मोदी से रिश्ते और बयानों से समझें क्या है गडकरी की पॉलिटिक्स

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नितिन गडकरी ने रविवार को एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए मुंबई में ऐसा बयान दे दिया है जिसको लेकर राजनीतिक चर्चाओं का दौर शुरू हो गया.
गडकरी ने अपने बयान में कहा, "सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं पर दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है. इसलिए सपने वही दिखाओं जो पूरे हो सकें. मैं सपने दिखाने वालों में से नहीं हूं, मैं जो बोलता हूं वो शत प्रतिशत डंके की चोट पर पूरा होता है."
अपने इस बयान में गडकरी ने किसी नेता या पार्टी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका यह बयान उनकी अपनी ही सरकार की मुश्किलों को बढ़ा सकता है. गडकरी के बयान के बाद प्रियंका चतुर्वेदी ने ट्वीट किया है, गडकरी जी हम समझ गए हैं कि आपका निशाना किधर है.
वहीं एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने भी ट्वीट किया है गडकरी काफ़ी चतुराई से पीएम मोदी को आईना दिखाने का काम कर रहे हैं. इन सबका असर ये हुआ है कि बीजेपी को सफ़ाई देनी पड़ी है कि नितिन गडकरी का बयान विपक्ष के नेताओं के लिए था, ना कि नरेंद्र मोदी के लिए, क्योंकि प्रधानमंत्री जी सपने नहीं दिखाते हैं, सपने पूरे करते हैं.
दरअसल ये कोई पहला मौका नहीं है, जब गडकरी ने ऐसा बयान दिया है जो उनकी अपनी सरकार के लिए ही मुश्किल भरा साबित हो रहा है. बीते सात जनवरी को नागपुर में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि वे आरक्षण की व्यवस्था में यक़ीन नहीं रखते हैं. 'इस देश में इंदिरा गांधी जैसी नेता भी थीं, क्या उन्होंने कभी आरक्षण का सहारा लिया.'
इससे पहले भी एक बार मराठा आरक्षण के मुद्दे पर कह चुके थे कि आरक्षण देने का क्या फ़ायदा जब नौकरियां ही नहीं हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
बेबाक बयान देने वाले इकलौते नेता
इससे पहले 24 दिसंबर, 2018 में पांच राज्यों के चुनाव परिणाम और तीन राज्यों में पार्टी के हाथ से सत्ता निकलने पर दिल्ली में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सालाना लेक्चर में उन्होंने कहा था कि पार्टी के विधायक और सांसद अच्छा काम नहीं करते हैं तो उसकी ज़िम्मेदारी पार्टी के मुखिया की होती है.
गडकरी के ऐसे बयान जब भी आते हैं राजनीतिक तौर पर हेडलाइंस बनाते हैं, क्योंकि मौजूदा समय में पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी के सामने इस तरह के बयान देने वाले वे इकलौते नेता हैं.
उनके इन बयानों पर वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अजय सिंह बताते हैं, "गडकरी जी खुलकर बोलते हैं, उनके दिमाग में जो आता है, वो बोलते हैं. लेकिन वे बीजेपी के विरोध में बोल रहे हैं या फिर प्राइम मिनिस्टर के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं, ये कहीं से समझ में नहीं आता है. वे जो बोलते हैं वो तो किसी और पार्टी के लिए भी सही हो सकता है."

इमेज स्रोत, Getty Images
बीजेपी पर नब्बे के दशक से ही नज़र रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार विजय त्रिवेदी की राय इससे उलट है. वे कहते हैं, "नितिन गडकरी मंजे हुए राजनेता हैं. वे जो कुछ भी बोलते हैं उसके मायने होते हैं. उन्होंने अपने ताज़ा बयान से इस ओर इशारा किया है कि उनकी सरकार में कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल सपने दिखाते होंगे, लेकिन वे ख़ुद उनमें शामिल नहीं हैं. तीन राज्यों में बीजेपी की हार पर जो उनका बयान आया था, वह तो कांग्रेस के लिए नहीं ही रहा होगा ना."
दरअसल, नितिन गडकरी भारतीय जनता पार्टी के कोई आम नेता नहीं हैं, वे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं. पार्टी के अंदर उनकी पकड़ कितनी मज़बूत रही है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने संविधान को उनको दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए बदला था.

इमेज स्रोत, Getty Images
संघ का समर्थन किसे?
2009 से 2013 के बीच भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी के चलते पार्टी का संविधान ज़रूर बदला लेकिन पूर्ति घोटाले की आंच के चलते वे दोबारा पार्टी के अध्यक्ष नहीं बन पाए थे. इसके अलावा वे उस नागपुर से आते हैं जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय रहा है. ऐसे में उन्हें संघ का बेहद नज़दीकी नेता माना जाता रहा है.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "नितिन गडकरी जी को एक तरह से संघ के वायस के तौर पर देखा जाता है. ऐसे में उनके बयान से एक बड़ा संदेश ये ज़रूर उभर रहा है कि क्या संघ, ऐसे संदेश पार्टी और सरकार को तो नहीं देना चाहता? क्योंकि संघ से समर्थन के बिना गडकरी जैसे बड़े नेता ऐसे बयान तो नहीं ही दे सकते हैं."
हालांकि मराठी पत्रकार और विश्लेषक प्रकाश बल के मुताबिक, "संघ से गडकरी की बेहद नज़दीकी है लेकिन संघ उनके सहारे मौजूदा सरकार पर सवाल उठा रहा होगा, ऐसा आकलन करना बहुत दूर की बात होगी."

इमेज स्रोत, Getty Images
हालांकि राजनीतिक गलियारों में अभी से इस बात के कयास लगाए जाने लगे हैं कि अगर नरेंद्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी को 2019 में बहुमत नहीं मिला तो फिर नितिन गडकरी का नाम आगे किया जा सकता है. इसे कई लोग तो संघ के प्लान बी के तौर पर भी देख रहे हैं.
हालांकि अजय सिंह इस राय से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वे बताते हैं, "संघ या फिर कुछ नेताओं के चाहने से कोई प्रधानमंत्री तो नहीं बनता. प्रधानमंत्री तो वही बनता है जिसकी स्वीकार्यता होती है. मौजूदा प्रधानमंत्री की स्वीकार्यता है, अब आगे वो नहीं रहेगी तो देखेंगे. लेकिन मेरी जानकारी में इस स्तर पर कोई प्लान बी तो नहीं होता है."
अजय सिंह ये भी कहते हैं कि जब गडकरी संघ के इतने प्रिय नेता हैं, तो फिर प्रधानमंत्री कोई दूसरा कैसे बन गया. हालांकि ये सवाल कुछ दूसरे विश्लेषक भी उठाते हैं कि अगर गडकरी इतने पसंद हैं तो फिर वे 2014 में पहली पसंद क्यों नहीं बन पाए.
इसका जवाब विजय त्रिवेदी देते हैं, "गडकरी तब भी दौड़ में थे. जब वाजपेयी और आडवाणी के बाद नई लीडरशिप की चर्चा हो रही थी तब गडकरी इस दौर में थे ही. 2014 के आम चुनावों के लिए संघ हिंदुत्व को बड़ा मुद्दा बनाना चाहता था और मोदी गडकरी की तुलना में हिंदुत्व का बड़ा चेहरा थे, गुजरात की छवि हिंदुत्व की प्रयोगशाला की भी थी, इन सबने मिलकर मोदी को गडकरी से आगे कर दिया था."

इमेज स्रोत, Getty Images
बहरहाल, एक बात तो है कि जिस नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के सामने बीजेपी के बड़े बड़े नेता कुछ नहीं बोल पा रहे हों, वहां केवल नितिन गडकरी हैं जो इस तरह से खुलकर बात करते रहे हैं और वो भी लगातार कर रहे हैं.
उनके इस अंदाज़ पर अजय सिंह कहते हैं, " ये बात ठीक है कि कोई दूसरा मंत्री इस तरह से नहीं बोल रहा है लेकिन अगर गडकरी बोल रहे हैं तो कम से कम ये संदेश तो नहीं जा रहा है ना कि पार्टी के अंदर आंतरिक लोकतंत्र नहीं है. वे अपनी बात तो रख रहे हैं."
लेकिन एक ख़ास बात और है. वह यह कि संकतों में ही सही, ऐसे सवाल उठाने के बावजूद कोई ट्रोल आर्मी नितिन गडकरी के पीछे नहीं पड़ती है. इस बारे में विजय त्रिवेदी कहते हैं, "इसकी वजह ये है कि नितिन गडकरी मौजूदा समय के कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं. आज जब कुछ नेताओं के दरवाजे कार्यकर्ताओं के लिए नहीं खुलते हैं, वहां वे हर रोज़ देर रात तक बीजेपी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं से मिलते देखे जा सकते हैं."
कैसा रहा है मोदी से रिश्ता?
जहां तक नरेंद्र मोदी और नितिन गडकरी के आपसी रिश्तों की बात है, तो उसको लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं. बीजेपी पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने बीबीसी हिंदी के लिए लिखे लेख में बताया है कि जब नितिन गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष हुआ करते थे तब अमित शाह को अदालत के आदेश के चलते गुजरात राज्य छोड़ना पड़ा और गडकरी से मुलाकात करने के लिए उन्हें घंटों इंतज़ार करना होता था.

इमेज स्रोत, Getty Images
नरेंद्र मोदी और नितिन गडकरी के आपसी संबंध किस तरह से हैं, इसे देखने के लिए ये देखना होगा कि जब 2009 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और अनंत कुमार को पीछे छोड़ते हुए मराठी ब्राह्मण नितिन गडकरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया था तब मोदी बीजेपी के इकलौते मुख्यमंत्री थे जो शुभकामनाएं देने दिल्ली नहीं पहुंचे थे.
बीजेपी के अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी, संजय जोशी को बीजेपी में वापस ले आए थे. कभी बीजेपी प्रचारक के तौर पर मोदी और संजय जोशी की दोस्ती हुआ करती थी, जो राजनीतिक दुश्मनी में बदल गई. ऐसे में नितिन गडकरी ने संजय जोशी को 2012 में जब यूपी का चुनाव संयोजक बनाया तो मोदी ये पसंद नहीं आया था और वो उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने नहीं गए.
इसके बाद ही आया था 2012 का मुंबई अधिवेशन जिसमें मोदी ने संजय जोशी के पार्टी से इस्तीफ़े की मांग रख दी थी. इस अधिवेशन की बात करते हुए विजय त्रिवेदी बताते हैं, "संजय जोशी तो दिल्ली से ट्रेन पकड़कर मुंबई पहुंच गए थे, गडकरी को भी लगा था कि मोदी इस पर अड़ेंगे नहीं. लेकिन मोदी अहमदाबाद से मुंबई के बदले उदयपुर पहुंच गए थे. आख़िर में गडकरी को नहीं चाहते हुए भी जोशी का इस्तीफ़ा लेना पड़ा था, तभी मोदी उस अधिवेशन में शामिल होने पहुंचे थे."
इस बारे में अजय सिंह कहते हैं, "जब इतनी बड़ी पार्टी और इतनी बड़ी सरकार की बात हो तो उसमें व्यक्तिगत संबंधों का बहुत रोल नहीं रह पाता है. लेकिन आप ये भी देखिए ना कि जब संबंध अच्छे नहीं हो तो कोई शख़्स किसी प्राइम मिनिस्टर की कैबिनेट में कैसे हो सकता है."

इमेज स्रोत, Getty Images
इसके बाद ये भी कहा जाता है कि नितिन गडकरी केंद्र में मंत्री होने के बजाए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने देवेंद्र फड़णवीस को राज्य की कमान थमाई, जिन्हें महाराष्ट्र की राजनीति में गडकरी के सामने बहुत जूनियर माना जाता रहा है.
इतना ही नहीं जिस शिवसेना से नितिन गडकरी के बेहद मधुर संबंध माने जाते रहे हैं, उस शिवसेना से मोदी-शाह की बीजेपी के संबंध अलगाव तक पहुंच गए हैं. गडकरी और शिवसेना के आपसी संबंध कैसे हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शिवसेना की ओर से ऐसे बयान आने शुरू हो गए हैं कि अगर गडकरी प्रधानमंत्री पद के लिए सामने आते हैं तो वे बीजेपी का समर्थन करेंगे.
हालांकि मराठी पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश बल ये बताते हैं कि नितिन गडकरी हमेशा से बेबाक बयान देने वाले नेता रहे हैं. वे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि मंत्री बनने के बाद से नितिन गडकरी ने ऐसे बयान देने शुरू किए हैं. वे जब अध्यक्ष थे, तब भी इस तरह के बेबाकी भरे बयान देते रहे थे. वे ऐसे नेता हैं जो बयान देने के बाद बहुत सोच विचार भी नहीं करते हैं कि ऐसा बोल दिया तो अब क्यों होगा, ये उनकी अपनी ख़ासियत है."

इमेज स्रोत, @NITIN_GADKARI
वैसे ये सच ही है कि नितिन गडकरी जब बीजेपी के अध्यक्ष थे, उस दौर में उनके कुछ बयानों ने काफ़ी सनसनी मचाई थी, जिसमें विवेकानंद और दाऊद इब्राहिम का आईक्यू एक जैसा था और अफ़ज़ल गुरु कांग्रेस का दामाद है जैसे बयान शामिल थे.
लेकिन मोदी सरकार में अपने कामकाज में दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करने वाले गडकरी इन दिनों जो बोल रहे हैं, वो केवल चर्चा में बने रहने के लिए दिए जाने वाले बयान नहीं हैं.
उनके इन बयानों की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी- अमित शाह भी इन्हें अनसुनी करने को विवश हो रहे हैं. ये बात ठीक है कि नितिन गडकरी ने अब तक कोई मोर्चा नहीं खोला है लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करेंगे, इसकी गारंटी कोई नहीं दे रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















