कश्मीर मुद्दे को बातचीत से हल की बात करने वाले अलगाववादियों पर कार्रवाई क्यों?

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- Author, अनुराधा भसीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सीआरपीएफ़ काफिले पर हुए हमले में 40 जवानों की मौत के बाद रविवार को प्रशासन ने पांच अलगाववादी नेताओं मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़, अब्दुल गनी बट, बिलाल लोन, हाशिम क़ुरैशी और शब्बीर शाह की सुरक्षा वापस ले ली है.
इनमें से ज़्यादातर अलगाववादी नेताओं को राज्य पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी.
पुलवामा में हमले के बाद ही आखिर यह कार्रवाई क्यों की गई, इससे कश्मीर की स्थिति पर कैसे फ़र्क पड़ेगा और साथ ही इन नेताओं की सुरक्षा पर इसका क्या असर होगा?
पढ़ें जम्मू-कश्मीर पर निगाह रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन का नज़रिया.
पुलवामा में हमले के बाद लिए गए इस फ़ैसले से कश्मीर की ज़मीनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं होने वाला है.
चरमपंथी हमले और हुर्रियत या अलगाववादियों में बहुत फासला है. उनका किसी चरमपंथी संगठन पर कोई पकड़ है ऐसा नहीं लगता. बस दोनों की आकांक्षाओं को कुछ हद तक जोड़ कर देख सकते हैं.

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अलगाववादियों और चरमपंथियों का लक्ष्य अलग
लेकिन हुर्रियत या अलगाववादी नेताओं और चरमपंथी संगठनों के लक्ष्य अलग अलग है.
हुर्रियत बात करती है कि बातचीत के जरिये कश्मीर के मसले का हल होना चाहिए वहीं चरमपंथी संगठन का यकीन है कि ये बंदूक के जोर पर ही मसला हल हो सकता है.
इनके काम करने का तरीका भी मुख़्तलिफ़ है.
इसलिए यदि यह कहा जाए कि चरमपंथी संगठन पर कार्रवाई करने की ज़रूरत थी तो यह अलगावदी नेताओं पर किया जा रहा है.
अलगाववादियों को क्यों दी गई थी सुरक्षा?
सवाल तो यह उठता है कि अलगाववादी नेताओं को सुरक्षा दी ही क्यों गई थी.
यह तो उस दौर की सरकार ही बता सकती है कि उन्हें सुरक्षा क्यों दी गई. लेकिन कुछ ऐसी घटनाएं हुई थीं.
मीरवाइज़ और बिलाल लोन का मामला ऐसा है जिसे देखते हुए उन्हें सुरक्षा दी गई थी. दोनों के वालिद का कश्मीर में कत्ल हुआ था. उसके बाद उन्हें सुरक्षा दी गई थी.
प्रोफ़ेसर अब्दुल गनी बट्ट पर हमला हुआ था, तो शायद उन्हें इसी वजह से सुरक्षा दी गई थी. हाशिम क़ुरैशी को भी इसी कारण से सुरक्षा दी गई थी.
शबीर शाह तो जेल में हैं, उनकी सुरक्षा हटाने के ऐलान करने के क्या मायने हैं? क्या उन्हें जेल में सुरक्षा दी गई थी?
ऐसा लगता है कि बस दिखावे के लिए ज़्यादा किया गया है.

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सुरक्षा हटाना बेमतलब
अलगाववादी नेताओं को नज़रबंद की स्थिति में रखा गया है. इनकी सुरक्षा हो या न हो यह बेमतलब रह जाता है.
अब चूंकि सरकार इन्हें सुरक्षा मुहैया नहीं कराएगी और इन पर हमले का इतिहास रहा है तो अगर उन पर आगे कोई हमले या हादसे होते हैं तो ज़िम्मेदारी किसकी होगी?
निश्चित ही ऐसी किसी भी घटना की ज़िम्मेदारी सरकार की होगी.
हालांकि, घाटी पर इनकी सुरक्षा हटाने पर कोई प्रतिक्रिया या चर्चा नहीं है.
यह बिना सोचे समझे लिया गया फ़ैसला हो सकता है. पिछले कुछ सालों में दिखा है कि बीजेपी हुकूमत के लिए कश्मीर चुनावी रणनीति का स्कूल रहा है, जिसे वो पूरे देश में चलाते हैं.
संभवतः उसी दिखावे के लिए, देश के बाकी संसदीय क्षेत्रों में एक अपील के लिए हो सकता है कि ये कदम उठाया गया हो.

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हुर्रियत को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता
पहले की सरकारों की भी रणनीति रही है हुर्रियत को कमज़ोर करने की. हुर्रियत महज़ एक राजनीतिक अभिव्यक्ति है, चाहे आप उससे राज़ी हों या नहीं.
उनका यकीन बंदूक में नहीं बल्कि बातचीत में है. आप जैसे जैसे उन्हें कमज़ोर करते जाएंगे, चरमपंथी संगठनों की ताक़त उतनी ही मज़बूत और पुख्ता होती जाएगी.
तो अभी उठाया गया यह क़दम, दीर्घावधि में देखें तो, अच्छा नहीं कहा जा सकता है.
आने वाले दिन ही बता सकते हैं कि क्या होगा और क्या नहीं, इसका कुछ प्रभाव पड़ भी सकता है.
हुर्रियत को बिल्कुल ही नज़रअंदाज तो नहीं किया जा सकता. हालांकि उनमें अंदरूणी मतभेद भी बहुत हैं. इसके बावजूद वो एक सियासी तत्व तो हैं ही जो एक पृथक धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं.

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अगर कश्मीर के मुद्दे को बातचीत और अमन से सुलझाना है तो उनको नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. वो एक अहम किरदार निभा सकते हैं.
शुरुआत उनके साथ हो सकती है और फिर बाकी लोगों को धीरे-धीरे शामिल किया जा सकता है.
कुल मिलाकर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि कश्मीर मुद्दे पर बातचीत शुरू करने का एक जरिया हैं हुर्रियत.
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