टीएन शेषन: जो 'खाते थे राजनीतिज्ञों को नाश्ते में!'

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिसंबर 1990 की एक ठंडी रात करीब एक बजे केंद्रीय वाणिज्य मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की सफ़ेद एम्बैसडर कार नई दिल्ली के पंडारा रोड के एक सरकारी घर के पोर्टिको में रुकी.
ये घर उस समय योजना आयोग के सदस्य टीएन शेषन का था. स्वामी बहुत बेतकल्लुफ़ी से शेषन के घर में घुसे.
वजह ये थी की साठ के दशक में स्वामी शेषन को हारवर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके थे.
हाँलाकि वो शेषन से उम्र में छोटे थे. उस ज़माने में सुब्रमण्यम स्वामी को हारवर्ड में जब भी दक्षिण भारतीय खाने की तलब लगती थी, वो शेषन के फ़्लैट में पहुंच जाते थे और शेषन उनका स्वागत दही चावल और रसम के साथ किया करते थे.
लेकिन उस दिन स्वामी शेषन के यहाँ इतनी देर रात न तो दही चावल खाने आए थे और न ही 'वट्टलकोड़ंबू.'
वो प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दूत के तौर पर वहाँ पहुंचे थे और आते ही उन्होंने उनका संदेश दिया था, "क्या आप भारत का अगला मुख्य चुनाव आयुक्त बनना पसंद करेंगे?"
राजीव गांधी से सलाह
शेषन इस प्रस्ताव से बहुत अधिक उत्साहित नहीं हुए थे, क्योंकि एक दिन पहले ही कैबिनेट सचिव विनोद पांडे ने भी उन्हें ये प्रस्ताव दिया था.
और तब शेषन ने विनोद को टालते हुए कहा था, "विनोद तुम पागल तो नहीं हो गए? कौन जाना चाहेगा निर्वाचन सदन में?"
लेकिन जब स्वामी दो घंटे तक उन्हें ये पद स्वीकार करने के लिए मनाते रहे तो शेषन ने उनसे कहा कि वो कुछ लोगों से परामर्श करने के बाद अपनी स्वीकृति देंगे.
टीएन शेषन की जीवनी 'शेषन- एन इंटिमेट स्टोरी' लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार के गोविंदन कुट्टी बताते हैं, "स्वामी के जाने के बाद शेषन ने राजीव गाँधी को फ़ोन मिला कर कहा कि वो तुरंत उनसे मिलने आना चाहते हैं. जब वो उनके यहाँ पहुंचे तो राजीव गाँधी अपने ड्रॉइंग रूम में थोड़ी उत्सुकता के साथ उनका इंतज़ार कर रहे थे."
"शेषन ने उनसे सिर्फ़ पाँच मिनट का समय लिया था, लेकिन बहुत जल्दी ही ये समय बीत गया. राजीव ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, 'फ़ैट मैन इज़ हियर.' क्या आप हमारे लिए कुछ 'चॉकलेट्स' भिजवा सकते हैं? 'चॉकलेट्स' शेषन और राजीव दोनों की कमज़ोरी थी."
"थोड़ी देर बाद राजीव गांधी ने शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद स्वीकार करने के लिए अपनी सहमति दे दी. लेकिन वो इससे बहुत खुश नहीं थे. जब वो शेषन को दरवाज़े तक छोड़ने आए तो उन्होंने उन्हें छेड़ते हुए कहा कि वो दाढ़ी वाला शख़्स उस दिन को कोसेगा, जिस दिन उसने तुम्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने का फ़ैसला किया था."
राजीव गाँधी के मुंह से बिस्किट खींचा
दाढ़ी वाले शख़्स से राजीव गांधी का मतलब प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से था.
टीएन शेषन के राजीव गाँधी के करीब आने की भी एक दिलचस्प कहानी है.
वो पहले वन और फिर पर्यावरण मंत्रालय में सचिव थे. वहाँ उन्होंने इतना अच्छा काम किया कि राजीव ने उन्हें आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सुरक्षा सचिव बना दिया.
के गोविंदन कुट्टी बताते हैं, "सुरक्षा सचिव के रूप में शेषन सचिव से कहीं बड़ा काम करने लगे. वो खुद सुरक्षा विशेषज्ञ बन गए. एक बार उन्होंने राजीव गाँधी के मुंह से ये कहते हुए बिस्किट खींच लिया कि प्रधानमंत्री को वो कोई चीज़ नहीं खानी चाहिए, जिसका पहले परीक्षण न किया गया हो."

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प्रधानमंत्री की सुरक्षा में कोई भूल बर्दाश्त नहीं
गोविंदन कुट्टी आगे बताते हैं, "एक बार 15 अगस्त को राजीव गाँधी बहुत से लोगों के साथ विजय चौक से इंडिया गेट तक दौड़ने वाले थे. उन्होंने ट्रैक सूट पहन रखा था. थोड़ी दूरी पर टीएन शेषन बंद गले के सूट और पतलून में सारा इंतज़ाम देख रहे थे."
"राजीव ने उन्हें देख कर मज़ाक किया, 'आप वहाँ क्या सूटबूट पहने खड़े हैं? आइए आप भी हमारे साथ दौड़िए. आपका मोटापा थोड़ा कम हो जाएगा.' शेषन ने तपाक से जवाब दिया, 'कुछ लोगों को सीधे खड़ा होना पड़ता है, ताकि देश का प्रधानमंत्री दौड़ सके.'"
"थोड़ी देर बाद वो हुआ, जिसकी राजीव गाँधी को बिलकुल उम्मीद नहीं थी. अभी वो कुछ ही मिनट दौड़े होंगे कि सुरक्षाकर्मी उनके चारों तरफ़ घेरा बनाते हुए उन्हें एक ऐसी जगह ले आए, जहाँ एक कार खड़ी हुई थी और जिसका इंजन पहले से चालू था."
"उन्होंने राजीव को कार में बैठाया और ये जा... वो जा. एक मिनट में उन्होंने उनको उनके घर पहुंचा दिया. ऐसा करते हुए सुरक्षाकर्मी राजीव से नज़रे नहीं मिला पा रहे थे. लेकिन उन्हें पता था कि उन्हें करना क्या है. शेषन का उन्हें निर्देश था कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए."

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शेख़ अब्दुल्लाह के पत्र पढ़ते थे शेषन
शेषन की इस निर्भीकता और स्पष्टवादिता का स्वाद कश्मीर के बड़े नेता शेख़ अब्दुल्लाह को भी चखना पड़ा था.
बात उन दिनों की है जब नेहरू ने साठ के दशक में तमिलनाडु के मशहूर कोडई झील के किनारे एक होटल 'लाफ़िंग वाटर्स' में शेख़ को नज़रबंद करवा दिया था.
शेषन उस समय मदुरै ज़िले के कलेक्टर थे. उनको ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वो शेख़ द्वारा बाहर भेजे गए हर पत्र को पढ़ें. शेख़ अब्दुल्लाह को ये बात पसंद नहीं थी.
एक दिन शेख़ ने उनसे कहा कि वो एक ज़रूरी ख़त लिखने वाले हैं.
के गोविंदन कुट्टी बताते हैं, "अगले दिन जब शेषन शेख़ से मिलने गए तो वो पत्र तैयार था. लिफ़ाफ़े पर पता लिखा था, 'डॉक्टर एस राधाकृष्णन, प्रेसिडेंट ऑफ़ इंडिया.' शेषन पर इसका कोई असर नहीं हुआ. शेख़ ने शेषन की तरफ़ विजयी मुद्रा में देख कर कहा, 'क्या तुम अब भी इसे खोलना चाहते हो?'"
"शेषन ने जवाब दिया, 'इसे मैं आपके सामने ही खोलूंगा. पते का मेरे लिए कोई मतलब नहीं है.' एक दिन शेख़ ने घोषणा की कि वो उनके साथ किए जा रहे ख़राब व्यवहार के विरोध में आमरण अनशन पर जाएंगे."
"शेषन ने कहा, 'सर ये मेरा कर्तव्य है कि मैं आपकी हर ज़रूरत का ख़्याल रखूं. मैं ये सुनिश्चित करूंगा कि कोई आपके सामने पानी का एक गिलास भी ले कर न आए.'"

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80 किलोमीटर तक खुद बस चलाई
एक समय शेषन चेन्नै में ट्रांसपोर्ट कमिश्नर हुआ करते थे.
एक बार उनके सामने सवाल उठाया गया कि अगर आप ड्राइविंग और बस के इंजन की जानकारी नहीं रखते तो ड्राइवरों की समस्याओं को किस तरह हल करेंगे?
शेषन ने इसको चुनौती के तौर पर लिया और कुछ ही दिनों में वो न सिर्फ़ बस की ड्राइविंग करने लगे बल्कि बस के इंजन को खोल कर उसे दोबारा फ़िट करना भी उन्होंने सीख लिया.
एक बार वो यात्रियों से भरी बस को खुद चला कर 80 किलोमीटर तक ले गए.

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देवी-देवताओं की मूर्तियाँ दफ़्तर के बाहर भिजवाईं
मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के पहले ही दिन उन्होंने अपने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त रहे पेरी शास्त्री के कमरे से सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ और कैलंडर हटवा दिए.
ये तब था जब शेषन खुद बहुत धार्मिक व्यक्ति थे.
उनकी आज़ाद प्रवृत्ति का सबसे पहला नमूना तब मिला जब उन्होंने राजीव गाँधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरकार से बिना पूछे लोकसभा चुनाव स्थगित करा दिए.

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चुनाव आयोग सरकार का हिस्सा नहीं
एक बार उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, "चुनाव आयोग की स्वायत्तता का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि मेरे एक पूर्ववर्ती ने सरकार को पत्र लिख कर कहा था कि उन्हें 30 रुपये की मंज़ूरी दी जाए ताकि वो एक किताब ख़रीद सकें. उन दिनों चुनाव आयोग के साथ सरकार के एक पिछलग्गू जैसा व्यवहार किया जाता था."
"मुझे याद है कि जब मैं कैबिनेट सचिव था तो प्रधानमंत्री ने मुझे बुला कर कहा कि मैं चुनाव आयोग को बता दूँ कि मैं फ़लाँ-फ़लाँ दिन चुनाव करवाना चाहता हूँ. मैंने उनसे कहा, हम ऐसा नहीं कर सकते. हम चुनाव आयोग को सिर्फ़ ये बता सकते हैं कि सरकार चुनाव के लिए तैयार है."
"मुझे याद है कि मुझसे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त, कानून मंत्री के दफ़्तर के बाहर बैठ कर इंतज़ार किया करता था कि उसे कब अंदर बुलाया जाए. मैंने तय किया कि मैं कभी ऐसा नहीं करूंगा. हमारे दफ़्तर में पहले सभी लिफ़ाफ़ों पर लिख कर आता था, चुनाव आयोग, भारत सरकार. मैंने उन्हें साफ़ कर दिया कि मैं भारत सरकार का हिस्सा नहीं हूँ."

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बड़े अफ़सरों से सीधा टकराव
साल 1992 के शुरू से ही शेषन ने सरकारी अफ़सरों को उनकी ग़लतियों के लिए लताड़ना शुरू कर दिया था. उसमें केंद्र के सचिव और राज्यों के मुख्य सचिव भी शामिल थे.
एक बार शहरी विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव के धर्मराजन को त्रिपुरा में हो रहे चुनावों का पर्यवेक्षक बनाया गया.
लेकिन वो अगरतला जाने के बजाय एक सरकारी काम पर थाइलैंड चले गए.
शेषन ने तुरंत आदेश दिया, "धर्मराजन जैसे अफ़सरों को ये ग़लतफ़हमी है कि चुनाव आयोग के अंतर्गत उनका काम एक तरह का स्वैच्छिक काम है, जिसे वो चाहे करें या न करें. वो अगर सोचते हैं कि विदेश जाना या उनके विभाग का काम, चुनाव आयोग के काम से ज़्यादा महत्वपूर्ण है, तो उनकी इस ग़लतफ़हमी को दूर किया जाना चाहिए."
"वैसे तो उन्हें इसकी कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए, लेकिन चुनाव आयोग ने इस विकल्प का इंस्तेमाल न करते हुए सिर्फ़ उनकी गोपनीय रिपोर्ट में विपरीत प्रवष्टि करने का फ़ैसला किया है."

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हर चुनाव को किया स्थगित
शेषन के इस आदेश से सत्ता के गलियारों में तहलका मच गया. लेकिन अभी तो बहुत कुछ आना बाकी था.
2 अगस्त, 1993 को रक्षाबंधन के दिन टीएन शेषन ने एक 17 पेज का आदेश जारी किया कि जब तक सरकार चुनाव आयोग की शक्तियों को मान्यता नही देती, तब तक देश में कोई भी चुनाव नहीं कराया जाएगा.
शेषन ने अपने आदेश में लिखा, "जब तक वर्तमान गतिरोध दूर नहीं होता, जो कि सिर्फ़ भारत सरकार द्वारा बनाया गया है, चुनाव आयोग अपने-आप को अपने संवैधानिक कर्तव्य निभा पाने में असमर्थ पाता है. उसने तय किया है कि उसके नियंत्रण में होने वाले हर चुनाव, जिसमें हर दो साल पर होने वाले राज्यसभा के चुनाव और विधानसभा के उप चुनाव भी, जिनके कराने की घोषणा की जा चुकी है, आगामी आदेश तक स्थगित रहेंगे."

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चारों तरफ़ आलोचना
इस आदेश पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक थी.
शेषन ने पश्चिम बंगाल की राज्यसभा सीट पर चुनाव नहीं होने दिया जिसकी वजह से केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने उन्हें 'पागल कुत्ता' कह डाला.
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कहा, "हमने पहले कारख़ानों में 'लॉक-आउट' के बारे में सुना था, लेकिन शेषन ने तो प्रजातंत्र को ही 'लॉक-आउट' कर दिया है."

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सरकार ने की दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति
सरकार ने इसका तोड़ निकालने के लिए चुनाव आयोग में दो और चुनाव आयुक्तों जीवीजी कृष्मामूर्ति और एमएस गिल की नियुक्ति कर दी.
शेषन उस दिन दिल्ली से बाहर पुणे गए हुए थे.
बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त बने एमएस गिल याद करते हैं, "मैं उन दिनों कृषि सचिव था. मैं ग्वालियर गया हुआ था किसी दौरे के सिलसिले में. जब मैं वहाँ पहुंचा तो वहाँ नरसिम्हा राव के प्रधान सचिव अमरकांत वर्मा का फ़ोन आया. वो आईएएस में मुझसे सीनियर थे और मेरे दोस्त भी थे. उन्होंने मुझसे तुरंत दिल्ली आने के लिए कहा."
"जब मैंने अपनी मुश्किल बताई तो उन्होंने मुझे लाने के लिए एक जहाज़ भेज दिया. मैं चार बजे दिल्ली पहुंचा और सीधे प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से मिलने पहुंचा, जहाँ मेरी उनसे काफ़ी तफ़सील से बात हुई. जब मैं चुनाव आयोग अपना पद गृहण करने पहुंचा, तब तक कृष्मामूर्ति अपना चार्ज ले चुके थे, क्योंकि वो नौकरी लेने के लिए उतावला था."

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कृष्णामूर्ति से शो-डाउन
कृष्णामूर्ति ने पद संभालते ही राष्ट्रपति से शिकायत की कि उन्हें आयोग में बैठने की जगह नहीं दी जा रही.
शेषन के लौटने के बाद उनकी पहली मुलाकात भी काफ़ी कड़वाहट भरी रही.
शेषन के जीवनीकार गोविंदन कुट्टी बताते हैं, "कृष्णामूर्ति ने शेषन के बगल में पड़ी कुर्सी पर ये कहते हुए बैठने से इनकार कर दिया कि ये कुर्सियाँ तुम्हारे चपरासियों के लिए हैं. उन्होंने शेषन से कहा कि अगर आपको मुझसे बात करनी है तो मेरे बगल में आ कर बैठिए."
"तभी गिल कमरे के अंदर घुसे. उनकी समझ में नही आया कि वो मूर्ति की बगल में बैठें या शेषन के सामने की कुर्सी पर बैठें. पूरी बैठक के दौरान कृष्मामूर्ति शेषन पर फ़ब्तियाँ कसते रहे, जिसकी की उस समय की सरकार की उनसे अपेक्षा थी."
"इस भड़कावे के बावजूद शेषन जानबूझ कर चुप रहे. इससे पहले कई लोगों ने शेषन को आड़े हाथों लिया था, लेकिन किसी ने इस तरह उनके मुंह पर उनकी इस तरह से बेइज़्ज़ती नहीं की थी."

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उप चुनाव आयुक्त को दिया चार्ज
टीएन शेषन ने भी इन चुनाव आयुक्तों से सहयोग नहीं किया.
हद तब हो गई जब वो अमरीका गए तो उन्होंने इन दोनों के बजाए उपचुनाव आयुक्त डीएस बग्गा को अपना चार्ज सौंपा.
एमएस गिल बताते हैं, "मैं तो शेषन से बात कर लेता था. मेरी वो इज़्जत करता था. मैं भी उसके साथ उसी तरह व्यवहार करता था जैसा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ किया जाना चाहिए. लेकिन अमरीका जाने से पहले बग्गा को चार्ज देने को किसी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता."
"हम दोनों को राष्ट्रपति ने नियुक्त किया था. हमें तनख़्वाह मिल रही थी, तब भी उसने एक आईएएस अफ़सर को आयोग चलाने की ज़िम्मेदारी दी. जब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया तो उसने आदेश दिया कि शेषन की अनुपस्थिति में मैं आयोग को चलाउंगा."
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इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जमा करने का शौक
बहरहाल इन दोनों चुनाव आयुक्तों के रहते शेषन ने अपना छह साल का कार्यकाल पूरा किया.
उनके बारे में कहा जाता था कि भारतीय राजनेता सिर्फ़ दो चीज़ों से डरते हैं, पहला ईश्वर और दूसरा शेषन.
उन्होंने एक इंटरव्यू में एक बहुचर्चित जुमला बोला था, "आई ईट पॉलिटीशियंस फॉर ब्रेकफ़ास्ट." यानी मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूँ.
लेकिन शेषन का मानवीय पक्ष भी था. वो कर्नाटक संगीत के शौकीन थे. उनको इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जमा करने का शौक था.
गोविंदन कुट्टी बताते हैं, "ये इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स इस्तेमाल करने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ़ देखने के लिए ख़रीदे जाते थे. उनके पास चार टेलिविजन सेट्स थे. उनकी हर दूसरी मेज़ या अलमारी पर एक स्टीरियो रिकॉर्डर रखा रहता था. उनका फ़ाउंटेन पेन का संग्रह तो नायाब था."
"जो भी बच्चा उनके घर आता था, उसे वो अक्सर एक पेन भेंट में देते थे, जब कि वो खुद बेहद साधारण बॉलपेन से लिखते थे. वो एक बहुत मामूली घड़ी पहनते थे, वो भी सिर्फ़ व्यस्क होने के प्रतीक के तौर पर, जब कि उनकी अलमारी में दुनिया की एक से एक मंहगी घड़ियाँ पड़ी रहती थीं."
"चीज़े जमा करना उनका शौक था, उनका इस्तेमाल करना नहीं."
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हर बड़े शख़्स से पंगा
शेषन ने अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव किसी को नहीं बख़्शा.
उन्होंने बिहार में पहली बार चार चरणों में चुनाव करवाया और चारों बार चुनाव की तारीखें बदली गईं. ये बिहार के इतिहास का सबसे लंबा चुनाव था.
एमएस गिल याद करते हैं, "शेषन का सबसे बड़ा योगदान था कि वो चुनाव आयोग को 'सेंटर- स्टेज' में लाए. इससे पहले तो मुख्य चुनाव आयुक्त का पद गुमनामी में खोया हुआ था और हर कोई उसे 'टेकेन फॉर ग्रांटेड' मान कर चलता था."
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