क्या अहमद शाह ने असावल जीतकर अहमदाबाद या कर्णावती शहर को बसाया

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- Author, दीपक चुडासमा
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने हाल ही में कहा है कि राज्य सरकार अहमदाबाद का नाम बदलकर कर्णावती करने पर विचार कर रही है.
वहीं, गुजरात के सीएम विजय रुपाणी भी कह चुके हैं कि अहमदाबाद का नाम बदला जा सकता है.
इन बयानों के बाद अहमदाबाद के इतिहास को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. नाम बदलने के पक्ष में खड़े होने वाले और इसकी आलोचना करने वाले अपनी-अपनी तरह से इतिहास की व्याख्या कर रहे हैं.
लेकिन असलियत में अहमदाबाद को बसाए जाने का इतिहास क्या है? क्या ये कर्णावती शहर था जिस पर अहमद शाह ने क़ब्ज़ा करके उसका नाम अहमदाबाद रख दिया?
विद्रोह की वजह से बसाया गया शहर

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गुजरात यूनिवर्सिटी में फ़ारसी विभाग के पूर्व प्रमुख छोटूभाई नायक ने अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ इस्लामिक सल्तनत इन गुजरात' में गुजरात के मुसलमान शासकों का ज़िक्र विस्तार से किया है.
अपनी किताब में वे लिखते हैं कि गुजरात के पहले स्वतंत्र शासक मुज़फ़्फ़रशाह ने अपने चार लड़कों को दरकिनार करके अपने पोते अहमद शाह को अनहिलवाद (पाटन) के सिंहासन पर बिठा दिया था.
मुज़फ़्फ़रशाह के फ़िरोज़ ख़ान, हैबत ख़ान, सादत ख़ान, तातार ख़ान और शेर ख़ान नाम के पांच बेटे थे. अहमद शाह तातार ख़ान के बेटे थे.
लेकिन अहमद शाह के चाचा इतनी आसानी से अपने अधिकार नहीं खोना चाहते थे.
एडवर्ड क्लाइव बेले अपनी किताब 'द लोकल मौह्मडन डायनेस्टीज़: गुज़रात' में बताते हैं कि फ़िरोज़ ख़ान के बेटे मौदूद उस समय बड़ोदा के गवर्नर थे. ऐसे में वे अहमद शाह के चचेरे भाई थे.
मौदूद और उनके पिता फ़िरोज़ ख़ान ने अहमद शाह के ख़िलाफ़ बग़ावत छेड़ने के लिए अमीर मुस्लिमों को अपने साथ मिलाना शुरू कर दिया.
दो हिंदू सरदारों, जीवनदास खत्री और प्रयागदास ने भी इस प्रयास में फ़िरोज़ ख़ान का समर्थन किया.

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छोटूभाई नायक अपनी किताब में बताते हैं कि मालवा के सुल्तान हुशांग शाह ने भी अहमद शाह के ख़िलाफ़ बग़ावत में फ़िरोज़ ख़ान का साथ दिया.
कुछ ज़मीनदारों को अहमद शाह के ख़िलाफ़ लड़ाई में शामिल होने के लिए तोहफ़े के रूप में कुछ घोड़े दिए.
अहमद शाह के ख़िलाफ़ खड़ी होने वाली इस सेना का नेतृत्व मौदूद कर रहे थे और उन्होंने जीवनदास को अपने वज़ीर के रूप में नियुक्त किया.
उन्होंने इस युद्ध में लड़ने के लिए एक सेना खड़ी कर ली. जीवनदास ने पाटन पर हमला करने का सुझाव भी दिया. लेकिन कुछ लोगों ने इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया. कुछ लोगों ने समझौता करने का प्रस्ताव भी रखा.
अब दोनों पक्षों में ये विवाद इतना बढ़ गया कि कुछ लोगों ने इस अभियान से किनारा करके अहमद शाह के साथ हाथ मिला लिया. इसके बाद हुए संघर्ष में जीवनदास खत्री की मौत हो गई.
ये बिखराव आने के बाद मौदूद को खंबात जाना पड़ा जहां सूरत के शेख मलिक और रेंडर उनका इंतज़ार कर रहे थे.
इसके बाद अहमद शाह उनके पीछे-पीछे गए और अहमद शाह ने जल्द ही उनको पकड़ लिया और भरूच किले पर घेरा डाल दिया.
इसके बाद सुल्तान ने मौदूद और शेख मलिक को बख़्श दिया और वापस चले गए.

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जब साबरमती नदी पर पहुंचे सुल्तान
अली मुहम्मद ख़ान ने फ़ारसी भाषा में लिखी अपनी किताब मिरात-ए-अहमदी में बताया है कि जब अहमद शाह पाटन की ओर आ रहे थे तो उन्होंने साबरमती नदी के किनारे असावल नाम के क़स्बे के नज़दीक अपना डेरा डाला. असावल नाम के इस क़स्बे के प्रमुख आशा भील थे.
छोटूभाई नायक की किताब के मुताबिक़, सुल्तान इसी जगह पर कई दिन रुके.
असावल से जुड़े कई उल्लेख बताते हैं कि सुल्तान ने यहीं पर एक शहर बसाने का फ़ैसला किया.
इसके बाद सुल्तान अपनी सेना लेकर आए जिसके बाद असावल के सरदार आशा भील को अपना क़स्बा छोड़कर भागना पड़ा.
किताब के मुताबिक़, अहमदाबाद शहर (अब आमदावाद) की नींव साल 1411 के फ़रवरी-मार्च महीने में रखी गई थी. हालांकि, इसकी ठीक-ठीक तारीख़ को लेकर कई विवाद हैं.
अहमदाबाद के नाम में चार अहमदों का रोल

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अहमद शाह ने अपने पीर हज़रत शेख़ अहमद खट्टू गंज बख़्श की सलाह पर अहमदाबाद शहर की नींव रखी.
उन्होंने इस राजधानी को बसाने को लेकर कई अमीरों और धार्मिक हस्तियों से भी सलाह मशविरा किया था.
इनमें से एक थे पीर हज़रत शेख़ खट्टू, दूसरे उनके शिष्य क़ाज़ी अहमद, तीसरे मुल्ला अहमद और चौथे ख़ुद अहमद शाह थे.
ख़ान बहादुर ने अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात' में उल्लेख किया है कि नींव पूजन के समारोह में चार अहमदों के अलावा 12 फ़क़ीरों ने भी शिरकत की थी.
किताब के मुताबिक़, सभी चारों अहमद और 12 फ़क़ीर दिल्ली के मशहूर सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे.

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अहमदाबाद क्यों बसाया गया था?
'हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात' किताब के अनुसार अहमद शाह ने चार अहमदों, जिनमें उनके गुरू भी शामिल थे, के आधार पर इस शहर का नाम अहमदाबाद रखा.
इस किताब में ये भी बताया गया है कि सुल्तान मानते थे कि अगर उनकी राजधानी गुजरात के केंद्र में होगी तो वह अपने साम्राज्य पर बेहतर ढंग से नियंत्रण कर पाएंगे.
वह इदर, चापानेर और सोराथ साम्राज्यों पर भी नियंत्रण कर सकते थे. उनके अमीरों और पीरों ने उनके इस विचार का समर्थन किया.
क्या अहमदाबाद से पहले असावल था?
जाने माने राजनीतिक विश्लेषक अच्युत याज्ञनिक और सुचिज्ञा सेठ ने अपनी किताब 'अहमदाबाद फ्रॉम रॉयल सिटी टू मेगा सिटी' में अहमदाबाद, कर्णावती और असावल का उल्लेख किया है.

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किताब के अनुसार फ़ारसी और मुग़ल काल के इतिहासकारों ने अपने दस्तावेज़ों में साबरमती नदी के पूर्वी किनारे पर असावल नामक एक जगह होने का उल्लेख किया है.
कुछ सुबूत ये भी सुझाते हैं कि असावल नदी तट के क़रीब था जो कि अब जमालपुर और अस्तोदिया दरवाज़ा है.
अरबी और फ़ारसी इतिहासकारों ने इसे असावल कहा. जबकि संस्कृत और प्राकृत साहित्य में इस जगह का नाम आशापल्ली बताया गया है.
मशहूर ईरानी इतिहासकार अल-बरूनी ने अहमदाबाद की स्थापना से पांच सौ साल पहले असावल नाम की जगह का उल्लेख किया है.
साल 1039 में जैन आचार्य जिनेश्वरसुरी ने अपनी किताब 'निर्वाणलीलावतीकथा' में अशापल्ली का ज़िक्र किया है.
इन सभी ग्रंथों में इस नाम का उल्लेख ये बताता है कि 11वीं - 12वीं शताब्दी में अशापल्ली एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था.
कर्णावती से जुड़े सुबूत

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'हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात' और 'मिरात-ए-अहमदी' में कर्णावती का ज़िक्र नहीं मिलता है.
लेकिन साल 1304-05 में जैन आचार्य मेरुतुंडाछय की किताब 'प्रबंधचिंतामणि' में पहली बार कर्णावती का उल्लेख मिलता है.
इस किताब में उल्लेख है कि पाटन के राजा कर्णदेव ने किस तरह आशापल्ली की आशा भील पर आक्रमण किया.
उन्होंने देवी भैरव से शुभ संकेत पाकर कोछराब देवी का मंदिर स्थापित किया और अपना डेरा जमाया.
इसके बाद उन्होंने आशा भील को हराकर कर्णेश्वर महादेव का मंदिर बनाया. उन्होंने कर्णा सागर भी बनवाया और अपनी राजधानी कर्णावती पुरी को बसाया.
'अहमदाबाद फ्रॉम रॉयल सिटी टू मेगा सिटी' किताब में बताया गया है कि जैन साहित्य के साथ-साथ अन्य धार्मिक साहित्य में 13वीं शताब्दी के अंत और 14वीं शताब्दी की शुरुआत के समय साबरमती नदी के किनारे कर्णावती नामक जगह का उल्लेख मिलता है.

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हालांकि, ये स्पष्ट नहीं है कि कर्णावती आशापल्ली का ही दूसरा नाम है या ये एक दूसरा सैन्य डेरा था.
एक अन्य जैन साहित्यकार जिनमनंदन और चरित्रसुंदर ने मेरुतुंडाचार्य से कहानी को लेकर बताया कि कर्णदेव ने तय किया था कि वह अपने लिए एक नया शहर बसाएंगे.
इन साहित्यकारों ने बताया है कि कर्णदेव ने अपना सिंहासन अपने बेटे सिद्धराज को दे दिया था और एक राज्य में दो राजा नहीं रह सकते. ऐसे में उन्होंने आशापल्ली को जीतने के बाद कर्णावती शहर को बसाया.
हालांकि, सिद्धराज के दौर में ऐतिहासिक काव्य लिखने वाले आचार्य हेमचंद्र ने बताया है कि सिद्धराज को सिंहासन देने के कुछ समय बाद ही कर्णदेव की मौत हो गई थी.
इस कविता में भी कर्णावती शहर का उल्लेख नहीं है. इससे नए सवाल खड़े होते हैं कि क्या आशापल्ली को ही कर्णावती के रूप में जाना जाता था. क्योंकि अगर कर्णावती नाम की एक जगह थी तो 12वीं-13वीं शताब्दी के ग्रंथों में असावल या आशापल्ली जैसे नामों का उल्लेख क्यों मिलता है.
कर्णदेव के बेटे सिद्धराज के बाद उनके बेटे कुमार पाल ने सिंहासन संभाला और कई सालों तक राज्य किया.
लेकिन उनके शासन काल में भी कर्णावती नाम का कोई ज़िक्र नहीं है. उनके राज दरबार के जैन आचार्यों ने बी कर्णावती का ज़िक्र क्यों नहीं किया.

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13वीं शताब्दी के बाद जैन और दूसरे धार्मिक ग्रंथों में कर्णावती का नाम आना शुरू हुआ.
'अहमदाबाद फ्रॉम रॉयल सिटी टू मेगा सिटी' किताब में बताया गया है कि अहमद शाह के अहमदाबाद शहर बसाने के बाद 150 सालों तक असावल नाम की जगह का उल्लेख होता रहा.
ये कहा जा सकता है कि शायद कर्णदेव ने आशापल्ली में एक सैन्य डेरा जमाया जो कि आगे चलकर उनका निवास स्थान बन गया.
शायद इसके बाद दोनों जगहें आपस में मिल गईं.
हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात किताब में बताया गया है कि सुल्तान अहमद शाह ने साबरमती नदी के किनारे पर असावल के पास अपने शहर को बसाया था.
सुल्तान ने 53 फुट ऊंचा मनेक बुर्ज बनवाया जो कि अभी भी विवेकानंद पुल के पूर्वी छोर पर स्थित है. यही वो जगह थी जहां पर इस शहर की नींव डाली गई थी.
मिरात-ए-अहमदी किताब में इस बात का उल्लेख है कि भद्र किले की संरचना पाटन किले जैसी थी.

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कई सदियों तक पाटन (अनहिलवाद) गुजरात की राजधानी थी और शुरुआती मुस्लिम राजाओं की राजधानी भी थी.
भद्र किला की संरचना की बात करें तो ये 43 एकड़ में फैला एक चौकोर किला है.
अहमदाबाद एक दीवालों से घिरा हुआ शहर था लेकिन अब तक ये पता नहीं चला है कि ये दीवारें कब बनाई गईं.
फ़िरिश्ता में दिए गए वर्णन के मुताबिक़, ये दीवारें मोहम्मद बेगादा के दौर में ये दीवारें बनाई गई थीं.
मिरात-ए-अहमदी में भी बताया गया है कि किले में एक पट्टिका भी लगी थी जिसमें लिखा था - 'अब इस किले के अंदर रहने वाले सभी सुरक्षित हैं'.
इस पट्टिका में तारीख़ हिजरी वर्ष 892 लिखा है जो बताता है कि ये दीवारें साल 1487 में बनाई गई होंगी.
कुछ उल्लेख ऐसे भी हैं जो कि ये बताते हैं कि इस किले का निर्माण 1413 में हो गया था. लेकिन मिरात-ए-अहमदी के मुताबिक़ ये वर्ष 1418 है.
हिस्ट्री ऑफ़ गुजरात के मुताबिक़, शुरुआत में अहमदाबाद में बहुत कम लोग रहते थे.

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इसके बाद यहां पर लोगों की आबादी बढ़ने लगी. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि किले का निर्माण 1413 में हुआ होगा लेकिन दीवारें 1487 में बनाई गई हों.
अहमदाबाद के 12 दरवाज़े
मिरात-ए-अहमदी के मुताबिक़, किले की दीवार में 12 मुख्य दरवाज़े, 189 मीनारें और छह हज़ार खिड़कियां थीं.
किले को चूने और ईंटों से बनाया गया था और इसे दिल्ली और शाहजहांबाद के किलों सा मज़बूत माना जाता था.
मिरात-ए-अहमदी के मुताबिक़, इन 12 दरवाज़ों में से तीन उत्तर में शाहपुर दरवाज़ा, इदरिया या दिल्ली दरवाज़ा और दरियापुर दरवाज़ा थे.
वहीं, दक्षिण में अस्तोदिया और जमालपुर दरवाज़े थे जबकि एक बंद दरवाज़े को डेढ़िया दरवाज़ा कहा जाता था. पश्चिमी दिशा में साबरमती के तट पर ख़ानजहां दरवाज़ा, रेखंड दरवाज़ा और ख़ानपुर दरवाज़ा था. पूर्व में बने तीन गेटों को कुलापुर, सारंगपुर और रायपुर दरवाज़ा कहा जाता था.
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