ऑटो इंडस्ट्री के संकट से जमशेदपुर की चमक हुई फीकी

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
झारखंड के एक दूरस्थ गाँव में एक युवा दंपती चर्चा कर रहा है कि घर में जितना चावल है, वो हफ़्ते के अंत तक चलेगा या नहीं.
पत्नी ने अपनी छोटी सी मिट्टी की कुटिया से झाँक कर देखा, "आप ग़लत जगह आ गए हैं. पहले जाइए और आस-पास की ख़ाली फैक्ट्रियां देखिए."
उनके परिवार में उनके पति राम मरडी अकेले कमाने वाले शख़्स हैं और वो स्वीकार करते हैं कि उनका बुरा वक़्त चल रहा है.
वो पूछते हैं, "जब आर्थिक सुस्ती नहीं थी, हम लोग आराम से जी रहे थे. अब खाने का इंतज़ाम भी मुश्किल है. मैंने बच्चों को स्कूल भेजना भी बंद कर दिया है. मेरी मां की तबीयत ख़राब है और अगर मैं बीमार पड़ गया तो ये लोग कैसे जिएंगे?"
राम झारखंड के जमशेदपुर में एक कंपनी के लिए काम करते हैं जो कारों और भारी वाहनों के लिए पुर्जे बनाती है.
लेकिन बीते महीने उन्हें सिर्फ़ 14 दिन ही काम मिल पाया था. मांग में गिरावट के चलते उनके कारखाने को बीच-बीच में कुछ दिनों के लिए बंद रखना पड़ता है.

पूरे देश में मांग में गिरावट आई है जो आर्थिक सुस्ती का संकेत है.
देश का कार उद्योग इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित है. इससे कंपनियां अस्थायी रूप से उत्पादन रोकने और नौकरियों में कटौती करने के लिए मजबूर हो रही हैं.
जुलाई में यात्री वाहनों की बिक्री में 30 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गई थी.
बैंकिंग क्षेत्र में संकट के कारण ऑटो डीलर और संभावित कार ख़रीदार क़र्ज़ पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
बड़े निर्माताओं को आपूर्ति करने वाले ये छोटे और मध्यम आकार के व्यवसाय सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

'कर्मचारी बेकार बैठे हैं'
पेशे से इंजीनियर समीर सिंह को अपने घर वापस जमशेदपुर लौटना पड़ा था क्योंकि उनके पिता बीमार थे और उनका ऑटो स्पेयर पार्ट्स बनाने का घरेलू व्यवसाय प्रभावित हो रहा था.
अपनी वापसी के बाद बीते दो दशकों में समीर ने न केवल व्यवसाय में जान फूंकी बल्कि अपनी उत्पादन इकाइयां भी बढ़ाईं, जो भारी वाहन निर्माताओं के लिए ऑटो स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति करता है.
उन्होंने कहा, "मुझे अपनी फैक्ट्री को बनाए रखने और चलाने में इतनी परेशानी कभी नहीं हुई."
समीर कहते हैं, "आपको व्यवसाय चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है और उद्यम के लिए एक मज़बूत इच्छा शक्ति होनी चाहिए. मेरे जैसे छोटे व्यवसायी अपना सारा पैसा, बचत और लोन अपने धंधे में झोंक देते हैं और कोई डिफॉल्टर नहीं बनना चाहता है."
"मेरे कर्मचारी कुछ हफ्तों से बेकार बैठे हैं और मुझे उनके लिए बुरा लग रहा है. अगर ऐसा जारी रहा तो वे नौकरी छोड़कर जा सकते हैं. वे शायद दूसरी नौकरी ढूंढ ले. लेकिन मैं नौकरी के लिए बाहर भी नहीं जा सकता. मेरी ज़िंदगी यहीं शुरू होती है और यहीं ख़त्म."
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संकट को दर्शाता जमशेदपुर
भारतीय ऑटो सेक्टर की बिक्री में मौजूदा गिरावट बीते दो दशकों में सबसे ज़्यादा रही है. ये गिरावट कितनी बड़ी है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि ऑटो उद्योग क़रीब तीस से पैंतीस लाख लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोज़गार देता है.
ऐसा समझा जा रहा है कि अब तक एक लाख से ज़्यादा लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं.
औद्योगिक शहर जमशेदपुर में इस सुस्ती से सीधे प्रभावित लोगों का संकट स्पष्ट दिखता है.
आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र के बीचों-बीच भीड़-भाड़ वाला इलाक़ा है इमली चौक, जहां अधिकतर घरों में ऑटो पार्ट्स बनाए जाते हैं.
इस चौक पर हर रोज़ सैकड़ों दिहाड़ी मज़दूर काम की तलाश में आते हैं. स्थानीय ठेकेदार उन्हें काम पर रखते हैं.
लेकिन हमने इमली चौक पर बिल्कुल उलट नज़ारा देखा. हर उम्र के पुरुष और महिला मज़दूर बेचैन और व्याकुल थे. वो इस इंतजार में थे कि कोई उन्हें एक दिन के लिए काम पर रख ले. यहां तक कि कुछ ने हमें ठेकेदार समझ लिया.
तीन बच्चों की मां, लक्ष्मी एक दिन के रोजगार की तलाश में पंद्रह किलोमीटर का सफर तय कर पहुंची थीं. लेकिन पिछले कुछ महीने उनके लिए निराशाजनक रहे हैं.
"दिन-ब-दिन स्थिति बुरी होती जा रही है. कुछ भाग्यशाली लोगों को एक दिन की नौकरी मिल जाती है, लेकिन ज़्यादातर अपने घर खाली हाथ लौट जाते हैं. उनके पास बस का किराया तक नहीं होता. कई बार हमें घर पहुंचने के लिए घंटों चलना पड़ता है."
"हम हर दिन 400 से 500 रुपए कमा लेते थे. लेकिन अब नहीं. अब हम 100 से 150 रुपए कमाने के लिए कोई भी काम करने को तैयार हैं. शौचालय साफ़ करने से लेकर सड़कों पर काम करने तक, लेकिन वो भी नहीं मिल रहा है."
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चिंताएं
ऑटो उद्योग के लिए यह बुरी ख़बर है कि पूरी अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुज़र रही है और अभी और नौकरियां जा सकती हैं.
ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के महासचिव संजय सभरवाल कहते हैं, "इस साल बिक्री में जो कमी आई है वो इतनी बड़ी और भयानक है कि इससे हर तरह की गाड़ियां, जैसे टू व्हीलर, कार और भारी वाहन प्रभावित हुए हैं. पिछली बार जब मंदी आई थी तो ऐसा नहीं हुआ था."
यहां के कारखानों पर हज़ारों परिवार निर्भर हैं. आगे और भी बुरी ख़बर आ सकती है.

रूपेश कटरियार एक ऐसे ऑटो पार्ट्स निर्माता हैं, जिनकी दो मैन्युफैक्चरिंग यूनिट एक महीने के भीतर बमुश्किल एक हफ्ते तक ही चल पाई है.
रूपेश अपनी खाली पड़ी फैक्ट्री में बैठे थे. उन्होंने कहा, "सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि बाज़ार अचानक ठंडा पड़ गया. मैं इस बात से सहमत हूं कि आर्थिक विकास दर के गिरने से भारी कमर्शियल वाहनों की बिक्री में कमी आई है. लेकिन बाइक जैसे सस्ते यात्री वाहनों का क्या? ये उतने महंगे नहीं होते. तो स्वीकार कर लेना चाहिए कि यह एक नकारात्मक स्थिति है और इसे सुधरने में थोड़ा वक़्त लगेगा."
ऑटो सेक्टर में सुधार लाने के लिए लंबे वक़्त से टैक्स में छूट और डीलरों और उपभोक्ताओं को आसानी से क़र्ज़ मुहैया कराए जाने की मांग की जाती रही है.
कई लोग यह तर्क भी देते हैं कि अगले कुछ साल में सरकार को धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने पर ज़ोर देने की ज़रूरत है.
बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार ने कई फ़ैसले लिए हैं. ऑटो सेक्टर की निराशा से निपटने के लिए एक पैकेज का ऐलान, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 70 हज़ार करोड़ रुपए देने और कम दरों पर होम और ऑटो लोन देने की बात कही गई है.
क्या ये उपाय लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को सहारा दे पाएंगे, इस सवाल का जवाब थोड़ा मुश्किल है.
यह समझा जाता है कि अगर ऑटो उद्योग अच्छा कर रहा है तो अर्थव्यवस्था पटरी पर है.
विशेषज्ञों के अनुसार यह भारतीय ऑटो उद्योग का सबसे बुरा वक़्त चल रहा है. साथ ही अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं.
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