बुलंदशहर हिंसा: गाय और पुलिस के बीच पिस रही हैं ये महिलाएं

बुलंदशहर हिंसा

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    • Author, पूनम कौशल
    • पदनाम, बुलंदशहर से, बीबीसी हिंदी के लिए

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से क़रीब सौ किलोमीटर दूर बुलंदशहर ज़िले की चिंगरावठी पुलिस चौकी पर जले हुए मलवे के बीच से एक महिला टूटे हुए गैस के चूल्हे को उठाकर ले जा रही है.

वो अपना नाम लिए बिना बताती हैं कि वो चौकी पर पुलिसकर्मियों के लिए खाना बनाती हैं.

सोमवार सुबह वो रोटियां बनाकर निबटी ही थीं कि महाव गांव में गोवंश मिलने का फ़ोन पुलिस चौकी पर आया. सिपाही खाना खाए बिना ही तुरंत घटनास्थल की ओर दौड़े.

वो ग़ुस्से में कहती हैं, "सब कुछ ठीक चल रहा था और बवाल हो गया. दंगाइयों ने सारा सामान तोड़ दिया. पता नहीं अब माहौल ठीक होने में कितना वक़्त लगेगा. ये सब दल का किया धरा है."

चिंगरावठी चौकी पर सोमवार को हुई भीड़ की हिंसा में स्याना थाने के एसएचओ सुबोध कुमार और चिंगरावठी गांव के युवक सुमित चौधरी की मौत हो गई थी. हिंसा के बाद से ही आस-पास के गांवों में तनाव व्याप्त है और पुलिस बल तैनात है.

हिंसा के मामले में पुलिस अब तक नौ लोगों को गिरफ़्तार कर चुकी है और बाक़ी अभियुक्तों की गिरफ़्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है.

चिंगरावठी पुलिस चौकी के बगल से एक पतली घुमावदार सड़क महाव गांव पहुंचती है. सड़क के दोनों ओर ईख के खेत हैं. पीले फूलों से भरे सरसों के खेत भी लहलहा रहे हैं.

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डर से कांपता हुआ एक ख़ूबसूरत गांव

सुबह के सूरज की रोशनी और ताज़ा हवा में सब कुछ बेहद सुहावना लगता है, लेकिन महाव पहुंचते ही सामना अजीब सन्नाटे और डर से होता है.

गांव की सड़कें खाली हैं. कोई पुरुष या युवा नज़र नहीं आता. बच्चे और खेत पर काम के लिए जाती कुछ महिलाएं ही दिखती हैं. वो भी बात करने से कतराती हैं.

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गांव के बीचों-बीच राजकुमार चौधरी का घर है. घर की बनावट से संपन्नता झलकती है. कई गायें और भैसें खूंटों से बंधी हैं. एक लेब्राडोर कुत्ता उदास बैठा है.

आंगन में खड़ी कार के शीशे और खिड़कियां टूटी हुई हैं. कांच अभी भी वहीं बिखरा है. एक कोने में टूटी हुई कुर्सियां रखी हैं.

सोमवार को कथित गो-हत्या राजकुमार चौधरी के खेत में ही हुई थी. उनकी पत्नी प्रीति चौधरी उस सुबह को याद करके उदास हो जाती हैं. कभी महाव गांव के प्रधान पद की ज़िम्मेदारी संभालने वाले राजकुमार चौधरी अब हिंसा के मुख्य अभियुक्तों में शामिल हैं.

प्रीति चौधरी कहती हैं, "मेरे पति खेती के अलावा दूध का काम भी करते हैं. सोमवार को भी वो हर दिन की तरह दूध लेकर डेयरी पर गए थे. उनके पास गांव के लोगों का फ़ोन पहुंचा और उन्हें बताया गया कि हमारे खेत पर गोहत्या हुई है और गोअंश पड़े हुए हैं. वो तुंरत खेत पर पहुंचे और सबसे पहले पुलिस को सूचना दी. उनकी सबसे बड़ी ग़लती यही है कि उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी."

महाव गांव

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"मौक़े पर पहुंची पुलिस और भीड़ के बीच सुलह हो गई और सभी अवशेषों को वहीं खेत में दबाने के लिए तैयार हो गए. पुलिस ने मेरे पति से कहा कि गोअंश खेत में दबाने से मामला शांत हो जाएगा, माहौल में गरमी नहीं फैलेगी और लड़ाई झगड़ा नहीं होगा. लेकिन दल वाले लोग वहां पहुंच गए और उन्होंने कहा कि अगर मामला दबा दिया गया तो फिर ऐसा कांड हो सकता है."

"वो सबके मना करने के बावजूद गोवंश के अवशेषों को ट्रैक्टर ट्राली में डालकर पुलिस चौकी पर ले गए. जो भी बवाल किया है वो इन दल वाले लोगों ने किया है. इसमें मेरे पति और गांववालों की कोई भूमिका नहीं है. हमारी बदक़िस्मती ये है कि गोवंश के अवशेष हमारे खेत में मिले."

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बदला लेने की धमकी

प्रीति बात करते-करते रोने लगती हैं. वो कहती हैं, "मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं. छोटा बेटा सुबह उठकर पूछता है मम्मी, पापा कब आएंगे. वो डरे हुए हैं कि कहीं पुलिस पापा के साथ कहीं कुछ ग़लत ना कर दें."

"पुलिस वाले साफ़ कह रहे हैं कि तुम्हारे घरवाले ने हमारा पुलिसवाला मारा है. हम बदला लेकर रहेंगे. हमारे घर को चलाने वाला घर से बाहर है."

प्रीति का आरोप है कि सोमवार देर रात आई पुलिस ने उनके घर में भारी तोड़फोड़ की और उन्हें भी बुरी तरह पीटा.

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प्रीति इस घटना के बाद से डरी-सहमी हैं. खेत में गन्ने की फ़सल तैयार खड़ी है और गन्ना मिल में डालने का समय है. प्रीति की चिंता है कि वो खेती बाड़ी संभाल भी पाएंगी या नहीं.

हालांकि, अभियुक्तों के परिवार के आरोप पर मेरठ के आईजी राम सिंह का कहना है कि अगर किसी महिला के साथ ऐसा हुआ है तो वो उन्हें लिखित शिकायत दें, पुलिस कार्रवाई करेगी.

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पुलिस पर उत्पीड़न का आरोप

महाव गांव के दूसरे सिरे पर भारतीय सेना में जवान जितेंद्र चौधरी का घर है. घर के बाहर खड़ी कार पर सेना का स्टिकर लगा है. कार पर मलिक लिखा है. कार के साथ तोड़फोड़ की गई है. घर में घुसते ही बिखरा हुआ सामान नज़र आता है. वाशिंग मशीन, चूल्हा, रसोई का सामान, टीवी, पंखे आदि टूटे हुए पड़े हैं. और इनके बीच रतन कौर सर पकड़े बैठी हैं.

हमें देखते ही वो उठ खड़ी होती हैं और अपने घर का हाल दिखाते हुए सवाल करती हैं कि वो कौन सा क़ानून है जिसके तहत देर रात पुलिस घर में घुसी, तोड़फोड़ की और उनकी बहू को बुरी तरह पीटा.

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जितेंद्र मलिक को यहां सब जीतू के नाम से जानते हैं, लेकिन कोई भी उनके बारे में बात करने के लिए तैयार नहीं होता. ऐसा लगता है कि जैसे जीतू को लेकर पूरे गांव ने साझा ख़ामोशी अपना ली हो. कोई ये तक बताने को तैयार नहीं होता कि किसी ने आख़िरी बार जीतू को कब देखा था.

रतन कौर ज़ोर देकर कहती हूं कि वो अपनी ड्यूटी पर कश्मीर में है.

सोशल मीडिया पर जारी वीडियोज़ के आधार पर बताया जा रहा है कि एसएचओ सुबोध कुमार पर गोली जीतू ने ही चलायी थी.

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हालांकि, पुलिस ने अभी तक इसकी अधिकारिक पुष्टि नहीं की है.

वो बार-बार अपने बेटे को बेग़ुनाह बताती हैं. जब मैंने उनसे कहा कि एफ़आईआर में उनके बेटे का नाम है तो वो अपनी कोख़ पर ज़ोर-ज़ोर से हाथ मारने लगती है. वो कहती हैं कि सब बवाल बजरंग दल वालों ने किया और फंसाया उनके बच्चों को जा रहा है. उन्हें यक़ीन नहीं है कि उनका बेटा भीड़ में शामिल था.

जब हम गांव से लौट रहे थे तो वह रोते हुए कहने लगी कि 'मेरा बेटा ग़ुनाहगार है तो सज़ा दो, बेग़ुनाह है तो इंसाफ़ करवाओ.' उनका दिल ये मानने को तैयार ही नहीं है कि उनका सैनिक बेटा ऐसा अपराध कर सकता है.

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बजरंग दल के मेरठ प्रांत के संयोजक बलराज डूंगर से जब इस मामले में उनके दल की संलिप्तता पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, "हमारे कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे नहीं थे बल्कि उन्हें बुलाया गया था. पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए तमाम आरोप बजरंग दल पर लगा रही है."

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मौत के बाद असम्मान क्यों?

महाव जैसा ही सन्नाटा चिंगरावठी गांव में भी पसरा है. हिंसा में मारे गए सुमित चौधरी का परिवार अनशन पर बैठा है. उनकी मां बोलने की स्थिति में नहीं थीं. बहन बबली चौधरी बमुश्किल शब्दों को जुटाकर कहती हैं कि सुमित को इंसाफ़ और सम्मान मिले.

बबली कहती हैं, "मेरा भाई सीधा-सादा लड़का था जो सेना में भर्ती होने का ख़्वाब देखता था. मुझसे कहता था कि मैं वर्दी में कैसा लगूंगा, मैं हंसकर कहती थी कि नज़र लग जाएगी. मेरे भाई को भीड़ की नज़र लग गई."

वो कहती हैं, "हम बहुत ग़रीब हैं. मेरी दो छोटी कुंवारी बहनें नोएडा में नौकरी करती हैं ताकि मेरे भाई पढ़ सकें. जिस भाई के सपने पूरे करने के लिए उन्होंने अपने सपने त्याग दिए, उसकी लाश देखनी पड़ी है. हमारे दुख को कोई बाहर वाला नहीं समझ सकता. जिसका जाता है, उसे ही दर्द महसूस होता है."

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बबली को अफ़सोस है कि उनका भाई भी उस उन्मादी भीड़ का हिस्सा बन गया. वो इस सबके लिए भीड़ को ज़िम्मेदार मानती हैं.

सुमित के बड़े भाई विनीत को सबसे बड़ा दुख ये है कि उनके भाई को मौत के बाद गोरक्षक दलों और राजनीतिक दलों से जोड़ा जा रहा है.

वो कहते हैं, "ना मेरा भाई गोरक्षक था ना किसी पार्टी का कार्यकर्ता था. वो तो नोयडा में रहकर एनडीए की तैयारी कर रहा था. घर से दोस्त को छोड़ने गया था पता नहीं कैसे भीड़ में शामिल हो गया."

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गायों को समस्या बनने से रोका जाए

बुलंदशहर के इस इलाक़े में लोग गायों को लेकर बेहद भावुक और संवेदनशील हैं. अधिकतर किसानों के घरों में गायें बंधी नज़र आती हैं. लेकिन यही गायें यहां के लिए एक बड़ी समस्या भी बनती जा रही हैं.

प्रीति चौधरी कहती हैं, "गायें जब दूध नहीं देती तो उन्हें खुला छोड़ दिया जाता है. वो खेतों में नुक़सान करती हैं लेकिन किसान कुछ नहीं कहते क्योंकि वो इन्हें पवित्र मानते हैं. फ़सल बचाने के लिए खेतों की तारबंदी तक करनी पड़ रही है. अगर इन गायों की देखभाल का प्रबंध नहीं किया गया तो देश में कहीं भी किसी भी इलाक़े में कभी भी इस तरह के कांड होते रहेंगे."

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बुलंदशहर हिंसा की सबसे बड़ी पीड़ित ये महिलाएं लगती हैं जो सीधे तौर पर इसमें शामिल तो नहीं थीं, लेकिन इसका दंश उन्हें ही झेलना पड़ रहा है.

प्रीति चौधरी, बबली चौधरी और रतन कौर के सामने अचानक असामान्य परिस्थितियां पैदा हो गई हैं और वो नहीं जानती कि इन चुनौतीपूर्ण हालातों से कैसे निकला जाए.

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