गुजरात: 'पेशाब जाने से रोकते हैं इसलिए पानी नहीं पीती'

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    • Author, पार्थ पंड्या
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती

केरल में हाल ही में महिलाओं के एक संगठन ने राज्य के श्रमिकों के लिए 'बैठने का अधिकार' हासिल करने में कामयाबी पाई है.

केरल में वस्त्र, आभूषण और अन्य व्यावसायिक रीटेल स्टोरों या दुकानों में काम करने वाली महिलाओं का आरोप था कि मालिक उन्हें अन्य सहकर्मियों से बात करने या काफ़ी देर तक खड़े रहने के बाद दीवार का सहारा लेने तक से रोक देते हैं.

उनका कहना है कि अगर वे ऐसा न करें तो अक्सर उनका वेतन काट दिया जाता है.

ये नियम इतने ज़्यादा चलन में हैं कि व्यावसायिक रीटेल स्टोरों में काम कर रही महिलाओं को 'बैठने के अधिकार' के लिए संघर्ष करना पड़ा और उनकी जीत भी हुई.

चार जुलाई को केरल सरकार ने कहा कि वह संबंधित श्रम क़ानूनों में बदलाव लाएगी ताकि कामगारों को बैठने का अधिकार मिले.

औद्योगिक रूप से सबसे विकसित राज्यों में से एक गुजरात में भी महिला श्रमिकों के लिए हालात कुछ बेहतर नज़र नहीं आते.

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शौचालयों के दरवाज़ों पर ताला

दक्षिण गुजरात वस्त्र कामगार संघ के महासचिव राममुक्त मौर्य ने बीबीसी को बताया, "वस्त्र उद्योगों में शौचालय तो हैं मगर उन पर ताला लगा रहता है. हर चार-पांच घंटों में सुपरवाइज़र टॉयलट के दरवाज़े का ताला कुछ मिनटों के लिए खोलता है और दोबारा बंद कर देता है." राममुक्त ख़ुद भी सूरत के वस्त्र उद्योग में कामगार हैं.

गुजरात छोटे और बड़े पैमाने के उद्योगों का केंद्र है. बीबीसी ने यह पता लगाने की कोशिश की कि इन उद्योगों में काम करने वाली महिलाओं को किन हालात का सामना करना पड़ता है.

राममुक्त मौर्य दावा करते हैं कि कढ़ाई के ज़्यादातर उद्योगों में मज़दूरों के लिए टॉयलेट ही नहीं हैं. महिला मज़दूरों को झाड़ियों, खंडहरों या फिर खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है.

सूरत में वस्त्र उद्योग में काम कर रही एक महिला ने बीबीसी को गोपनीयता की शर्त पर बताया, "काम वाली जगह पर शौचालय तो हैं मगर उन पर ताला लगा रहता है. उन्हें दिन में दो बार खोला जाता है. वो हमें पेशाब जाने से रोकते हैं. यही कारण है कि हम पानी नहीं पीतीं और पेशाब आए तो भी उसे रोकना पड़ता है."

यह महिला श्रमिक बताती हैं, "माहवारी आने पर कुछ महिलाएं तो काम पर ही नहीं आतीं. मगर जब हम छुट्टी लेते हैं तो वे हमारा वेतन काटते हैं और कई बार तो नौकरी से भी निकाल देते हैं."

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"हमारा बॉस सोचता है कि हम बहाना बनाते हैं और बाथरूम में समय बर्बाद करते हैं. वह कहता है कि अगर हम इस तरह से समय बर्बाद करेंगे तो काम कब पूरा होगा."

बैठने तक की इजाज़त नहीं

प्रोफ़ेसर इंदिरा हिरवे सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट ऑल्टरनेटिव्स में काम करती हैं. वह इस बात से सहमत हैं कि गुजरात में काम कर रही महिलाएं बुरी हालत में हैं.

वो बताती हैं, "कपड़ा उद्योग में काम करने वाली महिलाओं को खड़े रहकर काम करने के लिए मज़बूर किया जाता है. उन्हें बैठने की इजाज़त नहीं है. श्रमिक क़ानून को लागू करने में गुजरात बहुत पीछे है."

प्रोफ़ेसर हिरवे बताती हैं कि दुकानों, शोरूमों और फैक्ट्रियों में शौचालय ऐसी हालत में हैं कि उनमें बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं.

कई जगहों पर तो पुरुषों और महिलाओं के लिए एक ही टॉयलेट है. कई बार महिलाओं के पास खुले में शौच जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता.

केरल में महिलाओं ने संघर्ष करके जीत हासिल की

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महिलाओं से भेदभाव

लक्ष्मी वडोदरा में एक कारखाने में 10 घंटों की शिफ़्ट में काम करती हैं. वो बताती हैं, "पुरुषों और महिलाओं से अलग-अलग व्यवहार किया जाता है. हमें सिर्फ़ 150 रुपए दिए जाते हैं मगर हमारे साथ काम करने वाले पुरुषों को उसी काम के 300 रुपए दिए जाते हैं. महिलाओं के लिए अलग शौचालय भी नहीं है. हमें पुरुषों वाला ही शौचालय इस्तेमाल करना पड़ता है."

वो बताती हैं, "हमें मातृत्व अवकाश भी नहीं मिलता. हमें रविवार को छुट्टी मिलती है मगर उसके लिए भी वो हमारा वेतन काट लेते हैं." फ़ैक्ट्री मालिकों से संपर्क साधा तो उन्होंने इस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया.

जगदीश पटेल पीपल्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च सेंटर के साथ जुड़े हुए हैं. उन्होंने 'स्टडी ऑफ लेबर कंडीशंस इन सूरत टेक्सटाइल इंडस्ट्री (सूरत के वस्त्र उद्योग में श्रमिकों की स्थिति का अध्ययन)' नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़-

  • 34 फ़ीसदी महिलाओं को पेशाब जाने और शौचलय की सुविधा नहीं मिलती
  • सिर्फ 2.5 महिलाओं को रेस्टरूम की सुविधा मिली हुई है
  • 80 फ़ीसदी महिलाओं को पहचान पत्र नहीं दिया जाता
  • महिलाओं को 8 घंटों से ज़्यादा समय तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है

ये रिपोर्ट बताती है कि मज़दूर, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, बिना किसी के ब्रेक के 12 घंटों तक काम करते हैं.

कई मामलों में अगर शिफ़्ट बदलने वाला सहकर्मी नहीं आता तो पिछली शिफ़्ट वाले श्रमिक को ही 12 घंटों से ज़्यादा काम करना पड़ता है.

नहीं मिलता मातृत्व अवकाश

रिपोर्ट कहती है कि 17 प्रतिशत महिलाओं को ही मातृत्व अवकाश मिला मगर उसके बदले में पैसे नहीं मिले.

सूरत में एक अन्य महिला श्रमिक ने बीबीसी को बताया कि अगर महिलाएं मैटरनिटी लीव लेती हैं तो उन्हें अपना विकल्प देकर जाना होता है और इस दौरान उन्हें छुट्टियों के पैसे नहीं मिलते.

शिशु

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हिंदुस्तान मज़दूर संघ के महासचिव पी.के. वलांज मानते हैं कि महिला कामगारों को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

वह कहते है कि कई जगहों पर महिला मज़दूरों का पंजीकरण नहीं होता और उन्हें मातृत्व अवकाश भी नहीं मिलता. कुछ उद्योगों में महिलाओं को गर्भवती होते ही नौकरी से निकाल दिया जाता है.

दीपाली घेलानी शिक्षाविद हैं और महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाला एक ग़ैर-सरकारी संगठन भी चलाती हैं.

वो बताती हैं, "जब हम कंपनियों या फ़ैक्ट्रियों से पूछते हैं कि महिलाओं के लिए शौचालय या रेस्टरूम क्यों नहीं है तो वे कहते हैं कि कभी किसी महिला कर्मचारी ने उनसे इस बारे में शिकायत नहीं की."

घेलानी कहती हैं, "अगर महिलाओं को यह शिकायत करनी पड़े कि उनसे कार्यस्थल पर टॉयलेट या रेस्टरूम नहीं है तो यह बहुत ख़राब स्थिति है. इससे पता चलता है कि हमारा सामाजिक ढांचा कितना ख़ुदगर्ज़ी भरा है."

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