गुजरात: हार्दिक पटेल का आमरण अनशन इसलिए 'फ्लॉप' रहा

हार्दिक पटेल

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    • Author, उर्विश कोठारी
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए

अपनी मांगों को लेकर आमरण अनशन पर बैठे पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने 19वें दिन अपना अनशन समाप्त कर दिया. गुजरात में हुए अंतिम विधानसभा चुनावों में बीजेपी को इन तीन युवा नेताओं ने ख़ासा परेशान किया था- अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल.

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहे थे हार्दिक 'पटेल' और उनका असर. इसकी वजह ये भी थी कि हार्दिक के समर्थक जिन्हें अब 'पाटीदार' के नाम से जाना जाता है, वे बीजेपी के भी मुख्य समर्थन माने-जाते रहे हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान हार्दिक की सार्वजनिक सभाओं में लोगों ने जिस तरह बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उससे बीजेपी सकते में आ गई थी.

हालांकि, बीजेपी ने अप्रत्याशित तरीक़े से दक्षिणी गुजरात में काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया और छठी बार राज्य में सरकार बनाने में कामयाब रही. उसके लिए ये जीत इतनी आसान नहीं थी लेकिन बीजेपी की इस जीत से हार्दिक पटेल और उनके नेतृत्व पर भी सवाल उठ गया.

सवाल ये कि जो पाटीदार समुदाय अब तक हार्दिक पटेल के पीछे मज़बूती से खड़ा था, रैलियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा था क्या वो अब भी उनका साथ देगा या नहीं? इस बात को लेकर बहुत संदेह था.

संदेह की बयार अभी थमी भी नहीं थी कि इसी बीच हार्दिक ने एक और आंदोलन की तैयारी कर ली. इस बार वो आमरण अनशन पर बैठ गए.

पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग के साथ-साथ उनकी दो मांगें और थीं. किसानों के लिए कर्ज़ माफ़ी और आंदोलन में शामिल उन सहयोगियों की रिहाई जो पुलिस हिरासत में थे. हार्दिक के लिए ये एक और बहुत बड़ा मौक़ा था जब वो अपने नेतृत्व क्षमता को साबित कर सकते थे. साथ ही यह भी कि उनका समुदाय अब भी उनके साथ खड़ा है.

हार्दिक पटेल

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लेकिन हार्दिक का अनुमान उल्टा पड़ गया

बीजेपी और हार्दिक पहली बार विधानसभा चुनावों में एक-दूसरे के सामने खड़े नज़र आए और फ़ैसला बीजेपी के हक़ में आया. ऐसे में ये दूसरा मौक़ा हार्दिक के लिए काफ़ी चुनौती भरा था.

हार्दिक ने अनशन की घोषणा नहीं की बल्कि उन्होंने सीधे आमरण अनशन पर बैठने का ऐलान कर दिया. आमरण अनशन की घोषणा के साथ ही ये लड़ाई और अधिक महत्वपूर्ण हो गई और सीधे आर-पार की लड़ाई बन गई.

ऐसी उम्मीद की गई कि पाटीदार समुदाय उन्हें खुले दिल से समर्थन देगा. हालांकि, हार्दिक की मांगों में किसानों के लिए कर्ज़ माफ़ी भी शामिल थी लेकिन किसानों के उनके समर्थन में आने की ज़्यादा आस-उम्मीद नहीं थी.

इसकी वजह यह है कि हार्दिक के समर्थन का मुख्य आधार किसान नहीं बल्कि वो पाटीदार समुदाय है, जिससे वे ख़ुद ताल्लुक़ रखते हैं. उनके समर्थक और विरोधी, पाटीदार और ग़ैर-पाटीदार सभी जानते हैं कि उनकी पहुंच सीमित है और वह सिर्फ़ अपनी जाति के लोगों तक ही है.

हालांकि, सरकार ने हार्दिक के पहले के आंदोलनों से सबक ले लिया था और वो किसी भी तरह का कोई चांस नहीं लेना चाहती थी. इसलिए किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए उसने पहले से ही भारी पुलिस बंदोबस्त कर रखा था.

इसके बाद जैसा की उम्मीद थी हार्दिक पटेल के कैंप की ओर से पुलिस पर उत्पीड़न का आरोप लगाया गया. कुछ जगहों पर लोग उनके साथ आए और कुछ ने तो अनशन भी किया. लेकिन आमरण अनशन को लेकर बनी शुरुआती हवा धीरे-धीरे मंद होती गई और एक वक़्त के बाद ये समझ आने लगा कि इस आमरण अनशन से कुछ हासिल करना मुश्किल होगा.

इसके साथ ही एक बार फिर उनका नेतृत्व सवालों के घेरे में आ गया. हार्दिक के लिए ख़ुद को साबित करने का ये दूसरा मौका भी पहले जितना ही मुश्किल रहा.

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क्या बीजेपी के असंतुष्ट नेता हार्दिक का साथ दे रहे हैं?

अनशन के शुरुआती दिनों में बिना खाना खाए रहना, अपनी शारीरिक क्षमता का परिचय देना, शायद हार्दिक के लिए थोड़ा आसान था.

कुछ दिनों बाद उनका वज़न कम होने लगा और आंदोलन के दौरान एक मौक़ा ऐसी भी आया जब उन्होंने पानी भी पीने से इनकार कर दिया.

इसी बीच कुछ राजनीतिज्ञों का समूह और नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर निशाना साधने के इरादे से हार्दिक से मिले. इस क्रम में अपनी पार्टी से असंतुष्ट चल रहे बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा भी उनसे मिलने के लिए पहुंचे. विपक्ष के नेताओं के लिए ये एक मौक़ा था जब उन्होंने इस आंदोलन के माध्यम से ख़ुद को बीजेपी विरोधी दिखाया.

हालांकि, नेताओं का ये समर्थन हार्दिक के लिए नहीं था बल्कि ख़ुद को एंटी-मोदी बताने के लिए था. जिसका एक उदाहरण तो यही है कि जानी-मानी समाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर, जोकि विवादों में पड़ने से बिल्कुल नहीं डरती हैं, वो भी इस मंच पर हार्दिक से मिलने पहुंची.

हालांकि, मेधा पाटेकर गुजरात में एक बहुत जाना-माना और विवादित नाम है. गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के समय से उन्हें गुजरात विरोधी के तौर पर जाना जाता है. ऐसे में पाटीदार आंदोलन समिति ने उनसे समर्थन नहीं लेने का फ़ैसला किया और उन्हें फ़टाफ़ट वहां से जाने के लिए कह दिया गया.

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या मेधा पाटकर पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग का समर्थन कर सकती हैं? या शायद उन्होंने ख़ुद को सिर्फ़ सरकार विरोधी और एंटी-मोदी दिखाने के लिए इस बात को ही अनदेखा कर दिया कि हार्दिक पटेल का ये अनशन आरक्षण की मांग को लेकर है.

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क्या इससे हार्दिक पटेल की टीम कमज़ोर साबित हुई?

हार्दिक ने ये अनशन मुख्य रूप से तीन मांगों को लेकर किया था, जिनमें से एक किसानों की कर्ज़माफ़ी की मांग थी. किसानों के लिए की जाने वाली इस मांग को ख़ूब ज़ोर-शोर से प्रचारित किया गया और अनशन में आने वाले पदाधिकारियों को ये समझाने की कोशिश की गई कि ये मांग गुजरात के किसानों के लिए कितनी ज़रूरी है.

हालांकि, हार्दिक और उनके सहयोगी किसानों की कर्ज़माफी की मांग तो कर रहे थे लेकिन ऐसा महसूस किया जा सकता था कि उन्हें अपनी इस मांग की ख़ुद ही पूरी जानकारी नहीं थी.

यह भी कहा जा सकता है कि हार्दिक और उनके सहयोगियों ने राज्य में किसानों के कर्ज़ को लेकर किसी तरह की रिसर्च नहीं की थी. मसलन, अनशन करने वालों के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि कितने किसानों को कर्ज़ माफ़ी की आवश्यकता है, कर्ज़ की राशि कितनी है और इसके लिए कुल कितनी राशि की आवश्यकता है.

किसानों के लिए की जाने वाली ये मांग सिर्फ़ और सिर्फ़ इस अनशन को चमक देने के लिए थी. जबकि अनशन का मुख्य उद्देश्य एक समुदाय विशेष के लिए आरक्षण की मांग थी.

बावजूद इसके हार्दिक की टीम ने कभी किसानों से जुड़े इस मुद्दे को लोगों तक पहुंचाने-समझाने की कोशिश नहीं की. हार्दिक का मंच पर होना अनिवार्य था लेकिन उनकी टीम राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जाकर ये कर सकती थी.

वैसे इस संदर्भ में ये पूछना भी बनता है कि पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के कितने कार्यकर्ताओं को ये पता है कि किसानों के लिए कर्ज़ माफ़ी की मांग का महत्व क्या है.

इसी बीच अनशन के 12वें दिन हार्दिक की तबियत बिगड़ गई और उन्हें आनन-फ़ानन में अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा. इमरजेंसी में अपना इलाज कराकर जब हार्दिक दोबारा अनशन के लिए लौटे तो कुछ भी शेष नहीं था.

आख़िरकार इस बिना किसी दिशा और मक़सद वाले आंदोलन को समाप्त करने का फ़ैसला पाटीदार समुदाय के धार्मिक और सामाजिक संस्थानों के बुद्धिजीवियों पर छोड़ दिया गया. धार्मिक संगठन खोडाधाम और उयाधाम के नेताओं और दूसरे समूहों के नेताओं ने अनशन के 19वें दिन हार्दिक पटेल को पानी पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया.

आमतौर पर आमरण अनशन सरकारों के लिए मुसीबत खड़ी कर देते हैं और ज़्यादातर मामलों में सरकार के मंत्री या नेता खुद आकर अनशन ख़त्म करवातें हैं लेकिन हार्दिक के अनशन में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

हार्दिक पटेल

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हार्दिक पटेल का असफल अनशन

अनशन भले ही शारीरिक क्षमताओं का परीक्षण मालूम पड़ता हो लेकिन सच्चाई ये है कि यह पूरी तरह से दिमाग़ी ताक़त पर निर्भर करता है.

बहुत से मामलों में अनशन करने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य हर रोज़ गिरता जाता है लेकिन वो फिर भी डटा रहता है जिसके बाद सरकार हरकत में आ जाती हैं. या तो वो उस व्यक्ति को हिरासत में लेकर जबरन खिलाने-पिलाने की कोशिश करती है या दूसरे तरीक़ों से अनशन तुड़वाने का प्रयास करती है, ईरोम शर्मिला का उदारण इसमें सबसे अहम है. ऐसे मामलों में मांगें भले ही पूरी न हों लेकिन अनशन करने वाले की नैतिक जीत तो होती ही है.

जब हार्दिक पटेल ने अपना आमरण अनशन शुरू किया, गुजरात में बीजेपी की सरकार की हरकतों से लगा कि वो कुछ हद तक झुक रही है लेकिन बाद में हार्दिक अपने लिए समर्थन जुटाने में नाकमयाब रहे और इसके चलते वो सरकार पर भी दबाव नहीं बना पाए.

'समुदाय को आपकी ज़रूरत है' और 'अगर बच गए तो लड़ेंगे और अगर लड़ेंगे तो जीतेंगे'... इस तरह के कुछ बैनर हार्दिक के सामने रखे गए थे ताकि वो अपना अनशन तोड़ दें लेकिन ये सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुद को समझाने का तरीक़ा था. ये सारी बातें उस शख़्स के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं लगतीं जिसने मुद्दों के लिए जान देने का दावा किया हो.

कुछ दिन पहले ही हार्दिक पटेल ने अपनी ज़ायदाद के पेपर भी बनवाए थे और उसकी घोषणा की थी. लेकिन अचानक से उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया. इससे वो मज़बूत तो बिल्कुल नहीं हुए. हालांकि, सरकार को भी पूर्ण विजेता नहीं माना जा सकता लेकिन इतना ज़रूर है कि ये कहीं न कहीं हार्दिक की नैतिक हार है.

बीजेपी से दूसरा मुक़ाबला भी हारने के बाद, उनके लिए तीसरे मुक़ाबले के लिए खड़े होना और उसे जीत पाना, पहले से कहीं अधिक मुश्किल होगा.

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