आरक्षण आर्थिक आधार पर देने की कोशिश पहले भी हुई है लेकिन...

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- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आर्थिक आधार पर आरक्षण देने पर बहसें पहले भी हुई हैं, और सुप्रीम कोर्ट ऐसी किसी कोशिश को असंवैधानिक करार दे चुकी है. लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अब संविधान में बदलाव करके इसे लागू करने जा रही है.
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगड़ी जातियों के गरीबों को 10 फीसद आरक्षण देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. सरकार के इस फ़ैसले का मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस सहित अन्य दलों ने भी 'किंतु-परंतु'के साथ समर्थन ही किया है, लिहाजा इस सिलसिले में सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले संविधान संशोधन विधेयक का पारित होना भी लगभग तय है.
गौरतलब है कि अब तक भारत के संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. यही वजह रही कि 1991 में जब पीवी नरसिंह राव सरकार ने आर्थिक आधार पर 10 फीसद आरक्षण देने का प्रस्ताव किया था तो सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने उसे खारिज कर दिया था.
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा था कि "संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक गैर-बराबरी दूर करने के मकसद से रखा गया है, लिहाजा इसका इस्तेमाल गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तौर पर नहीं किया जा सकता".

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इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के नाम से चर्चित इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना संविधान में वर्णित समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है. अपने फैसले में आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान की विस्तृत व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- "संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में आरक्षण का प्रावधान समुदाय के लिए है, न कि व्यक्ति के लिए. आरक्षण का आधार आय और संपत्ति को नहीं माना जा सकता".
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान सभा में दिए गए डॉ. आंबेडकर के बयान का हवाला देते हुए सामाजिक बराबरी और अवसरों की समानता को सर्वोपरि बताया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट के इसी फ़ैसले की रोशनी में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों की सरकारों के इसी तरह के फैसलों को उन राज्यों की हाई कोर्टों ने भी खारिज किया.
अब मोदी सरकार अपने जिस फैसले को संवैधानिक जामा पहनाने जा रही है, वह हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान विकसित हुए मूल्यों, ऐतिहासिक पूना पैक्ट और फिर संविधान सभा में हुए आरक्षण संबंधी समूचे विमर्श से तैयार हुए संविधान के अनुच्छेद 15, 16, 340 आदि के प्रावधानों यानी संविधान की मूल आत्मा और आरक्षण की बुनियादी अवधारणा के विपरीत है.

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वैसे भाजपा का मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस तो बुनियादी तौर पर आरक्षण की व्यवस्था के ही खिलाफ रहा है. उसके इस रुख का इज़हार आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और संघ के अन्य पदाधिकारियों के बयानों के जरिए भी अक्सर होता रहता है. बिहार चुनाव से पहले आरक्षण की समीक्षा वाला बयान, और रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद सीपी ठाकुर का बयान कि अब आरक्षण ख़त्म करने पर विचार करना चाहिए क्योंकि देश का राष्ट्रपति एक दलित व्यक्ति है.
भाजपा मूल रूप से आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ रही है लेकिन राजनीतिक तकाजों के मद्देनज़र वह खुलकर तो उसका विरोध नहीं करती है लेकिन उसका आग्रह आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने को लेकर रहता आया है, जो कि आरक्षण की मूल अवधारणा के खिलाफ है.
भागवत का आरक्षण की समीक्षा वाला बयान, उसके बाद मोदी का कहना कि "मैं अपनी जान की कीमत पर भी आरक्षण की रक्षा करूंगा", भाजपा के इसी उहापोह को दिखाता है.
मोदी राज्यों में चुनाव के मौकों पर आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते रहे हैं, लेकिन अब आर्थिक आधार पर आरक्षण संबंधी उनकी सरकार का ताज़ा फैसला बताता है कि आरक्षण के मामले में उनका भी मूल नज़रिया संघ और अपनी पार्टी के पारंपरिक सोच से जुदा नहीं है.

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दरअसल, मोदी सरकार इस समय नोटबंदी, जीएसटी, रॉफेल लडाकू विमान सौदे और नीरव मोदी कांड को लेकर सवालों से बुरी तरह घिरी हुई है, रोज़गार और खेती-किसानी के मोर्चे पर भी उसके खाते में नाकामी ही दर्ज है. पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है.
सर्जिकल स्ट्राइक, अर्बन नक्सल और प्रधानमंत्री की जान को ख़तरा जैसे मुद्दों से भी उसे चुनाव में कोई फ़ायदा नहीं मिल पाया. अब तीन महीने बाद ही उसे आम चुनाव में भी उतरना है. ऐसे में आर्थिक आधार पर 10 फीसद आरक्षण के फैसले को मोदी सरकार के चुनावी दांव के रूप में देखा जाना लाजिमी है.
दरअसल, सवर्ण जातियों को भाजपा का आधार वोट बैंक माना जाता है, लेकिन कुछ महीनों पहले दलित उत्पीड़न निरोधक कानून एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन पारित करने के मोदी सरकार के फैसले की वजह से सवर्णों के एक बड़े हिस्से में भाजपा को लेकर काफी नाराज़गी है, जिसका खामियाजा उसे हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा.
नाराज़ सवर्ण वोटरों ने अपने ग़ुस्से का इज़हार करते हुए भाजपा को वोट देने के बजाय नोटा का विकल्प चुना, इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा ने कई ऐसी सीटें गंवा दीं, जहां उसकी हार के अंतर से ज्यादा वोट नोटा के पक्ष में पड़े थे.

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कहने की आवश्यकता नहीं कि भाजपा ने अपने से छिटके सवर्ण मतदाताओं को साधने के मकसद से ही 10 फीसदी आरक्षण का पैंतरा चला है लेकिन यह पैंतरा बेहद जोखिम भरा है. इससे नाराज सवर्ण तो ज़रुर भाजपा की ओर लौट सकते हैं लेकिन दलित, आदिवासी और अन्य पिछडी जातियों के वे मतदाता भाजपा से छिटक सकते हैं, जो पिछले कुछ वर्षों से भाजपा के साथ थे और जिनके समर्थन के बूते ही केंद्र सहित कई राज्यों में भाजपा अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई थी.
इस बारे में दलित आंदोलन के नेता और गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी का कहना है- 'मोदी सरकार के लिए यह फैसला आत्मघाती साबित होगा'. जिग्नेश के मुताबिक हो सकता है कि भाजपा से नाराज जो सवर्ण अभी कांग्रेस की ओर बढते दिख रहे थे, वे फिर भाजपा की ओर लौट जाएं, मगर आदिवासी और पिछडी जातियों का जो हिस्सा भाजपा के साथ जुडा है, वह अब भाजपा से छिटकेगा".
हाल के वर्षों में राजस्थान में राजपूतों ने, महाराष्ट्र में मराठों ने, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में जाटों ने तथा गुजरात में पटेलों ने आरक्षण की मांग को लेकर उग्र आंदोलन किए हैं, ये सभी सवर्ण समुदाय मोटे तौर पर भाजपा के समर्थक माने जाते हैं. मोदी सरकार ने अपने ताज़ा फ़ैसले से इन सभी समुदायों को साधे रखने का प्रयास भी किया है लेकिन उसका यह प्रयास उसके लिए भारी मुसीबत का सबब बन सकता है.

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देश की कुल आबादी में सवर्णों की संख्या महज 16-17 फीसद है और सरकार उन्हें 10 फीसद आरक्षण देने जा रही है. इस फैसले से देश में आरक्षण की आग फिर भड़क सकती है. दलित, आदिवासी और अन्य पिछडी जातियां भी अपने मौजूदा आरक्षण का प्रतिशत अपनी संख्या के आधार पर बढाने की मांग कर सकती हैं. वैसे भी बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल आदि की तरफ नारा लगाया ही जाता है- 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी.'
अब तक मिली जानकारी के मुताबिक, सरकार ने अपने फैसले में सवर्णों के आर्थिक पिछडेपन का जो पैमाना तय किया है, वह भी अजीबोगरीब है. फ़ैसले के मुताबिक जिन लोगों की पारिवारिक सालाना आमदनी आठ लाख रुपए से कम है, उन्हें ही गरीब माना जाएगा और वे ही आरक्षण के इस प्रावधान का लाभ ले सकेंगे. सवाल है कि जब सरकार आठ लाख की सालाना आमदनी वाले लोगों को आर्थिक रुप से पिछड़ा मान रही है तो फिर इनकम टैक्स की सीमा ढाई लाख रुपए रखने का क्या औचित्य है?

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आठ लाख रुपए तक सालाना यानी लगभग 66 हजार रुपए महीने की आमदनी वाले गरीब हैं और आरक्षण के दायरे में आते हैं तो 10-12 हजार रुपए या इससे भी कम की मासिक आमदनी वाले गरीब सवर्णों के लिए तो आरक्षण का लाभ पाना एक सपना ही रहेगा. फिर इस बात की भी क्या गारंटी है कि जिनकी सालाना आमदनी आठ लाख से ज्यादा है, वे अपने टैक्स सलाहकार वकील या चार्टर्ड अकाउंटेंट की मदद से खुद को ग़रीब साबित करके आरक्षण का लाभ लेने का जुगाड़ नहीं करेंगे!
सबसे अहम सवाल तो इस सरकार के चंद वरिष्ठ और प्रभावशाली मंत्रियों में से एक नितिन गडकरी के कुछ समय पहले मराठा आरक्षण आंदोलन के संदर्भ में दिए गए एक बयान से निकलता है. गडकरी ने कहा था कि जब नौकरियां ही नहीं हैं तो आरक्षण से क्या हासिल होगा?
फ़िलहाल देश में बेरोज़गारी दर 8-9 फीसद तक जा पहुंची है और शिक्षित बेरोज़गारी दर 16 फीसद के आसपास है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में देश में बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े जारी करते हुए बताया है कि वर्ष 2018 में 1.10 करोड भारतीयों ने नौकरियां गंवाई हैं.

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इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह अजीबोगरीब दावा भी याद किया जा सकता है जो कुछ महीनों पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने किया था. उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार की नीतियों से देश में रोजगार के अवसर तो बढे हैं लेकिन कितने लोगों को रोजगार मिला है, इस संबंध में सरकार के पास डाटा उपलब्ध नहीं है.
बहरहाल, संविधान निर्माताओं ने ऐतिहासिक कारणों से समाज के वंचित और शोषित जाति-समुदायों के सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के मकसद से संविधान में विशेष अवसर यानी आरक्षण की व्यवस्था की थी लेकिन यह व्यवस्था पिछले ढाई-तीन दशक से जहां एक ओर राजनीतिक दलों के लिए वोट बटोरने का औजार बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर इस व्यवस्था ने विभिन्न जाति-समुदायों में भी नई महत्वाकांक्षाएं जगाई हैं.
जो समुदाय या राजनीतिक दल कभी आरक्षण की इस व्यवस्था का मुखर होकर या दबे स्वरों में विरोध करते थे, वे भी पिछले कुछ वर्षों से इसके राजनीतिक फायदे देखकर इसके मुरीद हो गए हैं लेकिन यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ सरकारी नौकरियां लगातार कम होती जा रही हैं और दूसरी तरफ सरकारें आरक्षण पर आरक्षण दिए जा रही हैं.
आरक्षण की मांग और उसके विरोध के लगातार उग्र होते जाने की सबसे बड़ी वजह यही है कि हमारी सरकारों ने विकास की जैसी नीतियां अपनाई हैं, उनसे ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं बन पाई है जो सभी को रोज़गार देने का सामर्थ्य रखती हो.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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