निर्भया गैंगरेप- वो जो दोषी ठहराए गए

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16 दिसंबर 2012 के बाद से जब कभी देश में किसी बच्ची, लड़की या महिला के साथ बलात्कार हुआ तो हर बार उन मामलों की तुलना निर्भया गैंगरेप मामले से की गई.
कठुआ गैंगरेप से लेकर उन्नाव रेप केस और हालिया हैदराबाद गैंगरेप की अमानवीयता ज़ाहिर करने के लिए भी निर्भया गैंगरेप से ही तुलना की गई.
दिल्ली का निर्भया गैंगरेप- वो मामला जिसकी क्रूरता के बारे में जिसने भी सुना, पढ़ा या देखा उसे ये यक़ीन करने में वक़्त लगा कि ये सब कुछ 'इंसानों' ने किया. साल 2012 की इस घटना में छह लोग पकड़े गए थे और अदालत ने उन्हें दोषी पाया है.
एक दोषी ने सज़ा काटने के दौरान जेल में आत्महत्या कर ली. एक नाबालिग़ था, तो उसे बाल-सुधार गृह भेज दिया गया था. जबकि बाक़ी चारों की फांसी की सज़ा बरक़रार रखी गई.

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राम सिंह
राम सिंह को इस मामले में मुख्य संदिग्ध बताया गया था. मार्च 2013 में तिहाड़ जेल में राम सिंह की लाश मिली थी.
पुलिस के मुताबिक राम सिंह ने ख़ुद को फांसी लगाई थी लेकिन बचाव पक्ष के वकीलों और राम सिंह के परिवार का आरोप था कि राम सिंह की हत्या की गई.
बस ड्राइवर राम सिंह का घर दक्षिण दिल्ली के रविदास झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी में था. राम सिंह ही उस बस का ड्राइवर था जिस पर 16 दिसंबर 2012 को निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और भयावह आंतरिक चोट की वजह से कुछ दिनों बाद उनकी जान चली गई.
राम सिंह के पड़ोसियों का कहना है कि शराब पीना और झगड़ा करना राम सिंह के लिए आम बात थी.
राम सिंह का परिवार क़रीब 20 साल पहले राजस्थान के एक गांव से दिल्ली आया था. राम सिंह पांच भाइयों में से तीसरा था. पढ़ने के लिए स्कूल में दाख़िला तो कराया गया था लेकिन प्राथमिक स्तर पर ही पढ़ाई छोड़ दी.
निर्भया गैंगरेप में सबसे पहले राम सिंह को ही गिरफ़्तार किया गया था.

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मुकेश सिंह
मुकेश सिंह और राम सिंह सगे भाई थे, मुकेश छोटा है. वह अपने बड़े भाई के साथ ही रहता था और कभी-कभी बतौर बस ड्राइवर या फिर क्लीनर का काम किया करता था.
मुकेश सिंह को निर्भया और उनके दोस्त को लोहे की छड़ से पीटने का दोषी पाया गया हालांकि उसने हमेशा इससे इनकार किया.
ट्रायल के दौरान मुकेश सिंह ने कहा था कि घटना की रात वह बस चला रहा था जबकि बाक़ी चार लोगों ने युवती के साथ बलात्कार किया और उसके दोस्त की पिटाई की.
लेकिन अदालत ने मुकेश सिंह को भी दोषी माना और उसे भी मौत की सज़ा सुनाई.

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विनय शर्मा
क़रीब 26 साल का विनय शर्मा एक एक जिम में बतौर असिस्टेंट काम करता था. राम सिंह की ही तरह विनय का घर भी रविदास झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी में था.
दोषियों में से सिर्फ़ विनय ने ही स्कूली शिक्षा हासिल की थी और थोड़ी-बहुत अंग्रेज़ी भी बोल लेता है.
साल 2013 की गर्मियों में विनय शर्मा ने कॉलेज के पहले साल का इम्तिहान देने के लिए एक महीने की ज़मानत की अर्ज़ी दी थी लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया था.
ट्रायल के दौरान अदालत में विनय शर्मा ने दावा किया था कि जब ये घटना हुई थी तब वह बस में ही नहीं था. उसका दावा था कि वह, एक अन्य दोषी पवन गुप्ता के साथ एक संगीत कार्यक्रम देखने गया हुआ था.

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अक्षय ठाकुर
34 वर्षीय बस हेल्पर अक्षय ठाकुर का ताल्लुक बिहार से है. अक्षय को घटना के पांच दिन बाद 21 दिसंबर 2012 को बिहार से गिरफ़्तार किया गया था.
अक्षय पर बलात्कार, हत्या और अपहरण के साथ ही घटना के बाद सुबूत मिटाने की कोशिश करने का भी आरोप था.
अक्षय उसी साल बिहार से दिल्ली आया था.
विनय की तरह अदालत में अक्षय ठाकुर ने भी बस में मौजूद होने से इनकार किया था.

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पवन गुप्ता
पेशे से फल बेचने वाले 25 साल के पवन गुप्ता ने भी अपने बाकी साथियों की तरह अदालत में दावा किया था कि बलात्कार के समय वह बस में नहीं था और विनय शर्मा के साथ संगीत कार्यक्रम सुनने गया हुआ था.
अदालत में बतौर गवाह पेश हुए पवन के पिता हीरा लाल ने कहा था कि उनका बेटा बेक़सूर है और उसे मामले में ''फंसाया'' गया है.
हीरा लाल ने कहा था कि घटना वाले दिन उनका बेटा दोपहर को दुकान बंद कर घर चला गया था, शराब पीकर और खाना खाकर वह पास के पार्क में एक संगीत कार्यक्रम सुनने चला गया.
पवन के पिता का कहना था कि वह अपने एक रिश्तेदार के साथ जाकर पवन को पार्क से घर लेकर आए थे.

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नाबालिग़ दोषी
इस अपराध का छठा दोषी घटना के समय 17 साल का था इसलिए उस पर बतौर नाबालिग़ मुक़दमा चलाया गया.
31 अगस्त 2013 को नाबलिग़ को बलात्कार और हत्या का दोषी पाया गया और उसे एक सुधार गृह में तीन साल के लिए भेज दिया गया. भारतीय क़ानून के तहत किसी भी नाबालिग़ को दी जाने वाली ये सज़ा की सबसे ज़्यादा मियाद है.
नाबालिग दोषी उत्तर प्रदेश के एक गांव का रहना वाला है. 11 साल की उम्र में वह दिल्ली आ गया था. उसका नाम ज़ाहिर करने पर क़ानूनी रोक है.
उसकी मां ने बीबीसी को बताया था कि उनकी अपने बेटे से आख़िरी बार तब बात हुई थी जब वो दिल्ली की बस में सवार हुआ था. मां का कहना था कि जब तक दिसंबर 2012 में पुलिस ने उनके घर आकर उन्हें नहीं बताया था कि वह बलात्कार मामले में पकड़ा गया है, तब तक उन्हें लगता था कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है.
नाबालिग़ का परिवार गांव के सबसे ग़रीब परिवारों में से है. उसके पिता मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं.

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क्या हुआ था 16 दिसंबर 2012 को ?
यह मामला 16 दिसंबर 2012 का है, जब राजधानी दिल्ली में 23 साल की फ़िज़ियोथिरेपी छात्रा और उसके साथी पर चलती बस में हमला किया गया था. युवती से छह लोगों ने सामूहिक बलात्कार करके, दोनों को सड़क पर फेंक दिया था.
पुलिस ने इसके बाद बस ड्राइवर समेत पांच लोगों को गिरफ़्तार किया था. इसमें से नाबालिग़ युवक पर सबसे ज़्यादा क्रूरता बरतने के आरोप थे.
युवती को दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कराया गया, पर उसकी हालत बिगड़ती गई. उन्हें सिंगापुर के अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया गया.
लेकिन वहां भी उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और 29 दिसंबर को गैंगरेप की शिकार छात्रा की मौत हो गई.

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फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई सुनवाई
निर्भया गैंगरेप के बाद पूरे देश में ज़बरदस्त प्रदर्शन हुए और बलात्कार के ख़िलाफ़ कड़े क़ानून बनाने की मांग उठी थी.
23 दिसंबर 2012 को दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस मामले की सुनवाई और जल्द निपटारे के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनी.
3 जनवरी 2013 को पुलिस ने 33 पेज की चार्जशीट दायर की थी. 21 जनवरी 2013 को कैमरे की निगरानी में छह अभियुक्तों के ख़िलाफ़ केस की सुनवाई शुरू हुई.
नाबालिग़ की सुनवाई कर रहे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 28 जनवरी 2013 को अपने अहम फ़ैसले में उसे नाबालिग़ घोषित कर दिया. दो फ़रवरी को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोप तय कर दिए.
अदालत की कार्यवाही के दौरान 11 मार्च 2013 को राम सिंह तिहाड़ जेल की बैरक में मृत पाया गया.
इस मामले में 31 अगस्त 2013 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने नाबालिग़ अभियुक्त को निर्भया से बलात्कार और हत्या का दोषी पाते हुए तीन साल की सज़ा सुनाई थी. तीन सितंबर 2013 को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में बाक़ी चार अभियुक्तों के ख़िलाफ़ सुनवाई ख़त्म हो गई थी जिसमें कुल 130 बैठकें हुईं और सौ से ज़्यादा गवाहियां दर्ज की गईं थी.
चश्मदीद गवाह के रूप में बलात्कार पीड़ित के दोस्त को अदालत में पेश किया गया था. वो इस मामले के सबसे अहम चश्मदीद गवाह थे जो हादसे के दौरान बस में मौजूद भी थे.
अभियुक्तों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता के तहत हत्या, सामूहिक बलात्कार, हत्या की कोशिश, अपहरण, अप्राकृतिक अपराध, डकैती, डकैती के दौरान हिंसा, सबूत मिटाने और आपराधिक षडयंत्र जैसी धाराएं लगाई गई थीं.
इस मामले से जुड़ी अहम तारीख़ें और फ़ैसले
16 दिसंबर 2012: 23 वर्षीय फ़िज़ियोथेरेपी छात्रा के साथ चलती बस में छह लोगों ने गैंगरेप किया. छात्रा के पुरुष मित्र को बुरी तरह पीटा गया और दोनों को सड़क किनारे फेंक दिया गया.
17 दिसंबर 2012: मुख्य अभियुक्त और बस ड्राइवर राम सिंह को गिरफ़्तार कर लिया गया. अगले कुछ दिनों में उनके भाई मुकेश सिंह, जिम इंस्ट्रक्टर विनय शर्मा, फल बेचने वाले पवन गुप्ता, बस के हेल्पर अक्षय कुमार सिंह और एक 17 वर्षीय नाबालिग को गिरफ़्तार किया गया.
29 दिसंबर: सिंगापुर के एक अस्पताल में पीड़िता की मौत. शव को वापस दिल्ली लाया गया.
11 मार्च 2013: अभियुक्त राम सिंह की तिहाड़ जेल में संदिग्ध हालत में मौत. पुलिस का कहना है कि उसने आत्महत्या की, लेकिन बचाव पक्ष के वकील और परिजनों ने हत्या के आरोप लगाए.
31 अगस्त 2013: जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने नाबालिग अभियुक्त को दोषी माना और तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भेजा.
13 सितंबर 2013: ट्रायल कोर्ट ने चार बालिग अभियुक्तों को दोषी क़रार देते हुए फांसी की सज़ा सुनाई.
13 मार्च 2014: दिल्ली हाई कोर्ट ने फांसी की सज़ा को बरक़रार रखा.
मार्च-जून 2014: अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला आने तक फांसी पर रोक लगा दी.
मई 2017: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट की फांसी की सज़ा को बरक़रार रखा.
जुलाई 2018: सुप्रीम कोर्ट ने तीन दोषियों की पुनर्विचार याचिका को ख़ारिज किया.
6 दिसंबर 2019: केंद्र सरकार ने एक दोषी की दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजी और नामंज़ूर करने की सिफ़ारिश की.
12 दिसंबर 2019: तिहाड़ जेल प्रशासन ने उत्तर प्रदेश जेल प्रशासन को जल्लाद मुहैया कराने के लिए अनुरोध किया.
13 दिसंबर 2019 : निर्भया की मां की ओर से पटियाला हाउस कोर्ट में फांसी की तारीख़ तय करने को लेकर एक याचिका दायर की गई थी. जिसमें चारों दोषी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा पटियाला हाउस कोर्ट में पेश हुए.
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