क्या यमुना का गला घोंटकर खड़ा है सिग्नेचर ब्रिज: निर्माण का रियलिटी चेक

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- Author, सूर्यांशी पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''पहले वज़ीराबाद के पुल पर 4-5 घंटे तक का जाम लगता था, ऐसा लगने लगा था कि ज़िंदगी बर्बाद हो गई है, लेकिन जब से सिग्नेचर ब्रिज बना है, यक़ीन मानिए, अब 10 मिनट में यमुना पार कर लेते हैं.''
कुछ इस अंदाज़ में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले अमित ने अपनी खुशी का इज़हार किया जब पूर्वी दिल्ली को वज़ीराबाद से जोड़ने वाला यह सिग्नेचर ब्रिज मिला.
यमुना नदी पर बना यह ब्रिज पांच नवंबर से आम लोगों के लिए खोला गया और तब से पूर्वी दिल्ली मानो राहत की सांस ले रही है. लेकिन क्या दिल्लीवालों को मिली ये राहत यमुना नदी का दम घोंटकर दी गई है?
इस सवाल का जवाब पता करने के लिए सिग्नेचर ब्रिज को नापा जाए यानी कि इसके निर्माणकार्य का रियलिटी चेक किया जाए.

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एक बात यहां बताना ज़रूरी है कि पहले उत्तरी दिल्ली को उत्तर पूर्वी दिल्ली से जोड़ने वाला एक पतला-सा पुल हुआ करता था- वज़ीराबाद ब्रिज, जिसके कारण कई घंटों तक जाम लगा रहता था और जो वायु प्रदूषण का कारण भी बन गया था.
ऐसे में सिग्नेचर ब्रिज के बनने से केवल यातायात का समाधान नहीं निकला है बल्कि दिल्ली की हवा भी कम ज़हरीली हो सके इसका भी इंतेज़ाम करने की कोशिश की गई है.
लेकिन सिग्नेचर ब्रिज के निर्माण के दौरान प्रदूषण से मरती यमुना की सुध भी लेने की ज़हमत उठाई गई?
कितनी ज़हरीली है यमुना?
चलिए सबसे पहले ये पता करते हैं कि यमुना में जल प्रदूषण का स्तर कितना है. इसके लिए सीपीसीबी (सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) की 2016 की रिपोर्ट पर नज़र डालें तो वज़ीराबाद के पास यमुना के प्रवाह में डीओ यानी कि डिज़ॉल्वड ऑक्सीजन जो जलजीवन के लिए ज़रूरी है वह 10.8 है जो पर्यावरण मापदंडों के हिसाब से अच्छी मात्रा मानी जाती है. वहीं ओखला के पास बह रही यमुना सांस लेने को तरस रही है और वहां डी.ओ 1.1 है.

बी.ओ.डी यानी कि बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड. इसकी मात्रा ज़्यादा हो तो जल प्रदूषण ज़्यादा होने के संकेत होते हैं. वज़ीराबाद के पास बी.ओ.डी 9 है जो ख़राब नहीं मानी जाती, वहीं ओखला के पास 2015 में 97 था जबकि 2016 में 67 हुआ.

और अगर सिर्फ सिग्नेचर ब्रिज के पास बह रही यमुना नदी की रिपोर्ट देखनी हो तो पर्यावरण विशेषज्ञ और गुरु गोविंद सिंह यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर दीक्षा कात्याल की 2012 में यमुना पर की गई रिपोर्ट के मुताबिक़ डी.ओ नज़फगढ़ के पास बहने वाली यमुना के प्रवाह में सबसे कम पाई गई थी और बी.ओ.डी सबसे ज़्यादा पाई गई थी.


और यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यमुना नदी के प्रदूषण का स्रोत फ़ैक्ट्री से निकलने वाले केमिकल हैं, घर से निकलने वाला कूड़ा और नागरिकों की लापरवाही है.
जल प्रदूषण के इन स्रोतों से तो आप बाख़बर हैं, लेकिन नदी के ऊपर होने वाले निर्माण भी जल प्रदूषण के स्रोत होते हैं, क्योंकि हम यहां सिग्नेचर ब्रिज की बात कर रहे हैं तो पहले ये समझने की कोशिश करते हैं कि ब्रिज के निर्माण से नदी को क्या नुक़सान पहुंच सकता है.
कैसे नदी पर निर्माण से पहुंचता है नदी को नुकसान?
नदी पर किसी तरह के निर्माण से पहले उस मॉडल की स्टडी कर ये पता लगाया जाता है कि उससे नदी को कितना नुकसान पहुंच सकता है.
इस स्टडी को अंग्रेज़ी में हाइड्रोलॉजिकल स्टडी कहते हैं.

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सिग्नेचर ब्रिज को बनाने से पहले इसके मॉडल की हाइड्रोलॉजिकल स्टडी पुणे के केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान केन्द्र ने की थी. इस स्टडी के बाद मॉडल को बनने के लिए पास किया गया था.
इस हाइड्रोलॉजिकल स्टडी की टीम में मौजूद पर्यावरण विशेषज्ञ से जब हमने बात की तो उन्होंने समझाया कि नदी पर ब्रिज के निर्माण से पहले ये पता लगाया जाता है कि पानी में ब्रिज के पिलर या किसी और तरह का निर्माण करने से जल स्तर कितना बढ़ सकता है. अगर वह ज़्यादा हो तो बाढ़ की स्थिति में जल प्रवाह अनुमान से अधिक होगा जो बड़े ख़तरे को न्यौता दे सकता है.
इसके अलावा नदी के ऊपर निर्माण से नदी के आकार में किसी तरह का बदलाव नहीं आना चाहिए. अगर आए तो उसका समाधान भी निकालना होगा.
ब्रिज के पिलर नदी में धसे होने से रेत आसपास जमा हो सकती है या जल प्रदूषण के कारक जमा हो सकते हैं जो जल प्रवाह के लिए अच्छा नहीं माना जाता.

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तो सिग्नेचर ब्रिज से पहुंचा यमुना को नुकसान या नहीं?
जब उनसे यह पूछा गया कि सिग्नेचर ब्रिज के मॉडल पर की गई हाइड्रोलॉजिकल स्टडी से क्या सामने आया था. तो उन्होंने बताया कि इस ब्रिज का मॉडल ऐसा था जिसमें आम ब्रिज में लगने वाले पिलरों के मुक़ाबले कम पिलर लगाने का प्रस्ताव था.
ब्रिज की बनावट और डिज़ाइन पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया गया था.
इसका विस्तार से पता लगाने के लिए हमने सिग्नेचर ब्रिज के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर नरेंद्र कुमार सरीन से बात की तो वह समझाते हुए बताते हैं कि ब्रिज के संतुलन के लिए अमूमन 30 मीटर पर एक पिलर लगाया जाता है.

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उस लिहाज से कुल मिलाकर 26 पिलरों का निर्माण होना चाहिए, लेकिन सिग्नेचर ब्रिज 19 केबलों पर टिका हुआ है, इस कारण से ब्रिज को बनाने के लिए 26 की जगह केवल 11 पिलरों का निर्माण किया गया और उनको यमुना नदी से दूर लगाया गया.
इसके अलावा उन्होंने कहा "इस ब्रिज की बनावट आप देखेंगे तो यह भारत का पहला ब्रिज है जो केबलों पर टिका हुआ है. इसकी एक ख़ास वजह है. दरअसल ब्रिज के संतुलन के लिए पिलर की आवश्यकता होती है लेकिन यमुना नदी का ध्यान रखते हुए इस ब्रिज को अतरिक्त संतुलन केबलों के द्वारा दिया गया ताकि पिलर केबलों के सहारे खड़ा रहे."
जब हम रिपोर्टिंग करने पहुंचे तो हमने देखा कि पिलर तो नदी में नहीं लगे हैं पर इन केबलों को टिकाने के लिए एक ढांचा यमुना नदी में बनाया गया. इसकी तस्वीर आप नीचे देख रहे हैं.

इसके बारे में जब हमने नरेंद्र कुमार सरीन से पूछा तो उन्होंने कहा कि लोहे के लगे ये ढांचे परमानेंट स्ट्रक्चर नहीं हैं क्योंकि अभी भी ब्रिज पर काम चल रहा है इसलिए यह ढांचा लगा हुआ है और दिसंबर के अंत तक निर्माण ख़त्म होते ही ये लोहे के ढांचे हटा दिए जाएंगे.
इस ब्रिज का आर्किटेक्चर मुंबई स्थित कंपनी रतन.जे.बाटलीबॉय आर्किटेक्ट प्राइवेट लिमिटेड के साथ-साथ जर्मनी के इंजीनियर चार्स कोरेन ने भी किया है.
ब्रिज के डिज़ाइन पर तीन कंपनियों ने काम किया था और साथ ही इसका निर्माण गैमन इंडिया ने भी किया.
सिग्नेचर ब्रिज ने और कौन-कौन सी परीक्षाएं दीं
लेकिन ब्रिज के निर्माण में केवल यमुना नदी ही अग्नि परीक्षा के लिए सामने खड़ी नहीं होती बल्कि इसके अलावा पर्यावरण से जुड़े कई मापदंडों को भी पार करना होता है जिसकी सुध लेता है सरकार द्वारा बनाया गया ईआईए.
ईआईए यानी इन्वार्मेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट. इस एक्ट के ज़रिए पता लगाया जाता है कि पर्यावरण को निर्माण से कितना नुकसान पहुंच सकता है. इस समीक्षा में साइट निरीक्षण से लेकर जलजीवन, आसपास के इलाकों पर इसका असर, पेड़ों का कटना, इन सबको लेकर रिपोर्ट तैयार की जाती है.

एग्जीक्यूटिव इंजीनियर नरेंद्र कुमार सरीन ने बताया कि ईआईए के तहत जितने पेड़ों को निर्माण के कारण काटते हैं उसके 10 गुना पेड़ लगाने का प्रण लेना होता है. इसका जुर्माना होता है.
एनजीटी (नैशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल) को सिग्नेचर ब्रिज के लिए 14 करोड़ का हर्जाना भरा गया जब पेड़ काटे गए. अब उसका उपयोग पेड़ों को लगाने के लिए किया गया या नहीं इसके लिए एनजीटी को आरटीआई (राइट टू इंफॉर्मेशन) भेजकर ली जा सकती है.
हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञ दीक्षा कात्याल ने ये सवाल उठाया कि क्या निर्माणकार्य के दौरान इकट्ठा होने वाला कूड़ा नदी के पास छोड़ा गया या उसको औपचारिक तरीक़े से निकाला गया, क्योंकि इसका निकास ठीक ढंग से होना यमुना के लिए महत्वपूर्ण है.

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इसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए नरेंद्र कुमार सरीन ने कहा कि जब किसी ब्रिज की रिपेयरिंग की जाती है तो कूड़ा जमा होता है क्योंकि यहां एक नया ब्रिज ही बन रहा था तो इसके निर्माण के दौरान बचे सामान एक निर्धारित स्थान पर ही डाले गए.
हालांकि इस वक़्त चुनौती इस ब्रिज पर चल रहे ट्रैफ़िक की सुरक्षा की भी है जो आए दिन सवालों के घेरों में है.
दुर्घटना स्थल बन गया है सिग्नेचर ब्रिज जिसमें कुछ हद तक ज़िम्मेदारी उनकी भी है जो इसका इस्तेमाल अपने यातायात के साथ-साथ स्टंट के लिए भी कर रहे हैं.
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