कश्मीर: जेल में बीती जवानी फिर सुबूत के अभाव में रिहा

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
जवानी, ज़िंदगी का वो पड़ाव जब शरीर में कुछ करने का जज़्बा तो होता ही है उसे पूरा करने की ताक़त और ऊर्जा भी होती है.
लेकिन अगर किसी की जवानी जेल की दीवरों के भीतर क़ैदी बनकर गुज़र जाए, फिर दो दशक बीतने के बाद एक दिन उन्हें रिहा कर दिया जाए और बताया जाए कि पर्याप्त सुबूत नहीं मिले, इसलिए उन्हें रिहा किया जाता है.
ऐसा ही हुआ 49 साल के मोहम्मद अली भट्ट, 40 साल के लतीफ़ वाज़ा और 44 साल के मिर्ज़ा निसार के साथ.
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अपनी पूरी जवानी जेल में बिताने के बाद मोहम्मद अली भट्ट, लतीफ़ वाज़ा और मिर्ज़ा निसार को सुबूतों के अभाव में रिहा कर दिया गया. इन सभी को दिल्ली के लाजपत नगर और सरोजिनी नगर में साल 1996 में हुए बम धमाकों में शामिल होने के शक में पुलिस ने हिरासत में लिया था.
लेकिन उनके ख़िलाफ़ सुबूत नहीं थे और इसलिए उन्हें रिहा कर दिया गया.
इन तीनों को देखकर इनकी परेशानी और बेबसी का अंदाज़ा होता है. जिस समय इन्हें हिरासत में लिया गया था ये सभी अपनी किशोरावस्था के अंतिम दौर में थे. इन्हें काठमांडू से गिरफ़्तार किया गया था जहां वो कभी-कभी कश्मीरी हथकरघा की चीज़ें बेचने जाया करते थे.
अली भट्ट के माता-पिता और ख़ास दोस्त अब नहीं रहे, जब वो जेल में थे उन सभी की मौत हो गई.

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कौन वापस लाएगा बीता वक़्त?
अली भट्ट के छोटे भाई अरशद भट्ट कहते हैं "जेल से छूटने के बाद वो सीधे क़ब्रिस्तान गए और वहां जाकर उन्होंने अपने अम्मी-अब्बू की क़ब्र को गले लगाया और जी भरकर रोए."
जेल से छूटकर जब अली भट्ट अपने पैतृक घर हसनाबाद पहुंचे तो मिठाइयां बांटी गईं और औरतों ने स्थानीय गाने गाए.
अरशद बताते हैं, "हमारा व्यापार बहुत अच्छा चल रहा था लेकिन अली की गिरफ़्तारी ने सबकुछ तबाह कर दिया. अब हमारा व्यापार नहीं बचा है और पहले का बचा जो कुछ था वो एक जेल से दूसरी जेल जाने, एक वकील के बाद दूसरे वकील को फ़ीस देने में ख़र्च हो गया."
लगभग रोते हुए अरशद कहते हैं कि हम कोर्ट के फ़ैसले से ख़ुश हैं लेकिन जब ज़िंदगी के क़ीमती साल गुज़र रहे थे तब कोर्ट चुप क्यों थी. कौन उन 23 सालों को वापस लेकर आएगा और अब अली क्या करेगा.
लतीफ़ वाज़ा 17 साल के थे जब उन्हें नेपाल से गिरफ़्तार किया गया था.
उनका परिवार पुराने कश्मीर के शमस्वरी में रहता है. वो परिवार जिसने बेपनाह दुख उठाए हैं. उनके पिता उनका इंतज़ार करते करते मर गए. उनके इकलौते भाई तारीक़ ने बताया कि लतीफ़ की गिरफ़्तारी के बाद व्यापार बंद करना पड़ा.

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'सरकार करे भरपाई'
वो बताते हैं, "मेरे पिता की मौत के बाद मेरे ऊपर दो-दो ज़िम्मेदारियां थीं. मेरी बहन की शादी होनी थी और मुझे बाक़ी सब भी संभालना था. सिर्फ़ ऊपर वाला ही जानता है कि इन सालों में हमने कैसे और किस तरह चीज़ों को संभाला है."
तारीक़ भी सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि इन सालों की भरपाई के लिए सरकार को आगे आने की ज़रूरत है.
मिर्ज़ा निसार रिहा किये गए तीन लोगों में से एक हैं. वो भी शमस्वरी में रहते हैं.
निसार के छोटे भाई इफ़्तिख़ार मिर्ज़ा कहते हैं, "हमें पता नहीं था कि निसार को कब गिरफ़्तार किया गया था. जब तक हमें पता चला पुलिस हमारे दरवाज़े खटखटा चुकी थी. मुझे और मेरे दो भाइयों को पूछताछ के लिए भी ले जाया गया. मैं ये बता भी नहीं सकता कि निसार की गिरफ़्तारी के बाद हम किस दौर से गुज़रे."

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क्या ये न्याय है?
इफ़्तिख़ार कहते हैं कि निसार से मिलने के लिए भी उन्हें और उनके परिवार को 14 साल का इंतज़ार करना पड़ा. निसार के साथ जेल में रह चुके तारीक़ डार साल 2017 में रिहा हो गए थे.
वो निसार और उनकी मां की मुलाक़ात को याद करते हुए बताते हैं, "ये मुलाक़ात एक छोटी सी खिड़की के आर-पार हुई थी. लेकिन इतने सालों के बाद भी दोनों में से किसी ने एक शब्द नहीं कहा. वे सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे. रोते रहे. तभी एक अधिकारी वहां आया और उन्होंने उन्हें एक-दूसरे को गले लगाने की इजाज़त दी. लेकिन मां और बेटे की उन भावनाओं को जेल की उन दीवारों ने भी महसूस किया था."
निसार के परिवार और दोस्तों का कहना है कि उन्हें कैसा महसूस हो रहा है वो इसके बारे में बता भी नहीं सकते.
इफ़्तिख़ार मिर्ज़ा कहते हैं, "हम इस बात से ख़ुश हैं कि अंत में कम से कम न्याय तो मिला. लेकिन क्या सच में इसे न्याय कहा जाना चाहिए? इस नई दुनिया में निसार एक अनजान आदमी है. वो बहुत से रिश्तेदारों को तो पहचानते भी नहीं हैं क्योंकि कई हैं जो उनकी गिरफ़्तारी के बाद पैदा हुए और कई ऐसे हैं जो अब काफ़ी बड़े हो चुके हैं. अगर ये न्याय है तो हमने इस न्याय के लिए बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है."
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