भारत में बच्चों की मृत्यु दर घटी, पर ये कैसे संभव हुआ

- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
शिशु मृत्यु दर पर संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट भारत के लिए अच्छी ख़बर लेकर आई.
घर में बच्चा पैदा होने पर गूंजी किलकारी मातम में बदल जाए, अब ऐसा कम हो रहा है.
2017 में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का आंकड़ा पहली बार एक मीलियन यानी 10 लाख से कम रहा.
इसके अलावा भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर पहली बार दुनिया के अंडर 5 बच्चों की मृत्यु दर के बराबर आ गई. इससे पहले तक भारत की दर पूरी दुनिया के मुकाबले कहीं ज़्यादा थी. 1990 में भारत की शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 पर 129 थी. 2005 में ये घटकर 58 हो गई, जबकि 2017 में ये प्रति 1000 पर 39 रह गई है.
साथ ही दुनियाभर में होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा घटकर 18 प्रतिशत हो गया. यानी भारत में दुनिया के 18% बच्चे पैदा हुए और 18% बच्चे ही मरे.
आपको ये जानकर हैरानी होगी कि 1990 में दुनिया के 18% बच्चे भारत में पैदा हुए थे, लेकिन मरे 27%.
वहीं लड़के और लड़कियों की मौत का अंतर भी घटा है. पहले 10% ज़्यादा लड़कियां मरती थीं, लेकिन 2017 में लड़कों के मुकाबले सिर्फ़ 2.5% ज़्यादा लड़कियों की मौत हुई.

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ये सारे आंकड़े भारत के लिए सकारात्मक संकेत दे रहे हैं क्योंकि शिशु मृत्यु दर किसी भी देश की सेहत को दर्शाती है. मृत्यु दर जितनी कम होगी, देश उतना अधिक सेहतमंद कहलाएगा.
यूनीसेफ़ इंडिया के स्वास्थ्य प्रमुख गगन गुप्ता ने बीबीसी को बताया, "अधिकतर प्रसव अस्पताल में होने, नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए सुविधाओं का विकास और टीकाकरण बेहतर होने से शिशु मृत्यु दर में कमी आई है. पहली बार भारत में 10 लाख से कम बच्चों की मौत हुई है. 2017 में ये आंकड़ा 9 लाख 89 हज़ार रहा. ये नंबर आपको ज़्यादा लगेगा, लेकिन भारत की आबादी के लिहाज से बहुत बड़ा देश है. मृत्यु दर प्रति 1000 बच्चों पर तय की जाती है और ये दर पहले से बहुत कम हुई है. ये भारत के लिए अच्छी खबर है."
यूएन की ये रिपोर्ट दुनिया के अलग-अलग देशों की मृत्यु दर पर बात करती है, लेकिन भारत के अंदरूनी राज्यों में इसका क्या हाल है और पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत की मृत्यु दर कितनी बेहतर या बदतर है?
गगन गुप्ता स्थानीय आधिकारिक रिपोर्टों के आधार पर कहते हैं, "केरल और तमिलनाडु में शिशु मृत्यु दर सबसे कम है, जबकि मध्य प्रदेश, असम और उत्तर प्रदेश में ज़्यादा बच्चे मरते हैं."

मृत्यु दर कम-ज़्यादा होने की वजहें
गगन के मुताबिक जिस इलाके में शिक्षा का स्तर ज़्यादा होता है और आधारभूत स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होती हैं वहां शिशु मृत्यु दर कम रहती है.
अगर मां 12वीं पास है तो बच्चे की मौत की आशंका 2.7 गुना तक कम हो जाती है.
यही वजह है कि तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में मृत्यु दर कम है. साथ ही इन राज्यों में स्वास्थ्य सेवाएं भी बेहतर हैं. यहां छोटे-मोटे इलाकों में भी अच्छे अस्पताल होते हैं.
वो कहते हैं कि मृत्यु दर कम-ज़्यादा होने की तीन वजहें हो सकती हैं - "अमीरी-गरीबी, मां की शिक्षा और गांव या शहर में बच्चे का पैदा होना."

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लड़कों के मुकाबले लड़कियों की मृत्यु दर पहले से कम हुई है, लेकिन अब भी ये विश्व मृत्यु दर से काफ़ी ज़्यादा है. जबकि पाकिस्तान समेत कई देशों में लड़कियां लड़कों से कम मरती हैं.
गगन को उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में लड़के और लड़कियों की मृत्यु दर के बीच का फ़ासला ख़त्म हो जाएगा.
वो कहते हैं कि सकारात्मक संकेत मिलने लगे हैं और इसकी वजहें हैं, "कई जगह बच्चियों के पैदा होने पर प्रोत्साहन राशि दी जाती है, मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा दी जाती है. इन सब चीज़ों से लड़कों के मुकाबले लड़कियों की मृत्यु दर चार गुना घटी है. पहले 10% ज़्यादा लड़कियां मरती थीं, लेकिन अब सिर्फ 2.5% ज्यादा मर रही हैं."
हालांकि गगन ये भी मानते हैं कि लोग आज भी लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च नहीं करना चाहते, इसलिए लोगों को ये मानसिकता बदलनी होगी. वो इसे बदलने में मीडिया की भूमिका को अहम मानते हैं.

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और कम कैसे होगी मृत्यु दर
गगन बताते हैं कि बच्चों की ज़्यादातर मौतें पोषण की कमी या इन्फ़ेक्शन की वजह से होती हैं.
इसलिए 'पोषण' अभियान के तहत जरूरी पोषक तत्व मुहैया कराने और देश को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) कराने जैसे राष्ट्रीय स्तर पर चलाये जा रहे अभियानों से भी मदद मिलेगी.
वो कहते हैं कि समाज और सरकार दोनों ही स्तरों पर कोशिशों से आकड़े और बेहतर हो जाएंगे.
उनके मुताबिक:
- हर मां की डिलिवरी अस्पताल में ही हो.
- जन्म के एक घंटे के अंदर मां का पीला दूध पिलाएं.
- सबसे ज़्यादा मौतें जन्म से एक महीने के अंदर होती हैं. इसलिए इस दौरान बच्चे का ज़्यादा ख्याल रखें.
जन्म का दिन सबसे खुशी का भी दिन है और सबसे ख़तरे का भी दिन है. अधिकतर बच्चों की मौत जन्म के दिन या जन्म के 24 घंटे के अंदर होती है और उसके बाद पहले एक महीने में सबसे ज़्यादा मौतें होती हैं.
भारत सरकार ने मंगलवार से होम बेस्ड यंग चाइल्ड प्रोग्राम शुरू किया है जिसके तहत आशा वर्कर हर तीन, छह, नौ, 12 और 15 महीने पर बच्चे के घर जाएगी. वो बच्चों को सही पोषण, उसकी सेहत और विकास का ख़्याल रखने में मदद करेगी. इसके अलावा प्रधानमंत्री अगले हफ्ते ही हेल्थ एंश्योरेंस लागू करने वाले हैं.
यूनीसेफ़ इंडिया के हेल्थ चीफ़ गगन कहते हैं कि इन समुदायिक और सरकारी कोशिशों से शिशु मृत्यु दर को और कम किया जा सकता है.

साउथ एशिया में भारत की स्थिति
2017 के दौरान दुनियाभर में बच्चों की जितनी भी मौते हुईं, उनमें से आधी अफ्रीका और 30% दक्षिण एशिया में हुईं.
गगन कहते हैं कि दक्षिण एशिया की हालत अफ्रीका से काफ़ी बेहतर है.
"दक्षिण एशिया में बड़े-बड़े देश हैं और अफ्रीका में छोटे-छोटे कई देश. इसलिए इन महाद्वीपों में मौतों की संख्या ज़्यादा दर्ज की जाती है. लेकिन शिशु मृत्यु दर के हिसाब से देखें तो अफ्रीका की दर 76 है और एशिया की महज़ 44. अफ्रीका के कुछ देशों में 80, 90 तो किसी में मृत्यु दर 100 तक है, जबकि दक्षिण एशिया के देशों में ऐसा नहीं है."
हालांकि अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत की शिशु मृत्यु दर कम है. लेकिन लैंगिक आधार पर देखा जाए तो पाकिस्तान की स्थिति भारत से बेहतर है.

2017 के दौरान भारत में लड़कों की मृत्यु दर प्रति 1,000 बच्चे पर 39 थी, जबकि लड़कियों में यह प्रति 1,000 बच्चियों पर 40 थी. वहीं पाकिस्तान में लड़कों की मृत्यु दर प्रति 1,000 बच्चे पर 78 थी, जबकि लड़कियों में यह प्रति 1,000 बच्चियों पर 71 थी.
गगन बताते हैं कि दुनिया में कई देश हैं जहां लड़कों के मुकाबले लड़कियां कम मरती हैं.
वो कहते हैं, "भारत की प्रोग्रेस अच्छी है. आने वाले समय में आंकड़े और बेहतर होने की उम्मीद है. इसके लिए सतत प्रयास की ज़रूरत है. गर्ल चाइल्ड के लिए और ज़्यादा काम करने की ज़रूरत है. साथ ही नवजात पर और फ़ोकस करने की ज़रूरत है क्योंकि 2017 में भारत में मरने वाले 9 लाख 89 हज़ार बच्चों में से 6 लाख 5 हज़ार नवजात बच्चे थे."
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