क्या सिर्फ़ न्यायिक बोझ 'सरकाती' हैं फ़ास्ट ट्रैक अदालतें?

बलात्कार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हैदराबाद की वेटनरी डॉक्टर लड़की के बर्बर बलात्कार और हत्या के बाद अपना पहला बयान जारी करते हुए तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने मामले की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में करवाने की घोषणा की है.

2012 के निर्भया हत्याकांड से लेकर आज तक, जब भी बलात्कार का कोई मामला राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ता है तो पहली प्रतिक्रिया के तौर पर राज्य सरकारें मामले को 'फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट' में स्थानांतरित कर देती हैं.

नई फ़ास्ट ट्रैक 'स्पेशल' अदालत

बीती जुलाई केंद्र सरकार ने बलात्कार और पोक्सो क़ानून (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस ऐक्ट) के तहत दर्ज होने वाले मामलों में सुनवाई की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए 1023 नए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की थी.

इन नई प्रस्तावित अदालतों के ब्योरे में क़ानून मंत्रालय ने कहा कि ये फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (एफटीएससी) महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ हुए यौन अपराधों के देश भर में 1.66 लाख लंबित मामलों के जल्दी निपटान के लिए गठित की जा रही हैं.

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पोक्सो से जुड़े मामले

मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश के वह सभी ज़िले जहाँ पोक्सो के तहत दर्ज हुए लम्बित मामलों की संख्या 100 से ज़्यादा है, वहां यह नई अदालतें ख़ास तौर पर सिर्फ़ पोक्सो से जुड़े केस ही सुनेंगी.

अदालत के निर्देश के अनुसार देश के कुल 389 जिलों में पोक्सो एफटीएससी के गठन की प्रक्रिया जारी है. बाक़ी बची 634 एफटीएससी बलात्कार के साथ साथ पोक्सो से जुड़े मामले भी देख सकती है.

फ़ास्ट ट्रैक अदालतें

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कुल 767 करोड़ रुपये की लागत से बन रही इन अदालतों से हर प्रति अदालत कम से कम 165 मामलों की सुनवाई पूरी करने की उम्मीद है.

हालांकि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में 'फ़ास्ट ट्रैक अदालतों' का अस्तित्व दो दशक पुराना है.

फिर सवाल यह उठता है कि इन फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स को 'फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट' में तब्दील करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई. और यह कि पुरानी व्यवस्था में लगभग दो दशकों से सक्रिय यह 'फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट' पीड़िताओं को न्याय दिलाने में अब तक आख़िर कितने कारगर रहे हैं ?

फ़ास्ट ट्रैक अदालतें

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'फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट' की शुरुआत

भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में सबसे पहले फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत 2000 में हुई.

तब ग्यारवें वित्त आयोग की रिपोर्ट की सिफ़ारिशों के अनुसार 502 करोड़ की लागत से देश में 1734 नई अदालतें बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ.

2005 तक के लिए शुरू की गई इस योजना को बाद में बढ़ा कर 2011 तक जारी रखा गया.

इसके बाद केंद्र सरकार ने तो फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स के लिए आगे बजट जारी नहीं किया लेकिन कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर बजट का प्रावधान कर इनको बनाए रखा.

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ताज़ा आँकड़े

26 जून 2019 को क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किए गए आँकड़ों के अनुसार मार्च 2019 तक देश में मात्र 591 फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रही थीं जिनके ऊपर कुल 5.9 लाख लंबित केसों का बोझ था.

इसी जवाब के अनुसार मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे बड़े राज्यों समेत देश के कुल 56 प्रतिशत राज्यों में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं हैं.

बजट की बात करें तो केंद्र सरकार बीते दो दशकों में कुल 870 करोड़ रुपए इन विशेष अदालतों पर ख़र्च कर चुकी है.

आँकड़ों से साफ़ है कि इतने ख़र्च और दशकों के निवेश के बाद भी फ़ास्ट ट्रैक अदालतें न्यायिक व्यवस्था से लम्बित मामलों के बोझ कम करने में नाकाम रही हैं.

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जज-जनता अनुपात

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता और वरिष्ठ वक़ील के सी कौशिक बाक़ी देशों की तुलना में भारत में जजों और जनता के असंतुलित अनुपात को दोषी मानते हुए कहते हैं, "जब जजों और जनता का अनुपात इतना असंतुलित होगा तो फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स भी काम कैसे कर पाएँगे? आधारभूत संरचना के साथ साथ ज़्यादा जजों की नियुक्ति कर जज और जनता के अनुपात को व्यावहारिक बनाना होगा. तभी कोई भी अदालत काम कर पाएगी."

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केसों का बोझ सिर्फ़ यहां से वहां सरकता रहा

न्यायिक सुधारों पर काम करने वाली संस्था 'दक्ष' के साथ जुड़े अनुरव कौल फ़ास्ट ट्रैक अदालतों की अब तक की असफलता के लिए संसाधनों के आभाव को दोषी बताते हुए कहते हैं, "फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा के अनुसार उनकी कार्यप्रणाली आम आदलतों से थोड़ी अलग होनी थी. उनके लिए समर्पित न्यायाधीशों का एक अलग पूल, नियमित सहायक स्टाफ़ और ऑडियो-वीडियो कोनफ़्रेंस के ज़रिए बयान लेने में सक्षम एक तकनीकी अमला चाहिए था. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ. इतने सालों में यही देखा गया कि किसी भी अदालत के मौजूदा जजों के पूल में से ही किसी एक को निकाल कर फ़ास्ट ट्रैक अदालत में भेज दिया जाता था. इससे अदालत का कुल बोझ यहां से वहां तो सरकता लेकिन कम नहीं हुआ."

"बिना एक समर्पित टेक्निकल सपोर्ट टीम से कोई भी अदालत त्वरित सुनवाई नहीं कर सकती. लेकिन नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी -दिल्ली के एक सर्वे के अनुसार भी अब तक भारत की ज़्यादातर फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में न तो कोई निश्चित टेक्निकल सपोर्ट टीम रही और न ही नियमित स्टाफ़. साथ ही अब तक भारत में विशेष या 'स्पेशल' फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बहुत कम रहे. ज़्यादातर फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बलात्कार और पोक्सो के मामलों के साथ साथ पुराने लड़ाई झगड़ों के मामले भी सुलझाते रहे. इस सब बातों के सिवाय, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रभावशीलता को मापने के लिए कभी कोई आधिकारिक सर्वे या शोध नहीं किया गया. इससे भी नुक़सान ही हुआ."

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तकनीकी अमले की कमी

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सूरत सिंह फ़ास्ट ट्रैक अदालतों को पूरी न्यायिक व्यवस्था का ही एक अंग मान कर देखने का आग्रह करते हुए कहते हैं, "जब देश की पूरे न्याय व्यवस्था लाखों की संख्या में लम्बित मामलों के बोझ तले दबी है तो फिर फ़ास्ट ट्रैक अदालतों पर इसका असर कैसे न पड़ता? एक तो सिविक मूल्य नहीं हैं हमारे यहां..मामलों में ढूँढने पर भी गवाह नहीं मिलते हैं. भारत में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का काम करना आसान नहीं है. हां अगर प्रतिदिन सुनवाई हो रही हो तो ज़रूर कुछ फ़र्क पड़ सकता है".

लेकिन फिर भी बीती जुलाई 1023 नई एफटीएससी बनाए जाने की घोषणा को लेकर अनुरव आशान्वित हैं.

वो आगे कहते हैं, "अब जब की पहली बार बलात्कारों और बच्चों के ख़िलाफ़ होने वाली यौन हिंसा के मामले सुनने के लिए 1023 नई अदालतें बनाई जा रही हैं, तो स्थिति सुधर सकती है. बशर्ते तकनीकी अमला, सहायक स्टाफ़ और समर्पित जजों का एक निश्चित पूल को इन एफटीएससी के लिए अलग से चिन्हित कर लिया जाए."

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