एमजे अकबर के ख़िलाफ़ महिलाओं के पास क्या हैं क़ानूनी विकल्प

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- Author, सर्वप्रिया सांगवान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय विदेश राज्यमंत्री मोबशर जावेद अकबर ने अपने ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली एक महिला पत्रकार प्रिया रमानी पर क्रिमिनल मानहानि का मामला दर्ज कराया है.
67 साल के एमजे अकबर ने उन पर आरोप लगाने वाली अन्य महिलाओं को भी इसी तरह की क़ानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है.
एमजे अकबर की कार्रवाई के कुछ घंटे बाद प्रिया रमानी ने भी एक बयान जारी किया.
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इस बयान में उन्होंने कहा, ''मैं अपने ख़िलाफ़ मानहानि के आरोपों पर लड़ने के लिए तैयार हूँ. सच और सिर्फ़ सच ही मेरा बचाव है.''
वहीं अभिनेता आलोकनाथ पर विंता नंदा ने यौन हिंसा के आरोप लगाए हैं तो उन्होंने भी उन पर एक रुपए हर्जाने का सिविल मानहानि का केस दायर कर दिया है और लिखित माफ़ी की मांग की है.
लेकिन क़ानूनी तौर पर क्या प्रिया रमानी और विंता नंदा के पास कोई विकल्प हैं? जिन महिलाओं ने भी यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं क्या उनके पास इंसाफ़ पाने के लिए कोई क़ानूनी ज़रिया है?

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मानहानि के दावों के बाद क्या विकल्प हैं महिलाओं के पास
वरिष्ठ वक़ील रमाकांत गौड़ बताते हैं कि इन महिलाओं के पास दो विकल्प हो सकते हैं.
पहला तो ये कि महिला मैजिस्ट्रेट या पुलिस को शिकायत पत्र दे कि उनके साथ यौन दुराचार की घटना हुई थी.
जब तक वो मामला कोर्ट में लंबित रहेगा या शिकायत पत्र पेश किया गया है तब तक मानहानि के दावे की कार्यवाही शुरू नहीं हो सकती.
क्योंकि अगर कोर्ट में ये साबित हो जाता है कि यौन दुराचार की घटना हुई है तो मानहानि का दावा अपने आप ख़ारिज हो जाएगा.
इसके अलावा एक विकल्प और है लेकिन रमाकांत गौर उस विकल्प को कमज़ोर बताते हैं.
दूसरा विकल्प ये कि महिलाएं कोर्ट से समन आने का इंतज़ार करें और उसके बाद अभियोजन पक्ष का क्रॉस-एक्ज़ामिनेशन हो.
लेकिन ये कमज़ोर विकल्प इसलिए है क्योंकि देश में प्रभावी क्रॉस-एक्ज़ामिनेशन करने वाले वक़ील बहुत कम हैं.
वहीं जानी-मानी वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि अभी तो इन महिलाओं के पास कई विकल्प हैं. सबसे पहले तो अभियोजन पक्ष को ये साबित करना होगा कि उनकी मानहानि हुई है और ये लंबी प्रक्रिया है. जब वो ये साबित कर लेंगे तब दूसरे विकल्पों की ज़रूरत पड़ेगी.
वहीं अवध बार एसोसिएशन के निवर्तमान अध्यक्ष डॉक्टर एल पी मिश्रा कहते हैं कि उसके बाद भी जब महिलाओं को ये साबित करना होगा कि उनके आरोप सही हैं तब उन्हें दूसरे सबूतों और गवाहों की ज़रूरत पड़ेगी लेकिन ऐसे मामलों में उनकी अपनी गवाही की क़ीमत भी क़ानूनी तौर पर काफ़ी होती है.

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क्या अंतर है सिविल और क्रिमिनल मानहानि केस में
भारत में दो तरह से मानहानि का मुक़दमा हो सकता है - सिविल मानहानि और आपराधिक मानहानि. ये दोनों एक साथ भी दायर किए जा सकते हैं. दोनों अलग-अलग चलते हैं.
दीवानी मानहानि में हर्ज़ाने के लिए मुक़दमा दायर किया जाता है और आपराधिक मानहानि में सज़ा और जुर्माना दोनों हो सकते हैं.
आपराधिक मानहानि के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 में मामला दर्ज किया जाता है.
किसी व्यक्ति के बारे में उसके सम्मान को नुक़सान पहुंचाने की मंशा से कोई बात लिखकर या बोलकर या इशारों से या किसी तस्वीर के ज़रिए कही गई हो तो ये मानहानि के दायरे में आता है.
सिविल केस में मानहानि का दावा करने वाले को साबित करना होता है कि कथित बयान ने उसके सम्मान को ठेस पहुंचाई है और वो बयान प्रकाशित हुआ है.
क्रिमिनल केस में भी पहले ज़िम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर है कि वो ये साबित करे कि उसकी मानहानि हुई है और ऐसा जानबूझकर किया गया है.

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क्या होती है प्रक्रिया
जो व्यक्ति मानहानि का मुक़दमा दर्ज करवाना चाहता है, उसे ये शिकायत दस्तावेज़ी सबूतों के साथ कोर्ट में देनी होती है.
अदालत में शिकायत मिलने पर और बयान दर्ज कराने पर अगर मामला चलने के लिए पर्याप्त आधार और सबूत हैं तो अदालत समन जारी करती है. यह समन जिस पर मानहानि करने का आरोप होता है उसके ख़िलाफ़ होता है.
अगर वो व्यक्ति अपनी ग़लती नहीं मानता है तो अदालत वापस शिकायतकर्ता और बाकी गवाहों को बुलाती है.
अगर मानहानि को लेकर हर्ज़ाना चाहिए तो इसके लिए पहले क़ानूनी नोटिस दिया जाता है और इसके बाद अदालत में मांगी गई हर्ज़ाने के राशि का 10 फ़ीसदी तक कोर्ट में जमा करवाना पड़ता है.
बचाव पक्ष अगर ये साबित कर दे कि बयान सच है, या जनहित में है या फिर किसी कोर्ट की कार्यवाही या संसद की कार्यवाही का हिस्सा है तो मानहानि के दावे से बच सकता है.

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क्या सच में 97 वकील लड़ेंगे प्रिया रमानी के ख़िलाफ़
सोशल मीडिया पर एमजे अकबर के वक़ीलों का एक वकालतनामा वायरल हो रहा है. कई लोग कह रहे हैं कि एक महिला के ख़िलाफ़ 97 वक़ील खड़े हैं.
दरअसल, ये वकालतनामा एमजे अकबर के वकील की फर्म है. अक्सर मुक़दमों में एक से ज़्यादा वक़ील वकालतनामा साइन करते हैं ताकि किसी की अनुपस्थिति में कोई दूसरा मौजूद हो सके.
लेकिन रमाकांत गौड़ कहते हैं कि ये अनिवार्य नहीं है और 97 वकीलों का वकालतनामा साइन करना एक तरह से महिला पर दबाव बनाने का तरीक़ा है.

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भारत में मानहानि क़ानून
दूसरे कई देशों में मानहानि क़ानून आपराधिक दायरे में नहीं हैं. भारत में भी इसे अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने की कोशिशें हुईं हैं.
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में इसे अपराध की श्रेणी से बाहर करवाने के लिए याचिका डाली थी.
बाद में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस याचिका में पार्टी बन गए थे. तीनों पार्टियों के नेता चाहते थे कि मानहानि के दावे को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा जाए.
लेकिन 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फ़ैसला दिया कि ये अपराध की श्रेणी से बाहर नहीं होगा.
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