एमजे अकबर के इस्तीफ़े से मोदी सरकार की छवि पर क्या असर?

एमजे अकबर

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    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

#MeToo अभियान के तहत यौन उत्पीड़न के आरोप झेल रहे विदेश राज्य मंत्री मोबाशर जावेद अकबर ने बुधवार को ये कहते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया कि "अदालत की लड़ाई, उनकी निजी लड़ाई है और वो मंत्री पद पर रहते हुए इस लड़ाई को नहीं लड़ना चाहते."

नाइजीरिया के दौरे से लौटने के बाद सोमवार को एमजे अकबर ने आरोप लगाने वाली महिलाओं में से एक पत्रकार प्रिया रमानी के ख़िलाफ़ आपराधिक मानहानि का मुक़दमा दायर किया था.

साथ ही आरोप लगाने वाली अन्य महिलाओं को उन्होंने चेतावनी दी थी कि वो उनके ख़िलाफ़ भी क़ानूनी कार्रवाई करेंगे.

लेकिन 72 घंटों के भीतर ही स्थिति बदली और बुधवार शाम को समाचार एजेंसी एएनआई ने एमजे अकबर का एक बयान जारी किया जिससे उनके इस्तीफ़े की बात सामने आई.

भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों की मानें तो पार्टी के दबाव में आकर ही एमजे अकबर ने इस्तीफ़ा दिया है.

लेकिन एमजे अकबर पर आरोप 15 दिन पहले लगने शुरू हुए थे. फिर उनसे इस्तीफ़ा लेने या फिर उनके इस्तीफ़ा देने में इतनी देर क्यों हुई? और क्या वाक़ई एमजे अकबर के इस्तीफ़े का 'क्रेडिट' भारतीय जनता पार्टी को मिलना चाहिए? इस बारे में बीबीसी संवाददाता प्रशांत चाहल ने वरिष्ठ पत्रकार अदिति फड़निस और नीरजा चौधरी से बात की.

एमजे अकबर के विरोध में प्रदर्शन

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भाजपा पर बढ़ रहा था दवाब

अदिति फड़निस ने कहा, "हमें उम्मीद थी कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने पुराने ढर्रे पर ही चल रही है. वो केस के फ़ाइनल होने तक एमजे अकबर को भी मंत्री पद पर बनाए रखेंगे. क्योंकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मंत्री पद पर रहते हुए ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ मानहानि का केस लड़ा."

"ख़बरें ये भी थीं कि अरुण जेटली ही एमजे अकबर को इस मामले में क़ानूनी लड़ाई लड़ने का परामर्श दे रहे थे. लेकिन सरकार पर दबाव इतना ज़्यादा हो गया था कि इस मामले को दबा पाना मुश्किल था. तीन महिला मंत्रियों ने भी बयान दिए थे. तो ज़ाहिर तौर पर उससे भी आंतरिक दबाव बना होगा."

"वहीं मोदी जी की पत्नी भी इस अभियान के बारे में कुछ बयान दे चुकी थीं. तो भाजपा को ये भी लग रहा था कि कहीं मोदी जी पत्नी भी मुखर होकर इस बारे में न बोलना शुरू कर दें."

इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयुक्त महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने भी एक ट्वीट का ज़िक्र करते हुए इस कैंपेन को समर्थन देने की बात कही और ये भी कहा कि ये कैंपेन सिर्फ़ महिलाओं तक सीमित नहीं है.

एमजे अकबर के विरोध में प्रदर्शन

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इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, "ये इस्तीफ़ा नहीं होता तो स्थिति और भी ख़राब हो जाती. ये एक तरह से बचाव की कोशिश है. अगले कुछ महीनों में कई राज्यों में चुनाव हैं. अगले साल लोकसभा के चुनाव भी हैं. उस समय ये बड़ा मुद्दा ज़रूर बनेगा. बस मोदी सरकार के पास अब कुछ कहने के लिए होगा."

दोनों महिला पत्रकारों का मानना है कि मोदी सरकार को इस इस्तीफ़े का क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए क्योंकि ये कार्रवाई बढ़ते दबाव के कारण हुई है. सरकार का ये कोई नैतिक फ़ैसला नहीं है.

अदिति फड़निस के अनुसार, "ये एमजे अकबर की निजी लड़ाई होती तो वो पहले ही इस्तीफ़ा दे देते. उन्होंने मंत्री पद पर रहते हुए ही एक महिला के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा किया. उन्होंने कहीं भी, कभी भी नहीं कहा कि वो निजी लड़ाई लड़ रहे हैं और वो सरकार की किसी भी तरह से बदनामी नहीं होने देंगे."

एमजे अकबर के विरोध में प्रदर्शन

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नीरजा चौधरी कहती हैं, "सरकार पहले दिन ही ये कर देती तो उन्हें फ़ायदा हो सकता था. लेकिन ये अब बचाव की कार्रवाई से ज़्यादा नहीं बचा."

वो कहती हैं, "विपक्ष भी इस केस का कोई फ़ायदा नहीं उठा पाया. सोनिया गांधी नहीं बोलीं. ममता बनर्जी नहीं बोलीं. शायद सभी दलों के मन में चोर रहा होगा कि कहीं उनके लोगों का भी नाम इसमें ना आ जाए."

अदिति फड़निस और नीरजा चौधरी का मानना है कि इस इस्तीफ़े से फ़िलहाल थोड़ी शांति तो ज़रूर आएगी.

अदिति फड़निस ने कहा, "बीजेपी समेत अन्य राजनीतिक दल भी ये बात मान रहे थे कि #MeToo कैंपेन आम जनता के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. कैंपेन के बारे में शुरुआत में ये सोच थी कि ये कैंपेन महज़ अभिजात वर्ग की महिलाओं तक सीमित है जिनके बारे में ये भी माना जा रहा था कि ये महिलाएं तो वैसे भी भाजपा को वोट नहीं देती हैं."

"अमित शाह ने कहा भी था कि आरोप तो कोई भी लगा सकता है, इसलिए इन आरोपों को लेकर सचेत रहना चाहिए. लेकिन जैसे-जैसे आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी, तो दबाव बढ़ता चला गया."

उन्होंने कहा कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि #MeToo कैंपेन के तहत यौन उत्पीड़न के आरोप लगने से ख़ुद पूर्व मंत्री एमजे अकबर और नरेंद्र मोदी सरकार की थू-थू हुई है.

एमजे अकबर के विरोध में प्रदर्शन

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माना जाता है कि साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी की एक अप्रत्याशित जीत हुई थी तो उस जीत में महिला मतदाताओं का बड़ा योगदान था. भारी संख्या में महिलाओं ने उन्हें वोट देकर प्रधानमंत्री के पद तक पहुँचाया है.

तो क्या अब मोदी सरकार की एंटी-विमेन छवि बन रही है?

इस सवाल पर नीरजा चौधरी ने कहा, "सिर्फ़ इस मामले से नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार की इमेज महिलाओं के अधिकारों के ख़िलाफ़ दिख रही है."

"क्योंकि सबरीमला में भी तो भाजपा कार्यकर्ता महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. उनका कहना है कि वो गुरुवार को होने वाले प्रदर्शनों में भी महिलाओं को मंदिर में दाखिल होने से रोकेंगे."

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