ग्राउंड रिपोर्ट: राजधानी दिल्ली में 20 दिनों में 20 बच्चों की मौत, ज़िम्मेदार कौन?

डिप्थीरिया से बच्चों की मौतें
    • Author, गुरप्रीत सैनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

'शिफा बारिश में भीग रही है, अम्मी उसे अंदर बुला लो.'

दो साल की आयशा को लगता है कि उसकी बड़ी बहन कहीं बाहर ही खड़ी है. लेकिन उसकी अम्मी रुंधे गले से कहती हैं, 'ना बेटा! अब शिफा वापस नहीं आएगी, वो अल्लाह के पास चली गई है.'

मां-बेटी की ये बातें सुनकर मानो उनके घर की दीवारें भी रोई हों और उनकी आंखों से सारा काला काजल बह गया हो.

छह साल की लाडली बेटी को खोने के बाद घर में मातम पसरा है. दो कमरे का घर रिश्तेदारों से भरा पड़ा है. सब अपनी कह रहे हैं.

लेकिन घूंघट ओढ़े खड़ी शिफा की अम्मी नजमा एक कोने में खामोश खड़ी हैं. मुंह से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा, लेकिन आंखों से आंसू लगातार बहते जा रहे हैं.

डिप्थीरिया से मरने वाली बच्ची की मां
इमेज कैप्शन, शिफा की मां का रो-रोकर बुरा हाल है

अलग से जाकर पूछने पर फफक-कर रो पड़ती हैं और बेटी की साइकल, नए कपड़े और जूते दिखाती हैं.

"सारे नए कपड़े ऐसे ही धरे हैं. इन्हें पहन भी ना पाई वो. इतनी महंगी-महंगी फ्रॉक लाए थे इसके पापा. खाला की शादी में परी सी लग रही थी." इतना कहकर वो घूंघट में रोने लगती हैं.

डिप्थीरिया से मरने वाली बच्ची शिफा
इमेज कैप्शन, छह साल की शिफा उन 20 बच्चों में से एक है, जिनकी दिल्ली के सरकारी अस्पताल में डिप्थीरिया से मौत हो गई

गले और नाक में संक्रमण

छह साल की शिफा उन 20 बच्चों में से एक थी, जिन्होंने डिप्थीरिया बीमारी के इलाज के दौरान दिल्ली के महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल में दम तोड़ दिया. डिप्थीरिया के लिए उत्तर भारत में ये इकलौता सरकारी अस्पताल है. आसपास के इलाकों के डॉक्टर बच्चों को यहीं रेफर करते हैं.

डिप्थीरिया एक संक्रामक रोग है, जो बैक्टीरिया के कारण होता है. ये बीमारी गले और नाक को संक्रमित करती है. इससे टॉन्सिल और दूसरे अंगों पर असर पड़ता है.

गाज़ियाबाद के एक मुस्लिम बहुल गांव कल्लु गढ़ी की रहने वाली शिफ़ा को दो दिन से गले में काफी दिक्कत हो रही थी, वो बोल तक नहीं पा रही थी. एक स्थानीय डॉक्टर ने कहा कि उसे निमोनिया है. दवा लेने के बाद भी कोई असर नहीं हुआ.

शिफा की डिप्थीरिया से मौत
इमेज कैप्शन, शिफा के जूतियां

नाक-कान की विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि बच्ची को डिप्थीरिया है. डॉक्टर ने उसे तुरंत दिल्ली के महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल रेफर कर दिया.

बच्ची के नाना बद्दुदीन बताते हैं, "हम तुरंत बच्ची को लेकर दिल्ली भागे. अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा कि अस्पताल मे एंटी डिप्थीरिया सीरम (इंजेक्शन) नहीं है, बाहर से ख़रीद कर लाओ. एक सीरम करीब 1,300 रुपये का था और ऐसे आठ चाहिए थे."

शिफा के पिता ज़हीर बस में हेल्पर के तौर पर काम करते हैं. दिन के 200-300 दिहाड़ी कमा लेते हैं, जिससे पत्नी और चार बच्चों का पेट भरते हैं. उनके लिए 10,300 रुपये बड़ी रकम थी.

इधर-उधर से पैसे मांगकर उन्होंने बच्ची के लिए आठ इंजेक्शन का इंतज़ाम किया. डॉक्टर ने इंजेक्शन लगा दिए. लेकिन इसके कुछ ही देर बाद शिफा की मौत हो गई.

एंटी डिप्थीरिया सीरम
इमेज कैप्शन, एक एंटी-डिप्थीरिया सीरम की कीम करीब 1300 रुपये होती है. पीड़ित बच्चों को ऐसे आठ सीरम लगते हैं

नानी सईदा कहती हैं, "हमारी शिफा तो बिल्कुल ठीक थी. हंस खेल रही थी. दूसरे बच्चों की तरह उसके गले में सूजन भी नहीं थी. बोली अब्बा मैं ठीक हो गई, मुझे घर ले चलो ना. चाय और बिस्किट भी लिए थे. लेकिन कुछ देर बाद ही उसे ख़ून की उल्टी हुई और वो चल बसी. दादा-दादी के दिए पैसे भी मुट्ठी में ही रह गए."

ऐसा लग रहा था मानो गोबर से लिपा कमरे का फ़र्श बरसात के पानी से नहीं, परिवार वालों के आंसूओं से गीला हो गया है.

डिप्थीरिया, महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल

शिफा के अलावा मृतक 19 बच्चों के घरों में भी यही हाल है. मरने वाले बच्चों में तीन दिल्ली के जबकि बाकी 17 उत्तर प्रदेश के हैं.

अस्पताल में आए ज़्यादातर बच्चे मुस्लिम परिवारों के हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों से आए हैं. ये लोग मज़दूरी या दूसरे छोटे-मोटे काम करते हैं.

अस्पताल पर आरोप

आरोप है कि अस्पताल के पास सीरम नहीं था और पीड़ित बच्चों के परिजनों को इसे बाहर से ख़रीद कर लाने के लिए कहा गया. इस बात को खुद अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक सुशील कुमार गुप्ता ने भी माना.

मरीज बच्चों के परिजनों का कहना है कि उन्होंने कर्ज़ लेकर ये सीरम ख़रीदे.

महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल
इमेज कैप्शन, दिल्ली स्थित महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल

ये सीरम कसौली के सेंट्रल रिसर्च इंस्टिट्यूट से मंगाए जाते हैं. महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक का कहना है कि पिछले नवंबर में ही सीरम ख़त्म हो गए थे.

उन्होंने कहा, "सीरम मंगाने के लिए हमने रिसर्च इंस्टिट्यूट से संपर्क किया, लेकिन उनके पास सीरम तैयार नहीं थे."

लेकिन कसौली के सेंट्रल रिसर्च इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर अजय प्रह्लाद का कहना है कि उन्होंने 15 दिन पहले 200 सीरम तैयार रखे थे. लेकिन अस्पताल से कोई इन्हें लेने नहीं आया.

"हमने अस्पताल को कहा था कि फिलहाल इतने सीरम ले जाए. बाकी सीरम हम एक-एक हज़ार करके पहुंचा देंगे. लेकिन वो लेकर नहीं गए."

जब 200 सीरम रिसर्च सेंटर से लाए गए, तब तक कई बच्चों की मौत हो चुकी थी.

हालांकि अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक का कहना है कि एंटी-डिप्थीरिया सीरम देने ना देने से कोई ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता. उनका कहना है कि अगर बचपन में डीटीपी का टीका नहीं लगवाया गया तो ख़तरा रहता ही है. लेकिन ज़्यादातर परिजनों का दावा है कि उन्होंने टीकाकरण करवाया था.

महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल

महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक सुशील कुमार गुप्ता कहते हैं, "कुछ लोग बच्चों का टीकाकरण नहीं करवाते. हर साल इस बीमारी के 400-500 मामले आते हैं. इनमें से 10-15% की मौत हो जाती है. हर साल इतने बच्चे मरते ही हैं, मीडिया इसे बेवजह मुद्दा बना रहा है."

चिकित्सा अधीक्षक के मुताबिक इस साल जनवरी से अबतक इस बीमारी के करीब 310 बच्चे अस्पताल में आए हैं. अब भी 50 से ज़्यादा बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं.

वो कहते हैं, "अस्पताल में हर साल डिप्थीरिया के मामले आते हैं. मौतें भी होती हैं. इसके बावजूद अस्पताल में मरीज़ों की संख्या बढ़ने पर एंटी डिप्थीरिया सीरम नहीं मंगाया गया. सिर्फ सितंबर महीने में ही अबतक 20 बच्चों की मौत ने मामले पर सवाल खड़े किए हैं."

परिजनों ने अस्पताल में दवाईयों की कमी और अव्यवस्था की शिकायत की है. उनका कहना है कि डॉक्टर वार्ड में सिर्फ़ एक बार चक्कर लगाते हैं, बाकि समय सिस्टर ही वार्ड को देखती हैं.

डिप्थीरिया, महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल
इमेज कैप्शन, चिकित्सा अधीक्षक के मुताबिक अस्पताल में इस साल डिप्थीरिया के 300 से अधिक मरीज़ भर्ती हुए हैं

अस्पताल पर कार्रवाई

उत्तर दिल्ली नगर निगम के मेयर आदेश गुप्ता ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन कर दिया है. उन्होंने कहा कि अगर कोई दोषी पाया जाता है तो उसपर सख़्त कार्रवाई की जाएगी.

हालांकि, जांच पूरी होने तक सुशील कुमार गुप्ता को अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक के पद से निलंबित कर दिया गया है.

डिप्थीरिया, महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल
इमेज कैप्शन, एंटी-डिप्थीरिया के सीरम इंजेक्शन से बोतल में डाल कर बच्चों को दिये जाते हैं

डिप्थीरिया है संक्रामक रोग़

गंगाराम अस्पताल में इएनटी डिपार्टमेंट के चेयरमैन डॉक्टर अजय स्वरूप बताते हैं कि डिप्थीरिया एक संक्रामक रोग है. इससे बचाव के लिए छोटी उम्र में ही बच्चे को डीपीटी का टीका लगाया जाता है.

टीकाकरण के बाद डिप्थीरिया होने की आशंका कम होती है, लेकिन कुछ बच्चों को इसके बाद भी डिप्थीरिया हो जाता है.

ज़्यादातर, इस बीमारी की चपेट में बच्चे आते हैं. हालांकि यह बड़ों को भी हो सकती है. बैक्टीरिया का इंफेक्शन सबसे पहले गले में होता है.

इससे श्वांस नली तक इंफेक्शन फैल जाता है. डिप्थीरिया कम्यूनिकेबल डिज़ीज़ (संक्रामक रोग़) है यानी ये एक व्यक्ति से दूसरे में फैल सकती है.

इसके शुरुआती स्टेज में एंटी-डिप्थीरिया सीरम से मरीज ठीक हो सकता है. लेकिन बीमारी बढ़ने पर कई बार ये सीरम असर नहीं करता और सीरम देने के बाद भी बच्चे की मौत हो जाती है.

डिप्थीरिया, महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल
इमेज कैप्शन, अमरोहा के अयाज़ अलि की 10 साल की बेटी जुबैदा भी इसी अस्पताल में भर्ती हैं. उनसे भी सीरम बाहर से ख़रीदकर लाने के लिए कहा गया था. वो बताते हैं कि यहां इलाज कराने में 20 से 22 हज़ार रुपये का कर्ज़ हो गया है

डिप्थीरिया के लक्षण

  • बुख़ार
  • दस्त
  • गले और टॉन्सिल में सफ़ेद झिल्ली का बनना
  • गले में सूजन
  • गला दर्द करना
  • ख़राश, खांसी
डिप्थीरिया, महर्षि वाल्मीकि संक्रामक रोग अस्पताल

वैक्सीनेशन है ज़रूरी

वैक्सीनेशन से बच्चे को डिप्थीरिया से बचाया जा सकता है. नियमित टीकाकरण में डीपीटी (डिप्थीरिया, पर्टुसिस काली खांसी और टिटनेस) का टीका लगाया जाता है.

एक साल के बच्चे को डीपीटी के 3 टीके लगते हैं. इसके बाद डेढ़ साल पर चौथा टीका और 4 साल की उम्र पर पांचवां टीका लगता है. टीकाकरण के बाद डिप्थीरिया होने की आशंका कम हो जाती है.

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