क्या नरेंद्र मोदी ने खादी को वाकई लोकप्रिय बनाया?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली के कनॉट प्लेस में स्थित खादी भंडार में ग्राहक खादी के वस्त्र खरीद रहे हैं. कुछ लोग कुर्ता पहनकर और कुछ रंग-बिरंगे जैकेट को पहनकर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से पूछ रहे हैं कि वस्त्र उन पर जंच रहा है या नहीं. ग्राहकों की सबसे अधिक भीड़ जैकेट खरीदने में जुटी है.
खादी भंडार में मौजूद एक महिला ने कहा वो 25 साल से खादी वस्त्रों की ग्राहक हैं.
वो कहती हैं, "मेरे विचार में पहले के मुक़ाबले में खादी के कपड़ों में वैरायटी बढ़ी है, इसका डिज़ाइन बेहतर हुआ है".
वहां मौजूद सभी ग्राहकों ने कहा कि खादी के कपड़े अब बेहतर हैं
केरल से आये एक युवक ने कहा, "खादी अब कूल है"
इस युवा ने ये भी सुझाव दिया कि खादी को एक ब्रांड एम्बेसडर की ज़रूरत है.
वह कहते हैं, "अगर इसे कोई नामी स्पोर्ट्स खिलाड़ी या फिल्म स्टार प्रमोट करे तो खादी की लोकप्रियता में और इज़ाफ़ा होगा."

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खादी ग्राम उद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके ब्रांड अम्बेसडर हैं, अनौपचारिक रूप से ही सही, "आज आज़ादी के 70 साल के बाद अगर खादी को कोई प्रमोट कर रहा है तो नरेंद्र मोदी कर रहे हैं."


खादी के ब्रांड अम्बेसडर मोदी
तीन साल पहले विनय कुमार सक्सेना खादी ग्राम उद्योग आयोग के अध्यक्ष बने. निजी क्षेत्र में काम करने के अनुभव के साथ आयोग के अध्यक्ष बनने वाले वह पहले व्यक्ति हैं. उनका दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खादी को प्रमोट करने की पूरी कोशिश की है.
नरेंद्र मोदी अक्सर खादी कुर्ता और खादी जैकेट में नज़र आते हैं. उनके समर्थकों के बीच उनके जैकेट की पहचान "मोदी जैकेट" से हो गई है.
हर रोज़ मोदी जैकेट की बिक्री 700 से अधिक है.
प्रधानमंत्री ने देश के नाम साप्ताहिक भाषण "मन की बात" में भी कई बार खादी को प्रमोट किया है.

एक समय था जब खादी के बने कपड़े नेताओं से जुड़े थे. अब इसमें नए-नए डिज़ाइन और अनेक रंग वाले जैकेट, कुर्ते और साड़ियों के कारण आम लोगों में इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है.
महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया खादी अब काफ़ी ट्रेंडी माना जाने लगा है
शायद इसी कारण इसकी मांग, बिक्री और पैदावार में खासी बढ़ोतरी हुई है.
केंद्र सरकार की सालाना रिपोर्ट के अनुसार 2015 से 2018 फ़रवरी तक खादी की बिक्री में 31 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.
जबकि 1947 से 2014 तक औसतन बिक्री में बढ़ोतरी सात प्रतिशत से अधिक नहीं थी.

खादी की लोकप्रियता और बिक्री में इस क़दर उछाल के कारणों पर टिप्पणी करते हुए सक्सेना कहते हैं, "हम लोगों ने नए-नए डिज़ाइनर को काम पर लगाया है. रितु बेरी जैसे बड़े नामों को अपने साथ जोड़ा है".


डिज़ाइनरों का कमाल
सक्सेना ने बताया कि खादी को बड़े ब्रांड्स के साथ भी जोड़ा गया है. रेमंड्स, आदित्य बिरला और अरविंद मिल्स जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ भी करार हुआ है.
खादी उद्योग ने केंद्रीय सरकार की मदद से सरकारी अस्पतालों, सैनिक शिविरों और एयर इंडिया में इस्तेमाल होने वाले तौलिये, चादरें और नैपकिन सप्लाई करना शुरू किया है.

चरखे की मदद से, हाथ से बने सूती कपड़े वाले खादी की शुरुआत 1920 में महात्मा गांधी ने की थी.
देश की आज़ादी के बाद भारतीय नेताओं ने खादी को गांधी के सम्मान में पहनना जारी रखा.
इस सम्मान के कारण खादी पर केंद्रीय सरकार ने अपनी मोनोपोली बनायी.
साल 1956 में पारित एक क़ानून के अंतर्गत खादी की बिक्री, इसका उत्पादन और इसके प्रमोशन की ज़िम्मेदारी सरकार की है.
अगर कोई व्यक्ति निजी हैसियत से खादी के कपड़े बेचना चाहे तो उसे खादी ग्राम उद्योग की इजाज़त लेनी पड़ेगी.
लेकिन केंद्रीय सरकार की आलोचना करने वाले कहते हैं कि सालों तक खादी को नज़रअंदाज़ किया गया.
सरकार ने इसे गांधी का प्रतीक मानकर इसे औपचारिकता के लिए किसी तरह से ज़िंदा रखा.
सवाल ये है कि आख़िर अधिकारियों ने खादी की लोकप्रियता की संभावनाओं को टटोलने की पूरी कोशिश क्यों नहीं की?


सरकार की सामान्य उदासीनता

सक्सेना कहते हैं कि अब खादी की क़िस्मत पलटी है. उनके अनुसार खादी को प्रमोट देश के अंदर और बाहर के देशों में कई तरीकों से किया जा रहा है.
दक्षिण अफ्रीका, रूस और कई अन्य देशों में खादी वस्त्रों के फैशन शो आयोजित किये गए हैं.
खादी को युवाओं में लोकप्रिय बनाने के लिए फ़ैशन डिज़ाइन काउंसिल ऑफ़ इंडिया की मदद ली जा रही है.
नए तरह के चरखे बुनकरों को दिए जा रहे हैं. डिमांड अधिक है, उसी हिसाब से प्रोडक्शन बढ़ाने की पूरी कोशिश की जा रही है
खादी को ट्रेंडी बनाया तो जा रहा है इसके बढ़ते दाम को कम करने की कोशिश का एहसास नहीं होता.


आम लोगों की पहुंच के बाहर
खादी भंडार में मौजूद कई खरीदारों ने शिकायत की कि खादी महंगा है.
एक ग्राहक ने एक नई जैकेट को पहन कर कहा, "अभी देखिये, यही जैकेट जो मैंने पहनी वो 3100 रुपये की है. आम आदमी तो सोचता है कि उसे 200 रुपए की जैकेट मिल जाए".
वहीं मौजूद एक महिला ने कहा, "आम आदमी इस दाम में नहीं खरीद सकता, उसे सेल का इंतज़ार करना पड़ेगा"

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विनय कुमार सक्सेना कहते हैं, "प्रोडक्शन बढ़ने के कारण खादी के वस्त्र सस्ते हुए हैं लेकिन ग्राहक उनसे सहमत नज़र नहीं आते."
खादी के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में भारतीय मीडिया में ख़बरें ये आयी कि खादी उद्योग से जुड़े छह लाख आर्टिस्ट और मज़दूर नौकरी खो बैठे.
सक्सेना कहते हैं, "ये बिलकुल ग़लत है, ग्यारह लाख 60 हज़ार कारीगरों की संख्या 20 सालों से चली आ रही थी (इन्हें सरकारी सहायता मिलती थी). क्या ये संभव है? कोई मरा नहीं, किसी ने शादी नहीं की? ये फर्ज़ी संख्या थी. खादी संस्थाओं से मैंने कारीगरों को रजिस्टर करने को कहा और जब उनके नाम पैसे इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर किये तो वो संख्या घटकर 4 लाख 25 हज़ार हो गयी."

ऐसे फर्ज़ी लोगों के खिलाफ़ सक्सेना की टीम ने कड़े क़दम उठाये हैं और उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है
खादी की शोहरत ज़रूर बढ़ रही है. रंग, डिज़ाइन और कपड़े बेहतर हुए हैं. लेकिन खादी के वस्त्र आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गए हैं.
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