अयोध्या पर फ़ैसले से कितना बढ़ेगा सांप्रदायिक सद्भाव : नज़रिया

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अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद ज़मीन के दशकों पुराने विवाद में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ ने शनिवार को फ़ैसला सुना दिया.
जहां बाबरी मस्जिद थी, 2.77 एकड़ की वो ज़मीन अब हिंदू पक्ष को मिलेगी. साथ ही सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ ज़मीन उपयुक्त जगह पर दी जाएगी.
40 दिनों तक चली सुनवाई के बाद शनिवार को इस दशकों पुराने मामले में पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से अपना फ़ैसला दिया.
भारत के ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है और लोगों से शांति और भाईचारे की अपील की है.
अयोध्या मामले पर फ़ैसला आने के बाद बीबीसी संवाददाता भूमिका राय ने हैदराबाद स्थित नैलसार लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा से बात की. पढ़िए फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का नज़रिया.
जजों ने एक संतुलन बनाने की कोशिश की है. एक बहुत ही संवेदनशील मसले को क़ानूनी तौर पर सुलझाने का एक अच्छा प्रयास है. आगे आपस में दो समुदाय धर्म को लेकर नहीं लड़ेंगे. मुझे लगता है कि कोर्ट ने एक अच्छा प्रयास किया है. पोजेशन पर, मालिकाना हक़ पर, सबूतों पर, कोर्ट के ऑब्ज़र्वेशन को देखने के लिए पूरा जजमेंट देखना ज़रूरी है. मुझे यह थोड़ा विवादास्पद लगता है.

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फ़ैसले को कैसे देखते हैं?
मुझे लगता है कि कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े के साथ थोड़ी ज़्यादती की है. क्योंकि वे शुरू से केस लड़ते रहे हैं और उनको पूजा कराने का अधिकार भी नहीं दिया गया. कोर्ट को कम से कम यह कहना चाहिए था कि निर्मोही अखाड़े के पास पूजा करने और प्रबंध करने का अधिकार रहेगा.
श्रद्धालुओं को मंदिर बनाने और वहां रहने का जो अधिकार दिया गया है वो ठीक है, स्वागतयोग्य है लेकिन साथ ही कई ऐसी बातें जो मुस्लिम पार्टी या सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड कह रहा था उसको इसमें मान लिया गया है. मैं समझता हूं कि यह बहुत ही संतोष की बात है. सबसे बड़ी बात यह है कि एक जो धारणा बनाई गई थी कि बाबर ने एक राम मंदिर को ध्वस्त करके वहां पर मस्जिद बनाई, सुप्रीम कोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने इसको भी ख़ारिज कर दिया है कि टाइटिल तय करने के लिए एएसआई की रिपोर्ट पर यकीन किया जाए. इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने यह भी मान लिया है कि 1949 में जिस तरह से मूर्तियां रखी गईं थीं वो एक ग़ैर-क़ानूनी कृत्य था. अदालत ने यह भी माना कि 1992 में जो ढांचा गिराया गया वो रूल ऑफ़ लॉ और कोर्ट के ऑर्डर की अवहेलना थी.

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ऐसे में मैं यह समझता हूं कि मुस्लिम पक्ष की बहुत सी बातें मान ली गई हैं सिवाए इसके कि उनको कहा गया कि वे अपने मालिकाना हक़ का कोई पेपर नहीं दिखा पाए. या यह कहा गया कि वे पोजेशन साबित नहीं कर पाए.
यह दोनों चीज़ें विवादास्पद हैं कि एक पुरानी इमारत के बारे में क्या कोई टाइटल का पेपर होना चाहिए या पोजेशन कैसे साबित होगा क्योंकि जो सरकारी रिकार्ड और रिवेन्यू कार्ड हैं, कोर्ट ने उनको लेकर कह दिया कि उससे टाइटिल साबित नहीं होता.
ऐसे में क़ानून के विशेषज्ञ कोर्ट के जजमेंट कि आलोचना कर सकते हैं. लेकिन मैं यह समझता हूं कि एक संवदेनशील मुद्दे को कोर्ट ने हल करने की एक अच्छी कोशिश की है.
विवादित विषय
कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता पर बहुत बड़ा फ़ैसला दिया है और अब जब अल्पसंख्यक के धर्म की बात होगी तो क्या कोर्ट उस पर कायम रहेगी यह देखने की बात होगी. धर्म के मामले में कोर्ट नहीं बोलेगा.
मैं समझता हूं कि धर्म की स्वतंत्रता का जो आर्टिकल 25 है उसके लिए यह बहुत बड़ा दिन था. लेकिन यह मामला धर्म की स्वतंत्रता का नहीं था. यह संपत्ति का एक सिविल विवाद था. तो क्या संपत्ति के मामले में किसी दूसरे के धर्म और विश्वास पर फ़ैसला होना चाहिए यह अपने आप में एक विवादित विषय है. इस पर दोनों तरह की राय हो सकती है.

यह भी बात सही है कि जब यह विवाद शुरू हुआ तो वो केवल अयोध्या के हिन्दू और मुसलमान के बीच था. लेकिन राजनीति ने इसे पूरे देश के मुसलमानों और पूरे देश के हिन्दुओं के बीच बना दिया.
हिन्दुस्तान के मुसलमान भगवान राम में बहुत आस्था रखते हैं, उन्हें इमाम-ए-हिन्द कहते हैं. मुस्लिम पार्टी ने कभी भी भगवान राम के अयोध्या में जन्म होने को चैलेंज नहीं किया. उनका यह कहना था कि इस बात का क़ानूनी सबूत नहीं है कि जो यहां तीन गुंबद थे उसमें बीच वाले गुंबद के नीचे ही भगवान राम का जन्म हुआ था और बाबरी मस्जिद एक मंदिर को गिराकर बनाई गई.
गुंबद ढहाये जाने का मामला
कोर्ट ने गुंबद गिराये जाने की बहुत आलोचना की है. हालांकि, यह मामला अभी लोअर कोर्ट में है और मुझे नहीं लगता कि इसमें सज़ाएं होंगी. क्योंकि लोअर कोर्ट से फिर हाईकोर्ट में अपील होंगी, फिर सुप्रीम कोर्ट में. यह हमारे लीगल सिस्टम की बहुत बड़ी नाकामी है.
आमतौर पर क्रिमिनल केस जल्दी तय होता है और सिविल केस देर से तय होता है लेकिन इस मामले में 1992 से लेकर अब तक आप देखिए कि 27 साल हो गए हैं और जिन लोगों ने एक साज़िश के तहत मस्जिद गिराई उन्हें कोई सज़ा नहीं हुई.

दूसरे पक्ष की आगे की रणनीति
जब सुप्रीम कोर्ट फ़ैसला करती है तब पार्टियों के पास सीमित विकल्प होता है कि वह रिव्यू में जाएं. लेकिन मुझे लगता है कि इसमें जो संवेदनशीलता शामिल है और हमारे हिन्दू भाइयों की भावना शामिल है, इसमें रिव्यू में जाना बहुत ही मुनासिब चीज़ नहीं होगा.
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ गया उस फ़ैसले में कुछ कमियां हो सकती हैं. न्यायाधीश भी इंसान होते हैं, सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम है लेकिन अचूक नहीं है. जजमेंट में एक दो बिन्दु पर लीगल एक्सपर्ट में मतभेद हो सकता है. लेकिन मैं समझता हूं कि व्यापक सामाजिक संबंध अच्छे रहे, सौहार्द अच्छा रहे, समाज में भाईचारा रहे तो अब इस पर पर्दा डाल देना चाहिए.
30 साल बाद की स्थिति
मैं उम्मीद करूंगा कि देश के नागरिक परिपक्वता दिखाएंगे और धर्म को लड़ने के लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे से मिलने के लिए इस्तेमाल करेंगे. कोई धर्म हिंसा नहीं सिखाता, नफ़रत नहीं सिखाता.
ऐसे में हमें इतिहास को दोबारा खोदने की ज़रूरत नहीं है, हमें भविष्य की ओर देखना चाहिए. जो बहुसंख्यक समुदाय है उसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा होती है क्योंकि अल्पसंख्यक के दिमाग में असुरक्षा की एक भावना होती है, डर का एक माहौल रहता है.

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उसको लगता है कि मेरा धर्म, मेरे कल्चर और मेरी पहचान को ख़तरा है. तो मैं समझता हूं कि देश का बहुसंख्यक समुदाय आगे आएगा और मुस्लमानों की इस मामले में जो भावनाएं और संदेह है उसे दूर करेगा.
मैं नहीं समझता हूं कि अयोध्या में मुस्लिम पक्ष मस्जिद बनाएंगे या नहीं बनाएंगे क्योंकि यह फ़ैसला उनको लेना है लेकिन मैं यह सोचता हूं कि सारे देश को इसका स्वागत करना चाहिए.
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