छत्तीसगढ़ चुनाव: दंतेवाड़ा के लिए कांग्रेस-बीजेपी ने ऐसे बिछाई बिसात

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दंतेवाड़ा से

एक दौर था जब कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा बस्तर में काफ़ी ताक़तवर थे.

2013 में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के साथ महेंद्र कर्मा भी माओवादियों के हमले में मारे गए थे. उसके बाद से बस्तर में कांग्रेस का कर्मा की तरह कोई ताक़तवर नेता नहीं हुआ.

महेंद्र कर्मा ने अपनी राजनीति की शुरुआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से की थे. बाद में वो कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने बस्तर में माओवादियों के ख़िलाफ़ कई आंदोलन शुरू किए थे.

इनमे सबसे बड़ा आन्दोलन था 'सलवा जुड़ूम'. सलवा जुड़ूम भी अपने आप में काफ़ी विवादित रहा था. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सलवा जुड़ूम को बंद किया गया था.

कर्मा परिवार की चुनौती

महेंद्र कर्मा की मौत के बाद उनके परिवार के सामने बड़ी चुनौती कड़ी हो गयी. चुनौती थी अस्तित्व की.

वर्ष 2013 में हुए विधानसभा के चुनावों में उनके प्रति सुहानुभूति की लहर में उनकी पत्नी देवती करमा विजयी हुईं.

सीधे रसोई से चुनावी समर में कूदना उनके लिए एक अलग अनुभव था जिसके लिए वो तैयार नहीं थी.

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इसका कारण ये था कि उन्हें राजनीतिक रूप से अपरिपक्व माना जाता रहा.

महेंद्र कर्मा के दो पुत्र भी राजनीति में अपनी किस्मत आजमाते रहे. मगर राजनीतिक तौर से उनमे अनुभव की कमी दिखती रही, इसी लिए देवती ने राजनीति में अपना सफ़र जारी रखा.

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मेदवार भीमा मंडावी को हराकर ये सीट जीत तो ली. मगर उनके सामने हमेशा चुनौती रही कि राज्य में उनकी सरकार नहीं थी.

वो इसी बात को अपनी ढाल बनाकर इस बार चुनाव में वोट मांगने निकली हैं.

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महेंद्र करमा के नाम पर वोट?

दंतेवाड़ा में चुनावी अभियान के शुरू होने से पहले ही नक्सली हमले में दो पुलिसकर्मी और एक पत्रकार मारे गए.

ये भी उस इलाके में जहां पर माओवादी हमेशा चुनाव के बहिष्कार का आह्वान करते रहे हैं.

दंतेवाडा से 30 किलोमीटर दूर है कटेकल्याण जिसे नक्सलियों का गढ़ माना जाता रहा है.

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इस इलाके में भी कई मतदान केंद्र ऐसे हैं जहां एक भी मत नहीं डाला जाता रहा है.

यहाँ चुनाव का प्रचार करना आसान नहीं है. ये सिर्फ संगीनों के साए में ही संभव है.

मगर दंतेवाडा से कटेकल्याण की सड़क के आस पास ही चुनाव का प्रचार संभव है क्योंकि अंदरूनी इलाकों में जाने के लिए सड़क भी नहीं है और प्रत्याशियों को इन इलाकों में जाने की अनुमति भी नहीं है.

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विपक्षी पार्टी पर हमला

फिर भी ज़ोरदार पुलिस बंदोबस्त के बीच वो मतदाताओं तक पहुँचने की कोशिश करती हैं.

कटेकल्याण के पास ही प्रचार के दौरान उनसे मेरी मुलाक़ात होती है. वो लोगों को बताती हैं कि राज्य सरकार उनके चुनावी क्षेत्र की उपेक्षा करने ही हर संभव कोशिश करती रही है.

इसी दौरान बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं कि उनके इलाके की उपेक्षा सिर्फ़ राजनीतिक कारणों से की जाती रही है.

मगर इसके बावजूद उनका दावा था कि उन्होंने अपने चुनावी क्षेत्र के लिए काफ़ी कुछ किया है.

वो कहती हैं, "नक्सलियों के निशाने पर हमारा पूरा परिवार है. महेंद्र करमा जी ने सलवा जुडूम शुरू किया था. सुदूर ग्रामीण अंचलों से आदिवासी माओवादियों की ज्यादती से तंग आकर अपने गाँव छोड़ने को मजबूर हो गए. फिर इन्हीं ग्रामीण आदिवासियों ने माओवादियों से लोहा भी लिया. हथियारबंद आन्दोलन शुरू हुआ. सलवा जुडूम शुरू हुआ."

आदिवासी

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देवती कहती हैं कि आज वो सारे लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं जिन्होंने उम्मीद की थी कि एक दिन माओवादी बस्तर से ख़त्म हो जायेंगे.

उनका कहना था, "सलवा जुडूम के साथ जुड़े लोग कहीं के नहीं रह गए हैं. सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वो उनकी देखभाल करेगी. इन लोगों को कैम्पों में रखा गया था जहाँ उन्हें सुरक्षा और खाने पीने की सहायता दी जाती थी. मगर कर्मा जी के मारे जाने के बाद सबकुछ बंद हो गया. अब ये लोग न अपने गाँव वापस जा सकते हैं और ना ही यहाँ उनकी जीविका का कोई साधन है."

मां को बेटी का सहारा

हालांकि, वो इस बार अपनी जीत के लिए आश्वस्त हैं. लेकिन मुझसे जितनी भी बात उन्होंने की वो सबकुछ वैसा ही कह रहीं थी जैसा उनकी बेटी तुलिका उन्हें कहने को बोल रही थीं.

तुलिका कहती हैं कि उनके पिता ने कभी उन्हें अपने बेटी नहीं बल्कि बेटा ही समझा. "वो यहाँ तक कहते थे कि तुलिका ही मेरी उत्तराधिकारी होगी."

हालांकि, जानकार कहते हैं कि तुलिका राजनीतिक तौर पर अपने दोनों भाइयों से ज़्यादा परिपक्व हैं.

करमा परिवार में नौबत तो यहाँ तक आ पहुंची थी कि महेंद्र करमा के एक पुत्र छविन्द्र कर्मा ने तो कांग्रेस से अपनी माँ की जगह चुनाव लड़ने के लिए टिकट की भी मांग कर डाली थी.

जब कांग्रेस हाई कमान ने मांग नहीं मानी तो उन्होंने अपनी माँ के खिलाफ ही बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ने का मन बना लिया था.

बाद में काफ़ी मान मनव्वल के बाद वो पीछे हटे.

तुलिका इसे मामूली बात बताती हैं. वो कहती हैं कि कुछ ग़लतफ़हमी की वजह से ये सबकुछ हो गया था और अब सबकुछ ठीक है.

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दंतेवाड़ा का संघर्ष चुनौतीपूर्ण

वहीं दंतेवाड़ा की सीट से विधायक रह चुके भारतीय जनता पार्टी के नेता भीमा मंडावी कहते हैं कि पिछले पांच सालों में दंतेवाड़ा में कोई भी विकास का काम नहीं हुआ.

वो कहते हैं कि महेंद्र करमा बड़े नेता थे, मगर उनके उत्तराधिकारियों में वो लोहा नहीं है.

मंडावी भी करमा परिवार के रिश्तेदार ही हैं. उनपर भी आरोप लगे कि उन्होंने अपने कार्यकाल में अपने चुनावी क्षेत्र के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया.

लेकिन वो इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के बावजूद दंतेवाड़ा में सड़कों का निर्माण हुआ और बिजली की व्यवस्था की गयी.

मगर देवती कर्मा कहती हैं कि आज भी दंतेवाड़ा के सुदूर इलाकों में बिजली नहीं पहुँच पायी है और उन्होंने इस बात को लेकर कई बार राज्य सरकार पर दबाव डाला है.

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दंतेवाड़ा में बिसात बिछ चुकी है और यहाँ करमा और मंडावी के अलावा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी और आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी भी मैदान में हैं.

लेकिन मुक़ाबला मुख्य तौर पर पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच ही नज़र आ रहा है.

हालांकि इस बार पनघट की डगर न तो करमा के लिए आसान है और ना ही मंडावी के लिए.

मंडावी और कर्मा दोनों ही 'एंटी-इनकम्बेंसी' से जूझ रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने भी इस सीट के लिए पूरी ताक़त लगा दी है जबकी कांग्रेस के बड़े नेता भी दंतेवाड़ा को जीतने के लिए कमर कस चुके हैं.

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