जेएनयू में जौहरी के अलावा भी बहुत कुछ चल रहा है

विरोध प्रदर्शन
    • Author, प्रज्ञा मानव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में आजकल पढ़ाई कम और प्रदर्शन ज़्यादा हो रहे हैं.

छात्रों से लेकर शिक्षकों तक, सब नाराज़ हैं.

पढ़ने वाले इस बात पर ग़ुस्सा हैं कि यौन उत्पीड़न के आठ आरोप लगने के बाद भी एक प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

तो पढ़ाने वालों की नाराज़गी इस बात पर है कि प्रशासन उनसे सलाह लिए बग़ैर एक के बाद एक नए नियम क्यों बनाए जा रहा है?

हमने स्टूडेंट यूनियन और टीचर्स एसोसिएशन से पूछा कि यूनिवर्सिटी में आख़िर चल क्या रहा है?

उनके मुताबिक़, 2016 के बाद से वहां ऐसे कई नियम बनाए गए हैं जिन पर शिक्षकों और छात्रों को एतराज़ है.

उन्हें लगता है कि नए नियम -

  • व्यावहारिक नहीं हैं,
  • जेएनयू की विविधता और समावेश की नीतियों की अनदेखी करते हैं
  • और यूनिवर्सिटी की लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और उदारवादी सोच से मेल नहीं खाते.
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'एक के बाद एक नियम थोपे जा रहे हैं'

जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के सचिव सुधीर कुमार बताते हैं कि "पिछले दो साल में एक के बाद एक बहुत से बदलाव किए गए हैं. हमारी परंपरा खुलकर चर्चा करने की रही है. जेएनयू में हमेशा लोकतांत्रिक ढंग से फ़ैसले लिए जाते थे. लेकिन नया निज़ाम आने के बाद से एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल (ईसी) आपस में मिलती है, बातचीत करती है और इससे पहले कि हमें कुछ पता चले, एक नया नियम लागू कर दिया जाता है."

स्टूडेंट यूनियन की वाइस प्रेसीडेंट सिमोन ज़ोया ख़ान की नाराज़गी जीएसकैश को हटाने पर है. "जेएनयू में लड़कियों को इंसाफ़ दिलाने के लिए एक कमेटी होती थी जीएसकैश जिसे प्रशासन ने पिछले साल ख़त्म कर दिया. उसकी जगह आईसीसी लाई गई जिसमें सारे सदस्य प्रशासन ने चुने हैं. उस पर भरोसा नहीं है इसलिए लड़कियां इंसाफ़ मांगने पुलिस के पास जा रही हैं."

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जेएनयू को आईआईटी बनाने की तैयारी?

टीचर्स एसोसिएशन की प्रेसीडेंट सोनाझरिया मिन्ज़ कहती हैं कि "कोई भी शिक्षक क्लासरूम छोड़कर हड़ताल पर बैठना नहीं चाहता. हमें सत्याग्रह करना पड़ा क्योंकि प्रशासन बातचीत करने को तैयार ही नहीं है. नियम बना दिया कि एम.फ़िल और पीएचडी के वाइवा सिर्फ़ स्काइप के ज़रिए किए जाएंगे. इसी तरह रिसर्च स्कॉलर्स के लिए भी अटेंडेंस ज़रूरी बना दी गई. इन नियमों पर बड़े स्तर पर बातचीत की जानी चाहिए थी. हमने बार-बार अनुरोध किया, लेकिन फिर भी नियमों का पालन नहीं किया गया."

जेएनयू के वाइस चांसलर 2016 जनवरी में बदले गए. नए वीसी एम जगदीश कुमार उससे पहले आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पढ़ाते थे.

शायद इसी वजह से जब उन्होंने सभी छात्रों के लिए 75 फ़ीसदी अटेंडेंस को ज़रूरी बनाया तो कहा गया कि वे जेएनयू को आईआईटी बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

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'जेएनयू में पहले भी अटेंडेंस देखी जाती थी'

सिमोन का मानना है कि "अगर आईआईटी जैसे नियम बनाने हैं तो फिर इंफ़्रास्ट्रक्चर भी आईआईटी जैसा देना चाहिए. हमारे यहां कई बार हॉस्टल मिलने में भी साल भर लग जाता है. कमरों की दीवारों और छतों में दरारें हैं, सीलन आ रही है, हॉस्टलों में पानी 12 बजे ख़त्म हो जाता है. रात को ज़्यादातर सड़कों पर स्ट्रीट लाइट नहीं जलतीं जबकि इस्टेबलिशमेंट, सिक्योरिटी और यूटेंसिल चार्ज 200 फ़ीसदी बढ़ा दिए हैं, इसी तरह स्काइप पर वाइवा करने के लिए कह दिया, लेकिन कई बार कनेक्शन ही नहीं जुड़ता. इन सब बातों पर ध्यान नहीं है तो फिर अटेंडेंस के मामले में ही क्यों बाक़ी कॉलेजों से तुलना की जा रही है?"

सुधीर कुमार इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि "ऐसा नहीं है कि जेएनयू में पहले अटेंडेंस का ख़्याल नहीं रखा जाता था. ये पूरी तरह से ग़लत धारणा है जिसे फैलाया जा रहा है. हमारे यहां सबको अपने नियम बनाने की आज़ादी रही है. जेएनयू में हर स्कूल का अटेंडेंस जांचने का अपना तरीक़ा है. कुछ स्कूल प्रोग्रेस रिपोर्ट लेते हैं तो कुछ प्रेज़ेंटेशन बनवाते हैं. उसके बाद ही आगे बढ़ाया जाता है. लेकिन अब एक फ़ॉर्मेट बना दिया है जिसमें नाम लिखकर साइन करना होता है. उसे पोर्टल पर डाल दिया है और सबसे कहा जा रहा है कि उसी को फ़ॉलो करो."

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चेयरपर्सन और डीन हटाए गए

अटेंडेंस को ज़रूरी बनाने का विरोध सिर्फ़ फ़ॉर्मेट की वजह से ही नहीं हो रहा.

जेएनयू में ऐसे बहुत से स्टूडेंट्स हैं जो सोशल साइंस और ह्यूमैनिटी के विषयों में रिसर्च कर रहे हैं. उनका ज़्यादातर समय लाइब्रेरी या फ़ील्ड में बीतता है जो उनके लिए ज़रूरी है. ऐसे में उन पर क्लास या लैब में मौजूद रहने की शर्त लगाना व्यावहारिक नहीं लगता.

पिछले हफ़्ते जेएनयू के सात चेयरपर्सन और डीन को अपने पद से हटा दिया गया. बताया जाता है कि उन्होंने अटेंडेंस के इस नियम को अपने यहां लागू करने से मना कर दिया था.

इसके अलावा भी ऐसा बहुत कुछ है जिससे नाराज़ होकर जेएनयू के टीचर्स तीन दिन तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे.

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दाखिले की शर्तें बदल दी गईं

जेएनयू प्रशासन ने यूजीसी के 2016 के नोटिफ़िकेशन को आधार बनाकर रिसर्च कार्यक्रमों में दाखिले की योग्यता शर्तें बदल दी हैं.

अब लिखित परीक्षा में 50 फ़ीसदी और वाइवा में 100 फ़ीसदी पाने के बाद ही दाखिला मिल सकता है.

साथ ही सीटों की संख्या को 1100 से घटाकर 300 से भी कम कर दिया गया है.

सुधीर कुमार को लगता है कि ऐसा करके प्रशासन ने जेएनयू के सामाजिक न्याय और बराबरी के सिद्धांत को धराशायी कर दिया है. "हमारे यहां पिछड़े इलाक़ों से आने वाले छात्रों और लड़कियों के लिए डेप्रिवेशन पॉइंट्स हुआ करते थे. साथ ही सरकार भी ओबीसी, एससी, एसटी को आरक्षण देती है. लेकिन अगर आप सीट इतनी कम कर दें और योग्यता के लिए 50 फ़ीसदी की शर्त लगा दें तो ख़ुद-ब-ख़ुद बहुत से लड़के-लड़कियां बाहर हो जाएंगे. हमारी हमेशा से सोच रही है कि जेएनयू एक छोटा भारत बनकर रहे जहां हर वर्ग, हर राज्य का प्रतिनिधित्व हो. लेकिन ऐसे नियमों के बाद ये कैसे हो पाएगा?"

सोनाझरिया मिन्ज़ बताती हैं कि "2016 से पहले रिसर्च कार्यक्रमों में हमारी आरक्षित सीटें भरी रहती थीं. लेकिन पिछले साल सिर्फ़ तीन एससी-एसटी उम्मीदवारों को सीटें ऑफ़र की जा सकीं और उनमें से भी कितनों ने मंज़ूर कीं, पता नहीं."

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जेएनयू को बड़े पैमाने पर स्वायत्ता मिली

जेएनयू में क़रीब 600 शिक्षक हैं. शिक्षकों की कुछ जगहें अभी खाली हैं, लेकिन सुधीर कुमार बताते हैं कि उन्हें बिना किसी की राय लिए दूसरे स्कूलों में ट्रांसफ़र किया जा रहा है.

सुधीर कुमार के मुताबिक़ "जब कोई स्कूल अपने यहां कुछ टीचर्स की जगह बनाता है तो उसके पीछे वजह होती है. अगर कोई जगह नहीं भरी जा सकी तो उसका मतलब ये नहीं है कि उसे उठाकर दूसरे स्कूल में ट्रांसफ़र कर दिया जाए. वैसे भी रिज़र्व्ड पोज़ीशन को ऐसे ट्रांसफ़र नहीं किया जा सकता. उसका एक तरीक़ा होता है. बाक़ायदा लाइज़ाँ अधिकारी की रिपोर्ट ली जाती है. लेकिन अब बस चेयरपर्सन से सहमति ली जाती है और सीटें दूसरे स्कूल में ट्रांसफ़र कर दी जाती हैं. और अब तो ऐसी ख़बरें भी आ रही हैं कि शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए एक आचार संहिता (कोड ऑफ़ कंडक्ट) बनाने पर भी काम चल रहा है. सुन रहे हैं कि उसके लिए एक कमेटी बनाई गई है, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि उसमें हमारे किसी प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया."

जेएनयू को अब यूजीसी से हाई ऑटोनोमी यानी अपने बहुत से फ़ैसले ख़ुद लेने की आज़ादी मिल गई है.

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जेएनयू की स्वायत्तता के मायने क्या हैं?

इसके तहत जेएनयू को नया कोर्स शुरू करने, कैंपस के बाहर कोई सेंटर बनाने, रिसर्च पार्क या नए शैक्षणिक कार्यक्रम बनाने, विदेशी शिक्षकों को नौकरी देने, विदेशी छात्रों को दाखिला देने, पत्राचार शैक्षणिक कार्यक्रम चलाने और शिक्षकों की तनख़्वाह में इंसेंटिव शामिल करने के लिए यूजीसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं है.

सोनाझरिया मिन्ज़ को लगता है कि ये फ़ैसला उनकी मुश्किलें और बढ़ा देगा, "अब तो प्रशासन को मनमर्ज़ी की और आज़ादी मिल जाएगी."

जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन ने 19 से 21 मार्च तक भूख हड़ताल और सत्याग्रह किया.

सुधीर कुमार कहते हैं कि एसोसिएशन इस लड़ाई को छोड़ेगा नहीं. उनके मुताबिक़, अब तैयारी संसद तक मार्च निकालने की है.

बीबीसी ने इन सारी शिकायतों पर जेएनयू के वाइस चांसलर एम जगदीश कुमार का पक्ष जानने की कोशिश की. उन्हें फ़ोन किया गया तो पता चला कि वे आजकल दफ़्तर नहीं आ रहे हैं. जिसके बाद उन्हें एक ईमेल भेजी गई जिसका ये रिपोर्ट छपने तक कोई जवाब नहीं आया है.

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