहते हैं, वही लोग नेहरू से नफ़रत करते हैं और गांधी से इतनी मोहब्बत नहीं करते कि गोडसे को पूजने वालों को दुत्कार सकें.

वही लोग तीन तलाक पर सरकारी कानून को बिल्कुल सही मानते हैं और वही लोग नागरिकता क़ानून और एनआरसी की वकालत भी करते हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि फिलहाल इनकी तादाद बहुत बड़ी है और बीजेपी के बहुमत वाली एनडीए सरकार को इन लोगों का पूरा समर्थन हासिल है. दरअसल, अपने बहुसंख्यक होने का बल इन लोगों के भीतर यह गुमान भी भरता है कि उनकी ही दृष्टि अंतिम और प्रामाणिक दृष्टि है, वही पूरा देश हैं और जो उनकी इस सोच के विरोध में है, वह देशद्रोही है, अर्बन नक्सल है, टुकड़े-टुकड़े गैंग है और देश के हित नहीं चाहता.

विरोध प्रदर्शन करतीं लड़कियां

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दूसरी धारा

दूसरी तरफ़ एक भारतीयता वह भी है जो याद करती है कि यह देश बहुत सारी धाराओं से मिल-जुल कर बना है, कि इस देश के स्वाधीनता संग्राम के दौरान इसकी वह राष्ट्रीयता और नागरिकता विकसित हुई है जिसमें सभी विश्वासों के लिए जगह है, कि संविधान वह पवित्र किताब है जिसे इस देश का मार्गदर्शक होना चाहिए, कि रोहित वेमुला की आत्महत्या को दलितों के साथ हो रहे सामाजिक भेदभाव और अत्याचार के ऐतिहासिक सिलसिले की तरह देखा जाना चाहिए.

दूसरी धारा मानती है कि सभी समुदायों को बराबरी के साथ जीने का वह हक़ है जो बहुसंख्यकवादी राजनीति के दबावों की वजह से छिनता लग रहा है, वे मानते हैं कि देश को सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, लैंगिक सहभागिता और वैज्ञानिक सोच की उस आधुनिक और मानवीय दृष्टि के साथ गढ़ा जाना चाहिए जो गांधी, नेहरू और अंबेडकर की साझा विरासत है. इसी भारतीयता का एतराज़ इस बात पर है कि जो नया नागरिकता क़ानून है, वह पहली बार सभी समुदायों की सहज नागरिकता की संवैधानिक व्यवस्था को नकार कर एक समुदाय की नागरिकता को सिर्फ़ धर्म के आधार पर रोक रहा है.

इसी भारतीयता को डर है कि अगर इसके साथ एनआरसी जैसी व्यवस्था आ जुड़ी तो यह एक घातक मेल होगा जो इस देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यकों पर भारी पड़ेगा. क्या यह डर बेवजह है? सरकार यही कह रही है, लेकिन क्या यह भूलने की बात है कि इस आंदोलन से पहले तमाम चुनावों में बीजेपी के तमाम बड़े नेता, और अलग-अलग राज्यों में उसके मुख्यमंत्री अपने यहां एनआरसी लागू करने-करवाने की बात बार-बार करते रहे हैं? जाहिर है, संदेह है तो उसकी राजनीतिक वजहें भी हैं.

विरोध प्रदर्शन करते लोग

तो मामला दो तरह की भारतीयताओं के बीच चुनाव का है. लेकिन, यह इतना आसान मामला भी नहीं है. कुछ भोले या सयाने लोग इसे कांग्रेस बनाम बीजेपी बनाना चाहते हैं- जो कहीं से यथार्थ के आसपास नहीं है. ज़्यादा जटिल सच्चाई यह है कि दो अलग-अलग दृष्टियों की यह समस्या हमारे स्वाधीनता संग्राम के दिनों से ही चलती रही है.

इतिहासकार सुधीरचंद्र इस बात की ओर ध्यान खींचते हैं कि कैसे आज़ादी की लड़ाई के दौर में राष्ट्रवाद का एक मतलब हिंदू राष्ट्रवाद भी हुआ करता था जो कांग्रेस के भीतर मौजूद था. हिंदू महासभा और आरएसएस तो उन दिनों इस लायक भी नहीं थे कि किसी भी तरह की राष्ट्रीयता का वहन कर पाते. राम मनोहर लोहिया ने 'भारत विभाजन के गुनहगार' नाम की जो किताब लिखी है, बेशक, उसके आठ गुनहगारों में ब्रितानी कपट, मुस्लिम लीग की फूटनीति और कांग्रेस के उतार के अलावा हिंदू अहंकार को भी गिना है. उन्होंने लिखा है कि हिंदू महासभा के रवैये से विभाजन में मुस्लिम लीग को सहायता मिली.

विरोध प्रदर्शन करते लोग

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बुरी तरह बँटा समाज

नया भारत बनाने में जुटे लोग बँटवारे के समय की नफ़रत को भूलकर नहीं, बल्कि उसी के आधार पर नया भारत खड़ा करना चाहते हैं इसलिए नागरिकता क़ानून पर चल रहे आंदोलन को वे हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखना-दिखाना चाहते हैं, पीएम मोदी यूँ ही नहीं कहते कि वे कपड़ों से लोगों को पहचान सकते हैं कि कौन आग लगा रहा है. उनकी कोशिश यह साबित करने की है कि सारा हंगामा जामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय या शाहीन बाग में चल रहा है जिसमें मुसलमान ही हिस्सेदार हैं. लेकिन कोई-न-कोई आकर हर बार इसे गलत साबित कर जाता है.

अचानक हम पाते हैं कि मुंबई में कश्मीर को लेकर एक तख्ती उठाए खड़ी लड़की मुस्लिम नहीं ठेठ मराठी है और दिल्ली के लाजपत नगर में घर-घर जाकर मिलते बीजेपी अध्य़क्ष अमित शाह के सामने अपने छत से एनआरसी के विरोध का बैनर लहराने वाली लड़कियां भी हिंदू हैं. शाहीन बाग की शानदार औरतों के बीच भी हिंदू औरतें बैठी हुई हैं. जेएनयू मे भी बॉलीवुड से कोई खान नहीं गया, दीपिका ही पहुंच गईं.

दरअसल, इन आंदोलनों की एक ख़ूबसूरती यह भी है. इनमें बहुत बड़े पैमाने पर लड़कियां शामिल हैं. वे नारे लगा रही हैं, वे मुठ्ठी उछाल रही हैं, वे अपने पिटते साथियों को बचा रही हैं, वे पिट रही हैं, उनके बाल खींचे जा रहे हैं, लेकिन वे मैदान और मोर्चा नहीं छोड़ रही हैं, वे राष्ट्रपति भवन तक मार्च करने की अपील कर रही हैं.

विरोध प्रदर्शन करते लोग

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इन लड़कियों को समझ में आता है कि भारत की समतामूलक आस्था ही उनकी सुरक्षा और स्वतंत्रता की गारंटी है. इसे अगर धर्म आधारित राज्य में बदलने की कोशिश की गई तो पहली चोट उनकी लैंगिक बराबरी पर ही पड़ेगी.

देश भर में चल रहे ये आंदोलन दरअसल अपना-अपना भारत बचाने-बनाने की कोशिशें हैं. इन्हे चुनावी राजनीति या बहुसंख्यकवाद के बल से नहीं समझा जा सकता. इसे उस जज़्बे से समझना होगा जो अंततः कई संस्कृतियों के तार से बने एक मज़बूत भारत की कल्पना करता है.

दिल्ली में अमित शाह को बैनर दिखाने वाली लड़कियां किरायेदार थीं. उनको उनके मकान मालिक ने घर से निकाल दिया. लेकिन, भारत कोई किराये का मकान नहीं है. यहां सब हुए हैं और सब रहेंगे और कोई किसी को निकाल नहीं पाएगा. जनता दरअसल अलग-अलग आंदोलनों से सरकारों को यही याद दिला रही है. यह ज़िद और भरोसा ही हिंदुस्तान की असली ताक़त है.

(इस लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं.)

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