अडाणी के इस प्रोजेक्ट को लेकर झारखंड में क्यों है रोष

अडाणी पावर लिमिटेड का बोर्ड

इमेज स्रोत, Ravi Prakash/BBC

    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, गोड्डा (झारखंड) से, बीबीसी हिन्दी के लिए

माली गांव की लुखुमोयी मुर्मू का जन्म भारत की आज़ादी के बाद हुआ है. उन्होंने ग़ुलामी नहीं देखी, सिर्फ़ इसकी कहानियां सुनी हैं.

इसको लेकर उनकी जानकारी सिर्फ़ इतनी है कि तब अंग्रेज़ी हुक़ूमत अपनी बातों को मनवाने के लिए लोगों का दमन कराती थी.

अब आज़ाद भारत में वे कथित तौर पर उसी तरह के 'दमन' को महसूस कर रही हैं. इसकी वजह बना है यहां बन रहा अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट.

आठ-आठ सौ मेगावाट के इन प्लांटों के निर्माण के लिए झारखंड सरकार और अडाणी पावर (झारखंड) लिमिटेड ने फरवरी 2016 में एक क़रार किया था. इसके तहत यहां उत्पादित 1600 मेगावाट बिजली विशेष ट्रांसमिशन लाइन से सीधे बांग्लादेश को भेजी जानी है.

इसके लिए अडाणी समूह क़रीब 15,000 करोड़ रुपए का निवेश करने वाला है.

इसकी पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2015 में अपने बांग्लादेश दौरे में की थी. बाद में बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के दिल्ली दौरे के दौरान इस पर आगे की सहमति बनी.

इसके लिए अडाणी पावर लिमिडेट और बांग्लादेश पावर डिवेलपमेंट बोर्ड के बीच औपचारिक क़रार हो चुका है.

लुखुमोयी (एकदम दाएं)

इमेज स्रोत, Ravi Prakash/BBC

इमेज कैप्शन, लुखुमोयी (एकदम दाएं) कहती हैं कि उन्होंने अपनी ज़मीन नहीं दी है

लुखुमोयी का दर्द

लुखुमोयी मुर्मू ने बीबीसी से कहा, "हमने पावर प्लांट के लिए अपनी ज़मीन नहीं दी है. फिर जाने कैसे मेरी ज़मीन का अधिग्रहण हो गया. 31 अगस्त को अडाणी कंपनी के लोग सैकड़ों पुलिसवालों और लठैतों के साथ मेरे गांव आए और मेरे खेत पर जबरन कब्ज़ा करने की कोशिश की. उन लोगों ने मेरी धान की फसल बर्बाद कर दी और बुल्डोज़र चलाकर सारे पेड़-पौधे उखाड़ दिए. मैंने उनका पैर पकड़ा. फसल नहीं उजाड़ने की मिन्नतें की. लेकिन वे अंग्रेज़ों की तरह दमन पर उतारू थे. उन लोगों ने हमारी ज़मीन पर जबरन बाड़ लगा दिया. हमारे पुरखों के श्मशान को भी तोड़कर समतल कर दिया."

"उन लोगों ने कहा कि अब यह ज़मीन अडाणी कंपनी की है, मेरी नहीं. हमें बताया गया कि इन ज़मीनों का अधिग्रहण हो चुका है और इसका मुआवज़ा सरकार के पास जमा करा दिया गया है. आप बताइए कि जब हमने ज़मीन ही नहीं दी, तो इसका अधिग्रहण कैसे कर लिया गया. हमको अपनी ज़मीन चाहिए, मुआवज़े का रुपया नहीं."

Red line
Red line
अडाणी पावर प्लांट की साइट

इमेज स्रोत, Ravi Prakash/BBC

इमेज कैप्शन, अडाणी पावर प्लांट की साइट

कौन हैं लुखुमोयी मुर्मू

माली गांव में आदिवासियों के डेढ़ दर्जन घर हैं. क़रीब 100 लोगों की आबादी वाले इस गांव में एक घर लुखुमोयी मुर्मू का भी है. पिछले दिनों ज़मीन पर कब्ज़े के वक़्त अधिकारियो के पैर पकड़ कर रोती उनकी तस्वीरें और फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे.

वे और उनके गांव के आदिवासी पावर प्लांट के लिए ज़मीन के अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. इन आदिवासियों की यहां क़रीब पौने सतरह बीघा पुश्तैनी ज़मीन है, जिस पर खेती कर वे अपनी आजीविका चलाते हैं.

कहां-कहां हुआ है अधिग्रहण

अडाणी समूह के प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए गोड्डा प्रखंड के मोतिया, गंगटा गोविंदपुर, पटवा और पोड़ैयाहाट के माली, गायघाट और सोनडीहा गांवों की ज़मीनें अधिग्रहण की प्रक्रिया में हैं.

सरकार का दावा है कि मोतिया, गंगटा गोविंदपुर, पटवा और माली गांवों के अधिकतर रैयतों ने अपनी ज़मीनें देकर उसका मुआवज़ा ले लिया है. जबकि इन गांवों के आदिवासियों का आरोप है कि सरकार ने उनकी ज़मीनें अवैध तरीक़े से अधिग्रहित की है. लिहाज़ा, वे इसका मुआवज़ा नहीं ले सकते.

अडाणी समूह ने मोतिया गांव में अपने प्रस्तावित पावर प्लांट का बोर्ड लगाया है. यहां एस्बेस्टस और ईंटों से दफ्तरनुमा कुछ शेड बनाए गए हैं. बाहर कुछ सिक्योरिटी गार्ड्स तैनात हैं, जो प्रारंभिक पूछताछ के बाद ही हमें इसकी तस्वीरें उतारने की इजाज़त देते हैं.

इन गांवों में घूमने के दौरान मैंने अडाणी फाउंडेशन द्वारा बनाए गए चबूतरे और कुछ और निर्माण देखे. जो इस बात की मुनादी करते हैं कि अडाणी समूह इन कोशिशों के ज़रिए स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल करना चाह रहा है.

Red line
Red line
रामजीवन पासवान

इमेज स्रोत, Ravi Prakash/BBC

इमेज कैप्शन, रामजीवन पासवान रिटायर्ड शिक्षक हैं और उन्होंने ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ केस किया है

फिर क्यों है विरोध

मोतिया में मेरी मुलाक़ात रामजीवन पासवान से हुई. वे रिटायर्ड शिक्षक हैं. उन्होंने अपनी ज़मीन के जबरन अधिग्रहण और मारपीट के आरोप में अडाणी समूह के कुछ अधिकारियों पर मुक़दमा किया है.

वे मानते हैं कि अडाणी समूह की झारखंड सरकार से मिलीभगत है. उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड की सरकार 'प्रो पीपुल' न होकर 'प्रो अडाणी' हो चुकी है और उन्हें अवैध तरीके से मदद कर रही है.

रामजीवन पासवान ने बीबीसी से कहा, "सरकार झूठ बोल रही है. ग़लत तथ्यों के आधार पर हमारी ज़मीनों का अधिग्रहण कर लिया गया है जबकि हमने अपनी सहमति का पत्र सौंपा ही नहीं है. ये लोग दलालों (बिचौलियों) की मदद से लोगों को डराकर ज़मीनें अधिग्रहित करा रहे हैं."

वे रोते हुए कहते हैं, "फ़रवरी महीने में अडाणी समूह के कुछ लोग मेरे खेत पर आए. मुझे मेरी जाति (दुसाध) को लेकर गालियां दी और कहा कि इसी ज़मीन में काटकर गाड़ देंगे. मेरी ज़िंदगी में पहले किसी ने ऐसी गाली नहीं दी थी. मैं इस घटना को भूल नहीं पाता हूं. मेरे घर पर ईंट-पत्थर से हमला कराया गया और अब पुलिस इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है."

Red line
Red line
गणेश पंडित

इमेज स्रोत, Ravi Prakash/BBC

इमेज कैप्शन, गणेश पंडित को मृत बताकर उनकी ज़मीन अधिगृहित कर ली गई

मरा बताकर ज़मीन ले ली

इसी गांव के गणेश पंडित का अलग दर्द है. सरकार द्वारा ज़मीनों के अधिग्रहण के लिए बनाई गई रैयतों की सूची में उन्हें मृत बताकर उनकी ज़मीन अधिग्रहित कर ली गई.

उन्होंने बीबीसी से कहा,"मुझे कंपनी (अडाणी) के लोगों ने मार दिया. तीन बेटा है. दो का ही नाम दिखाया और मेरी ज़मीन को मेरी सहमति के बग़ैर अधिग्रहित कर लिया. मैंने मुआवज़े का पैसा नहीं लिया है. इसके बावजूद मेरी ज़मीन पर बाड़ लगाकर उसकी घेराबंदी कर दी गई है."

गंगटा गोविंदपुर गांव के सूर्यनारायण हेंब्रम की भी ऐसी ही शिकायत है. उन्होंने बताया कि जुलाई में अपने खेत में धान का बिचड़ा लगाते वक़्त अडाणी कंपनी के कथित मैनेजरों ने उन्हें अपना खेत जोतने से रोक दिया.

उन्होंने मुआवज़ा नहीं लिया है, क्योंकि वे पावर प्लांट के लिए अपनी ज़मीन देना नहीं चाहते हैं. सरकार ने उनकी ज़मीन का ज़बरदस्ती अधिग्रहण कर लिया है.

सूर्यनारायण हेंब्रम (गंगटा), राकेश हेंब्रम, श्रवण हेंब्रम, मैनेजर हेंब्रम, अनिल हेंब्रम, बबलू हेंब्रम, चंदन हेंब्रम, मुंशी हेंब्रम, पंकज हेंब्रम (सभी माली गांव के) और रामजीवन पासवान व चिंतामणि साह (मोतिया) ने आरोप लगाया कि दिसंबर 2017 में जनसुनवाई के वक़्त अडाणी समूह के अधिकारियों ने कथित तौर पर फर्जी रैयतों को खड़ा कर खानापूरी कर ली.

गांधीवादी एक्टिविस्ट चिंतामणि साह ने कहा, "इसमें प्रवेश के लिए कभी पीला कार्ड तो कभी सफ़ेद गमछा जारी किया गया. जनसुनवाई के दौरान ऐसे ही लोग अंदर ले जाए गए, जिनके पास ये पहचान थी. असली रैयत अपना आधार कार्ड और राशन कार्ड लिए रह गए लेकिन उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया. बाद में उसी कथित जनसुनवाई और मुंबई की एक कंपनी द्वारा कथित तौर पर किए गए सोशल इंपैक्ट सर्वे के आधार पर जमीनें अधिग्रहित कर ली गईं."

प्लांट की जगह

इमेज स्रोत, Ravi Prakash/BBC

इमेज कैप्शन, प्रोजेक्ट साइट

सरकार का पक्ष

गोड्डा के अपर समाहर्ता (एसी) अनिल तिर्की ने मीडिया को बताया कि सरकार ने अडाणी पावर (झारखंड) लिमिटेड के गोड्डा प्लांट के लिए 517 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया है. अडाणी समूह को 900 एकड़ से कुछ अधिक जमीन चाहिए.

इसके लिए पोड़ैयाहाट प्रखंड के सोनडीहा और गायघाट गांवों की क़रीब 398 एकड़ ज़मीन के अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की गई थी. तय समयसीमा में अडाणी समूह उसकी प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका, लिहाज़ा उस ज़मीन के अधिग्रहण के लिए उन्हें पूरी प्रक्रिया फिर से दोहरानी होगी.

जमीनों के जबरन अधिग्रहण और आदिवासियों और दूसरे ग्रामीणों के अन्य आरोपों के संबंध मे पूछे गए सवालों का उन्होंने यह कहकर जवाब नहीं दिया कि वह इसके लिए अधिकृत नहीं हैं.

वहीं, गोड्डा की डीसी कंचन कुमार पासी ने मीडिया के समक्ष दावा किया कि ज़मीनों के अधिग्रहण में भूमि अधिग्रहण क़ानूनों का पालन किया जा रहा है.

अडाणी पावर प्लांट को लेकर प्रदर्शन

इमेज स्रोत, Ravi Prakash/BBC

विपक्ष हुआ हमलावर

झारखंड विकास मोर्चा के नेता और पोड़ैयाहाट के विधायक प्रदीप यादव सरकार और उसके अधिकारियों पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हैं. उन्होंने अडाणी पावर प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण के विरोध में अनशन किया था. इसके बाद उन्हें जेल जाना पड़ा.

उन्होंने कहा कि अडाणी समूह को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार ने अपनी ऊर्जा नीति तक बदल दी. यह सरासर अन्याय है. जिन लोगों ने ग्रामीणों के साथ मारपीट कर उनकी फसल उजाड़ी है, उनके ख़िलाफ़ एफआइआर दर्ज कराया जाना चाहिए. इसके साथ ही पूरे अधिग्रहण प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए.

झारखंड दिशोम पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने इस मामले को लेकर आगामी एक अक्तूबर को संथाल परगना के सभी छह ज़िला मुख्यालयों में धरना-प्रदर्शन और 11 अक्तूबर को इन्हीं ज़िलों में संपूर्ण बंदी की घोषणा की है.

अडाणी समूह के एक अधिकारी से मेरी मुलाक़ात गोड्डा में हुई, तो उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया. हालांकि, अडाणी समूह के रांची स्थित हेड (कॉर्पोरेट अफेयर्स) अमृतांशु प्रसाद ने एक मीडिया बयान में कहा कि गोड्डा में पावर प्लांट का विरोध करने वाले लोग विकास विरोधी हैं.

उन्हें नहीं पता कि उस प्लांट के खुल जाने से कितने लोगों को रोज़गार मिलेगा. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी कुछ महीने पहले कहा था कि अडाणी समूह के पावर प्लांट से रोज़गार के नए अवसर सृजित होंगे.

बहरहाल, विवादों में चल रहे अडाणी समूह को अपने पावर प्लांट के लिए बाकी की ज़मीनों के अधिग्रहण में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

Red line

ये भी पढ़ें:

Red line

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)