गुजरात: मुख्यमंत्री से पुरस्कृत बच्चा क्यों बना मज़दूर

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- Author, पार्थ पंड्या
- पदनाम, बीबीसी गुजराती
"जब मैं खेतों में मज़दूरी का काम कर रहा था तब मुझे पता चला कि मेरी बनाई हुई पेंटिंग एक किताब के कवर पेज पर छपी है."
ये कहना है 12 साल के कांति राठवा का. वे गुजरात के छोटा उदयपुर के कछेल गांव से हैं, जो अहमदाबाद से क़रीब 200 किलोमीटर दूर है.
तीन साल पहले स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ी एक पेंटिंग की प्रतियोगिता में वह अव्वल आए थे और प्रदेश की उस वक़्त की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने उन्हें सम्मानित किया था.
लेकिन मुख्यमंत्री से सम्मानित होने के बाद कांति के लिए हालात सुधरे नहीं, बल्कि बदतर हो गए. हाथों में पेंटिंग ब्रश की जगह कुल्हाड़ी आ गई.
उनकी पुरस्कृत पेंटिंग एनसीईआरटी की एक किताब का मुखपृष्ठ बनी, लेकिन वह ख़ुद पढ़ाई से वंचित होकर मज़दूर हो गए.
जब मुख्यमंत्री से मिला सम्मान

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2015 में कांति तीसरी कक्षा में थे, जब उन्हें उनकी पेंटिंग के लिए मुख्यमंत्री ने पुरस्कृत किया था.
इस प्रतियोगिता में उन्होंने ज़मीन साफ़ करते महात्मा गांधी की तस्वीर बनाई थी और पहले पुरस्कार के तौर पर उन्हें दो हज़ार रुपए भी मिले थे.
स्वच्छ भारत अभियान केंद्र सरकार की योजना है जिसका मक़सद देश भर में साफ-सफाई को बढ़ावा देना है.

स्कूल से खेतों तक का सफ़र

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कांति जिस परिवार से हैं, मज़दूरी ही उसका मुख्य पेशा है. उनके मां-पिता इन दिनों अहमदाबाद से 130 किलोमीटर दूर सुरेंद्रनगर में मज़दूरी करते हैं.
पुरस्कार जीतने के दो साल तक वे स्कूल जाते रहे. वे बताते हैं, "मेरे दो छोटे भाई और दो बहनें हैं. वे भी मेरे मां-पिता के साथ काम करते हैं. मैं यहां पढ़ाई कैसे कर सकता था जब मेरे भाई-बहन वहां काम कर रहे थे? घर की हालत ऐसी थी कि मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा और अपने परिवार के पास जाना पड़ा."
'पेंटिंग किताब में छपी है, नहीं पता था'

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हाल ही में एनसीईआरटी ने दो नई किताबें छापीं. कांति की पेंटिंग को तीसरी कक्षा की एक किताब के मुखपृष्ठ पर छापा गया.
लेकिन जब यह किताब छपी, कांति स्कूल छोड़कर सुरेंद्रनगर में अपने मां-पिता के साथ मज़दूरी कर रहे थे.
कांति ने बीबीसी गुजराती से कहा, "मुझे नहीं पता था कि मेरी बनाई पेंटिंग किताब में छपी है. जब मेरी दादी के देहांत पर मैं छोटा उदयपुर आया तो मेरे शिक्षक ने मुझे यह ख़बर दी."
छोटा उदयपुर के इस स्कूल में शिक्षक विनोद राठवा बताते हैं, "कांति के चाचा ने मुझे बताया था कि उनके साथ क्या हुआ है. मुझे हैरानी हुई कि उनकी पेंटिंग किताब में छपी है और उन्हें पता ही नहीं है. और जिन लोगों ने उन्हें पुरस्कार दिया था, वही उनकी कमज़ोर आर्थिक स्थिति से वाक़िफ तक नहीं थे."

मदद के हाथ
जब कांति के गांव वालों को उनकी स्थिति के बारे में पता लगा तो वह उनकी मदद के बारे में सोचने लगे. विनोद राठवा बताते हैं, "कांति को दोबारा पढ़ाई करने के लिए सरकार से किसी तरह की मदद नहीं मिली."
लेकिन मदद के लिए कुछ और लोग आगे आए.
जब गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) पीसी ठाकुर को इस बारे में पता चला तो उन्होंने पहल की.

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पीसी ठाकुर ने बीबीसी को बताया, "मैं कांति के परिवार से मिलने गया. मैंने दूसरे लोगों से भी मुलाक़ात की और कांति के लिए मदद जुटाने की कोशिश की."
अब विनोद राठवा कांति को गोद ले चुके हैं, ताकि वह अपनी पढ़ाई जारी रख सके. विनोद राठवा और पीसी ठाकुर की मदद से कांति फिर से स्कूल जा रहे हैं. वह अब छोटा उदयपुर के पास 'एकलव्य स्कूल' में पढ़ते हैं.

पेंटर बनने का सपना

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कांति कला के क्षेत्र में ही अपना करियर बनाना चाहते हैं. उनके पिता जेंदु राठवा ने बीबीसी से कहा, "हम ख़ुश हैं कि कांति स्कूल जा रहा है, लेकिन दुख की बात है कि हम अपने बाक़ी बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते."
कांति की पेंटिंग ही उनके लिए स्कूल की पढ़ाई दोबारा शुरू करने की वजह बनी. गुजरात के शिक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2013-13 में प्रदेश में बच्चों के पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर 6.91 फीसदी थी.
विनोद राठवा कहते हैं, "कांति भविष्य में पेंटर या कलाकार बन सकता है. लेकिन अगर हम बच्चों को पढ़ाई छोड़ने से नहीं रोक सके तो हम भविष्य के कई कलाकार खो देंगे."
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