Hyderabad Case : क्या यही वो इंसाफ़ है जो महिलाए मांग रही थीं - नज़रिया

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    • Author, कल्पना कन्नाबिरन
    • पदनाम, मानवाधिकार कार्यकर्ता

शुक्रवार सुबह हम जगे तो एक चौंकाने वाली ख़बर मिली. पिछले हफ़्ते हैदराबाद में एक लड़की से सामूहिक बलात्कार और उसे जलाकर मारने वाले सभी चार अभियुक्तों को पुलिस ने मार दिया था.

पुलिस का कहना था कि चारों अभियुक्त क्राइम सीन से 'भागने' की कोशिश में मारे गए. अपराध को 'रीक्रिएट' करने के लिए अभियुक्तों को रात में क्राइम सीन पर ले जाया गया था.

हैदराबाद पीड़िता और उनके परिजनों के लिए मैं बहुत दुखी हूं. मैं टेकू गोपू और उनके परिवार के लिए भी बेहद दुखी हूं जिनकी गर्भवती पत्नी की आसिफ़ाबाद गैंग रेप के बाद हत्या कर दी गई.

गोपू की पत्नी की हत्या, हैदराबाद पीड़िता की हत्या से ठीक तीन दिन पहले हुई थी. गोपू की पत्नी उम्र में हैदराबाद पीड़िता से तीन साल बड़ी थीं. वो एक बंजारा समुदाय से ताल्लुक़ रखती थीं जो दिहाड़ी मज़दूरी और छोटे-मोटे सामान बेचकर ज़िंदगी बसर करता है.

हैदराबाद पीड़िता और गोपू की पत्नी, ये दोनों उन तमाम औरतों में से हैं जिन्हें बलात्कार के बाद बर्बरतापूर्वक मार दिया गया. ये सब तब हुआ जब भारत में बलात्कार के लिए संशोधित और कड़े क़ानून हैं, फ़ास्ट ट्रैक अदालते हैं और पूरी क़ानूनी प्रक्रिया है.

हैदराबाद डॉक्टर रेप मर्डर केस

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जया बच्चन और मायावती ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि बलात्कार के अभियुक्तों को भीड़ के हवाले कर दिया जाना चाहिए. इन्होंने अभियुक्तों के पुलिस द्वारा मारे जाने पर भी ख़ुशी जताई.

मैं पीड़िताओं के परिजनों और उनके दुख को पूरी तरह समझती हूं. अगर उनके नज़रिए से सोचें तो हम कई बार मौत के बदले मौत की मांग ज़रूर कर डालेंगे. लेकिन यहां हमें ये भी याद रखना होगा कि सभी लोग ऐसा नहीं करते. हम कैसे भूल सकते हैं कि सोनिया गांधी ने अपने पति राजीव गांधी के हत्यारों के लिए माफ़ी की गुज़ारिश की थी.

प्रदर्शन

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बर्बर हत्याएं असहनीय होती हैं. यौन हिंसा, हत्या, जातिगत उत्पीड़न, बच्चों को मारा जाना... ये सब ऐसे अपराध हैं, जो बर्दाश्त नहीं किए जाते. लेकिन हमें देखना होगा कि हम अपना दुख और ग़ुस्सा किस तरीके से व्यक्त कर रहे हैं. तरीका ऐसा होना चाहिए जो दुख को कम करने में मदद करे.

हमने बलात्कार के विरुद्ध कड़े क़ानून की मांग की. हमें कड़े क़ानून मिले भी. लोगों के ग़ुस्से और तीव्र विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए वर्ष 2013 में जस्टिस वर्मा समिति बनी और नए क़ानून आए. इसलिए ये समझना ज़रूरी है कि दिल्ली (निर्भया) गैंगरेप के परिवार का संघर्ष बेकार नहीं गया.

कानून को नज़रअंदाज़ करने वाली पुलिस व्यवस्था का उभरना समस्या का समाधान नहीं है. न्याय को सुविचारित हत्या और प्रतिशोधी रक्तपात से नहीं पाया जा सकता. इसके साथ ही पीड़ितों के परिवारों के दुःख और शोक से न्याय का मार्ग निर्धारित नहीं होता. न्याय उनके दुख और दर्द के क्षण में उनका समर्थन करने और उचित प्रक्रिया पर ज़ोर देने में निहित है जो अभियुक्तों को एक मज़बूत, कड़ी और सक्षम आपराधिक जांच मुहैया करा सके.

हैदराबाद डॉक्टर रेप मर्डर केस

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चार निहत्थे अभियुक्तों को कड़ी सुरक्षा के बीच मारकर पुलिस ने क्या पा लिया? एक जान की कीमत और जान लेकर नहीं दी जा सकती.

ये किस्सा भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के पूर्ण विपरीत है. अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं. और इस घटना में पुलिस की अपनी मनमानी, पहले से नियोजित प्रक्रिया और दंड ना पाने की गारंटी की नज़र से, यह पूरी तरह से गैरकानूनी घटना है.

अंत में इस डॉक्टर के रेप और मर्डर केस में हमें कितनी लाशें मिली? एक महिला की बर्बर तरीके से हत्या तो हुई ही, लेकिन चार अभियुक्तों को पकड़ा गया और एक हफ़्ते की कस्टडी में बिना किसी आपराधिक जांच के मारा गया. इन अभियुक्तों को घटनास्थल पर क्राइम रीक्रिएट करते वक़्त मारा गया - यानी कि जांच का वो चरण भी पूरा नहीं हो पाया.

ये वो इंसाफ़ नहीं हैं, जो औरतें मांग रही हैं: नज़रिया

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यहाँ पुलिसकर्मियों, जिन्होंने इस एनकाउंटर को अंजाम दिया, में कमिश्नर के अलावा किसी का नाम भी नहीं बताया गया है. अभी इनकी इस क्राइम में शामिल होने की जांच नहीं हुई है. लेकिन बात यहाँ तक सीमित नहीं है. इस शूटिंग के बाद हमें चार शव बरामद हुए और क्रिमिनल लॉ में मर्डर की परिभाषा से इसकी जांच होनी चाहिए.

औपचारिक तौर से तो बताया यह जा रहा है की इन अभियुक्तों को सेल्फ़ डिफ़ेंस यानी आत्मसुरक्षा की दृष्टि से मारा गया. लेकिन ये सभी तो निहत्थे थे.

ऐसे में पुलिस को साबित करना होगा कि जांच के आरम्भिक स्तर पर ही इन अभियुक्तों को कहीं सोची-समझी साज़िश के चलते घटनास्थल पर ले जाकर नहीं मारा गया.

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पुलिसकर्मी राज्य के अधिकारी हैं - संविधान से बंधे हैं और आपराधिक प्रक्रिया में प्रशिक्षित, कानून के रखवाले हैं. उन्हें सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हथियार दिए गए हैं न कि हत्या करने के लिए.

एक अनुशासित पुलिस बल कानून व्यवस्था के लिए बेहद ज़रूरी है. वे संविधान की रक्षा के लिए शपथ लेते हैं, चाहे जितनी भी जनता की भावना प्रबल क्यों न हो.

क्या हम डॉक्टर आम्बेडकर को कभी भूल सकते हैं? उनके अनुसार सार्वजनिक नैतिकता में संवैधानिक नैतिकता शामिल होनी चाहिए, जो भले सबकी प्राकृतिक भावना न हो. आवश्यकता पुनर्स्थापनात्मक पुलिसिंग की है, प्रतिशोध की नहीं.

इंसाफ़

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महिला होने के नाते हमारे लिए यह बेहद ख़तरनाक है कि हम पुलिस के एनकाउंटर में होने वाली हत्या के आदी हो जाएं और राज्य की मनमानी के आगे झुक जाएं.

हमें न्याय, स्वतंत्रता और एक सभ्य समाज को गरिमा से पाने के लिए इस विषय पर गंभीरता से सोचता ही होगा क्योंकि इसका और कोई विकल्प नहीं है.

(प्रोफ़ेसर कल्पना कन्नाबिरन हैदराबाद स्थित काउंसिल फ़ॉर सोशल डेवलपमेंट की निदेशक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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