छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावः राज परिवारों का सत्ता पर कितना दखल

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इमेज कैप्शन, सरगुजा स्टेट के महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए

अभी पखवाड़े भर पहले छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक 'राज दरबार' सजा था. दरबार में हज़ारों की संख्या में एक-एक कर लोग आ रहे थे और भेंट देकर जा रहे थे.

इस राज सिंहासन पर बैठे थे छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव.

असल में सिंहदेव उस राज परिवार के मुखिया हैं जिसका साम्राज्य सरगुजा के इलाके में फैला हुआ था.

देश आज़ाद हुआ, रियासतों और ज़मींदारियों का भारत में विलय हुआ और राजा-रजवाड़ों के दिन ख़त्म हो गए. बची रह गईं पुरानी परंपराएं, जिनमें से कुछ अब तक कायम हैं. जिसे साल दो साल में कभी-कभार निभाया जाता है.

सिंहदेव कहते हैं, "प्राचीन परंपरा रही है जिसमें आम जनता से मिलना-जुलना होता है. इसमें पुराने दिनों जैसी कोई बात नहीं है."

टीएस सिंहदेव पिछले दस सालों से विधायक हैं और अब तीसरी बार विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में हैं. छत्तीसगढ़ में पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल के अलावा जिन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा है, उनमें टीएस सिंहदेव भी शामिल हैं.

यह कहना ठीक होगा कि राज सिंहासन भले चला गया हो, लेकिन सत्ता को बरकरार रखने की कोशिश अब भी जारी है. सिंहदेव अब किसी भी दूसरे प्रत्याशी की तरह अंबिकापुर की गलियों में लोगों से मिल रहे हैं, उनसे राज्य में कांग्रेस की सरकार बनाने की अपील कर रहे हैं.

बस्तर राजघराने के 22वें राजा हैं कमलचंद भंजदेव

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रियासत की सियासत

आज़ादी के बाद भारत में राजा-महाराजा और ज़मींदारों के दिन भले लद गए हों, लेकिन छत्तीसगढ़ में अब भी सियासत की राजनीति इन रियासतों के आसपास ही घूमती है.

सरगुजा से लेकर बस्तर तक राजा-महाराजा आज भी राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं.

आज़ाद भारत की चुनावी तस्वीर देखें तो पता चलता है कि छत्तीसगढ़ के कुछ एक राजाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश राजा-महाराजाओं ने कांग्रेस पार्टी का ही हाथ थामा.

मध्यप्रांत की विधानसभा में पहली बार जो लोग चुन कर पहुंचे थे, उनमें बड़ी संख्या राजाओं की थी. बाद के दिनों में जनतंत्र की तरह ही लोकतंत्र में भी रियासतों का परिवारवाद विस्तार पाता चला गया.

राजनीतिक मामलों के जानकार डॉक्टर विक्रम सिंघल कहते हैं, "महज़ राज परिवार का होने के कारण राजनीति में भी किसी को खास महत्व मिला हो, ऐसा नहीं है. छत्तीसगढ़ में अधिकांश रियासत के शासकों ने अपनी मेहनत के बल-बूते राजनीति में जगह बनाई. हां, जनता में उसका प्रभाव तो था ही."

असल में छत्तीसगढ़ में आज़ादी के समय 14 रियासतें थीं और इसी तर्ज़ पर कई ज़मींदारियां. सिंहासन जाने के फ़ौरन बाद अधिकांश रियासतों के उत्तराधिकारियों ने अपना रुख राजनीति की ओर किया और वे इस क्षेत्र में भी सफल हुए.

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इमेज कैप्शन, सरगुजा के राजघराने से ताल्लुक़ रखने वाले त्रिभुवनेश्वर सिंह देव

विधायक और फिर मुख्यमंत्री

सारंगढ़ को ही लें. 1952 में हुए पहले चुनाव में सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह पहली बार विधायक बने और तीन बार की विधायकी के दौरान उन्हें एक बार 3 से 25 मार्च 1969 तक 13 दिनों के लिए अविभाजित मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का अवसर भी मिला.

राजा नरेशचंद्र की पत्नी रानी ललिता देवी 1968 के उपचुनाव में पुसौर से विधायक चुनी गई थीं. मध्यप्रदेश में निर्विरोध चुन कर जाने वाली संभवतः वे अकेली महिला रही हैं.

बाद में इस परिवार की बेटियों ने राजनीति का रुख किया. कमला देवी, रजनीगंधा और पुष्पा देवी सिंह ने चुनाव लड़ा और विधायक और सांसद बनीं.

छत्तीसगढ़ में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के पिता एमएस सिंहदेव अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहने के बाद योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे. इसी तरह देवेंद्र कुमारी सिंहदेव विधायक और सिंचाई मंत्री बनीं. बाद के सालों में अंबिकापुर की सीट आरक्षित हो गई तो राज परिवार चुनावी राजनीति से अलग हो गया.

लेकिन 2008 में जब यह सीट फिर से सामान्य हुई तो टीएस सिंहदेव मैदान में उतरे. टीएस सिंहदेव ने भाजपा के अनुराग सिंहदेव को 980 वोटों से हराया और 2013 के चुनाव में फिर से उन्होंने अनुराग सिंहदेव को 19,558 वोटों से मात दी.

सिंहदेव को इस जीत के बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. इस साल होने वाले चुनाव में टीएस सिंहदेव का मुकाबला, फिर से अनुराग सिंहदेव से ही है.

सरगुजा के ही राजपरिवार से जुड़े कोरिया रियासत के रामचंद्र सिंहदेव सत्ता की राजनीति से दूर सत्यजीत रे की संगत में फोटोग्राफी का काम कर रहे थे और दूसरे व्यवसाय संभाल रहे थे.

1967 में वे पहली बार चुनाव मैदान में उतरे और उन्हें 16 विभागों का मंत्री बनाया गया.

अपनी सादगी के लिए दुनिया भर में चर्चित रामचंद्र सिंहदेव छह बार चुनाव जीत कर विधायक और मंत्री बनते रहे. वे छत्तीसगढ़ के पहले वित्त मंत्री भी थे.

इसी साल जुलाई में उनका निधन हो गया जिसके बाद अब उनकी भतीजी अंबिका सिंहदेव कांग्रेस पार्टी की टिकट से विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं.

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इमेज कैप्शन, दिलीप सिंह जूदेव का ताल्लुक जशपुर राजघराने से था

घर वापसी के नेता जूदेव

जशपुर राजघराने के विजयभूषण सिंहदेव 1952 व 1957 में जशपुर से विधायक और 1962 में रायगढ़ से सांसद बने. बाद में इस इलाके की कमान कथित धर्मांतरण के ख़िलाफ़ घर वापसी का कार्यक्रम चलाने वाले दिलीप सिंह जूदेव ने संभाली.

जूदेव पहली बार 1988 में उस समय चर्चा में आये, जब उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के ख़िलाफ़ विधानसभा के उपचुनाव के लिए मैदान में उतारा गया. अर्जुन सिंह भले चुनाव जीत गए थे, लेकिन जिस तरह से उन्हें जूदेव ने चुनौती दी थी, उसी का परिणाम था कि हारने के बाद भी जूदेव का विजय जुलूस निकाला गया था.

जूदेव ने 1989 में जांजगीर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बने लेकिन 1991 में वे चुनाव हार गए. 1992 में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया. वे केंद्र में मंत्री बने और 2003 में छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे लेकिन कैमरे पर 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं' कह कर कथित रुप से रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद उन्हें हाशिये पर बैठा दिया गया. 17 नवंबर 2003 को उन्हें मंत्री पद से भी इस्तीफा देना पड़ा.

2009 में वे बिलासपुर से सांसद भी चुने गए. 14 अगस्त 2013 को उनके निधन के बाद जूदेव राजपरिवार से रणविजय सिंह जूदेव को भाजपा ने राज्यसभा का सांसद बनाया, वहीं दिलीप सिंह जूदेव के बेटे युद्धवीर सिंह जूदेव चंद्रपुर से दो बार के विधायक रहे हैं.

इस बार के चुनाव में युद्धवीर सिंह जूदेव की पत्नी संयोगिता सिंह को भाजपा ने चंद्रपुर से अपना प्रत्याशी घोषित किया है.

इसी तरह खैरागढ़ के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह पहले विधायक बने और फिर सांसद भी. रानी पद्मावती भी चुन कर विधानसभा पहुंची. परिवार के उत्तराधिकारी शिवेंद्र बहादुर सिंह लोकसभा के प्रत्याशी बने तो उनकी पत्नी गीतादेवी सिंह कई बार विधायक बनीं. परिवार की रश्मिदेवी सिंह भी राजनीति के मैदान में उतरीं.

इस परिवार के देवव्रत सिंह तीन बार विधायक और फिर सांसद चुने गए. पिछले साल कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद वे इस चुनाव में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की टिकट पर खैरागढ़ से चुनाव मैदान में हैं.

कोरिया राजघराने के रामचंद्र सिंहदेव छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री थे

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इमेज कैप्शन, कोरिया राजघराने के रामचंद्र सिंहदेव छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री थे

राजतंत्र की जड़ें

इसी तरह बस्तर में देवताओं की तरह मान्य राजा प्रवीरचंद सिंहदेव 1957 में पहली बार विधायक बने, लेकिन पुलिस की गोली से उनकी मौत के बाद इस परिवार का राजनीति से रिश्ता टूट गया.

पिछले चुनाव के समय इस परिवार के कमल चंद भंजदेव ने भाजपा का हाथ थामा. बाद में सरकार ने उन्हें युवा आयोग का अध्यक्ष भी बनाया.

माना जा रहा था कि इस बार जगदलपुर से पार्टी उन्हें अपना उम्मीदवार बनाएगी. लेकिन पार्टी ने उन्हें विधानसभा का टिकट नहीं दिया है.

धर्मजयगढ़, कवर्धा, सक्ती, चंद्रपुर, बिलाईगढ़, सराईपाली, बसना, बिंद्रानवागढ़, छुरा और फिंगेसर जैसी रियासतों या ज़मींदारियों से भी राज परिवार के सदस्यों ने राजनीति में हाथ आजमाया और उसमें वे सफल भी रहे. लेकिन कई इलाकों में धीरे-धीरे राज परिवारों का सत्ता पर दखल कमज़ोर पड़ता गया है.

बस्तर के आदिवासी नेता और कोंटा से सीपीआई के उम्मीदवार मनीष कुंजाम का मानना है कि लोकतांत्रिक देश होने के बाद भी हमारे भीतर राजतंत्र के गुण अब तक बचे हुए हैं.

कुंजाम कहते हैं, "हमारे भीतर अभी भी सामंती संस्कार बचे हुए हैं. राजा-महाराजा की तरह होने की आकांक्षा हमारे भीतर कहीं गहरे तक बची हुई है. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में, भीड़-भाड़ और भारी-भरकम सुरक्षा व्यवस्था के साथ चलना, यही दर्शाता है."

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