जब मुगाबे नहीं पहन पाए 'मोदी जैकेट'

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रॉबर्ट मुगाबे पर ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति का पद छोड़ने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है. सत्तारूढ़ ज़ानू-पीएफ़ पार्टी ने रॉबर्ट मुगाबे को पार्टी से बर्खास्त कर दिया है. लेकिन राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे ने देश के नाम अपने संबोधन में कहा है कि वो अगले महीने होने वाले पार्टी की बैठक में भाग लेंगे और बैठक का नेतृत्व करेंगे.
अपने संबोधन में उन्होंने इस्तीफ़ा देने के संबंध में कोई बात नहीं की बल्कि कहा कि 'हमें एक दूसरे के प्रति कटुता और कड़वाहट नहीं रखनी चाहिए'.
मुगाबे की बर्ख़ास्तगी के साथ ही ज़ानू-पीएफ़ पार्टी ने पूर्व उपराष्ट्रपति इमरसन को फिर से अपना लिया है. दो हफ्ते पहले ही मुगाबे ने इमरसन को पार्टी से निकाल दिया था.
सत्तारूढ़ ज़ानू-पीएफ़ पार्टी ने 93 वर्षीय राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को इस्तीफा देने के लिए सोमवार तक की मोहलत दी थी.
साथ ही ज़ानू-पीएफ़ पार्टी ने कहा है कि ऐसा करने पर उनके ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाएगा.
हरारे में चल रही इस राजनीतिक खींचतान के बीच शुक्रवार को ज़िम्बाब्वे से एक सांस्कृतिक दल भारत रवाना हुआ.
ये सांस्कृतिक दल मणिपुर, अहमदाबाद, दिल्ली और कोलकाता जाएगा.
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भारत और ज़िम्बाब्वे
भारत और ज़िम्बाब्वे के संबंध 14वीं सदी से चले आ रहे हैं. उस ज़माने में ज़िम्बाब्वे में मुनहुमुटापा राजवंश का शासन था.
भारतीय व्यापारी उस दौर में कपड़ा, खनिज पदार्थ और धातु लेकर ज़िम्बाब्वे पहुंचे थे. भारत ने ज़िम्बाब्वे के स्वतंत्रता संग्राम को भी पूरा समर्थन दिया था.
यहां तक कि जब साल 1980 में ज़िम्बाब्वे को आज़ादी मिली तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके स्वतंत्रता दिवस समारोह में शिरकत करने वहां गई थीं.
आने वाले सालों में भारत और ज़िम्बाब्वे के संबंध प्रगाढ़ होते गए. साल 1980 से 1994 के बीच रॉबर्ट मुगाबे छह बार भारत आए.

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भारत की तरफ़ से भी राजीव गांधी और देवेगौड़ा एक बार ज़िम्बाब्वे गए. नरसिम्हा राव और मुगाबे की मुलाकात जी-15 देशों के सम्मेलन के दौरान हुई.
हालांकि 1996 के बाद आने-जाने का ये सिलसिला अचानक रुक गया, लेकिन भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की इरकॉन और राइट्स जैसी कंपनियों के ज़िम्बाब्वे के साथ अच्छे कारोबारी रिश्ते रहे.
इस बीच चीन को अफ्रीका में भविष्य की बेहतर संभावनाएं दिखाई देने लगी. चीन ने अफ्रीका में बड़ा निवेश किया है.
इसके लिए चीन ने साल 2000 में चाइना-अफ्रीका को-ऑपरेशन भी गठित किया. इस मंच का पहला सम्मेलन बीजिंग में आयोजित किया गया था.

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भारत-अफ्रीका सम्मेलन
इससे सबक लेते हुए भारत ने भी इंडिया-अफ्रीका फ़ोरम समिट की शुरुआत साल 2008 में की.
इस फ़ोरम के अब तक तीन सम्मेलन नई दिल्ली, अदिस अबाबा (इथियोपिया) और हाल के समय में एक बार फिर से नई दिल्ली में हो चुके हैं.
पहले दो सम्मेलन बहुत ज़्यादा कामयाब नहीं रहे क्योंकि इनमें 10 से 15 अफ्रीकी देशों ने ही हिस्सा लिया.
लेकिन साल 2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन हुआ और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनकर आए. इंडिया-अफ्रीका फ़ोरम का तीसरा सम्मेलन नई दिल्ली में 2015 में हुआ.
सम्मेलन में 40 अफ्रीकी देशों के नेताओं ने हिस्सा लिया और रॉबर्ट मुगाबे भी उनमें से एक थे. मुगाबे तकरीबन 20 साल बाद भारत आए थे.

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सम्मेलन के दौरान सभी अंतरराष्ट्रीय नेताओं से भारत का पारंपरिक परिधान कुर्ता और जैकेट पहनने के लिए आग्रह किया था. सभी अफ्रीकी देशों के नेताओं के लिए डिज़ाइन किए हुए कुर्तों का इंतज़ाम किया गया था.
ये जैकेट भारतीय फ़ैशन की दुनिया में मोदी-जैकेट के नाम से चर्चित था.
सम्मेलन में शिरकत करने आए सभी देशों के नेताओं ने ये मोदी जैकेट पहना, केवल रॉबर्ट मुगाबे को छोड़कर.
उस समय भारतीय विदेश मंत्रालय ने जो फोटो जारी किया था उसमें रॉबर्ट मुगाबे ने पारंपरिक भारतीय परिधान नहीं पहना था और वे अपने ट्रेडमार्क ग्रे-सूट पहने हुए थे.
तब कहा गया था कि पारंपरिक परिधान पहनने संबंधी मेमो मुगाबे तक पहुंच ही नहीं पाया था.
हालाँकि ये ख़बर भारत ही नहीं बल्कि ज़िम्बाब्वे में भी सुर्खियों में आई थी.
ज़िम्बाब्वे के एक अख़बार ने सत्तारूढ़ ज़ानू-पीएफ पार्टी के एक नेता के हवाले से लिखा, "राष्ट्रपति कभी भी अपना बुलेट प्रूफ़ जैकेट नहीं छोड़ते. उनकी उम्र के कारण वे ऐसा कोट पहनते हैं जो उनकी पीठ को सीधा रखता है. उनके सूट ख़ास तौर पर उनके लिए सिले जाते हैं."
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