16 साल में 16 बच्चे पर बचे केवल दो, क्यों?

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
जनक देवी बिहार के जहानाबाद ज़िले के रानीपुर गांव में रहती हैं.
जनक ने 16 बच्चों को जन्म दिया, बचे केवल दो. जनक देवी के 14 बच्चों में से आधे या तो मरे पैदा हुए या पैदा होने के बाद तुरंत मर गए.
उनकी कहानी भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर का एक पहलू सामने रखता है.
एक ख़ास रिपोर्ट

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जनक की उम्र 40 साल है पर वो 70 साल से कम की नहीं नज़र आती हैं.
शरीर पर मांस उतना ही है जितना हड्डियों के ढांचे को ढंकने के लिए ज़रुरी है.
जनक देवी की ऐसी हालत 16 बच्चों को जन्म देने के कारण. जिनमें से बचे केवल दो.
जनक देवी के चौदह बच्चों में से आधे या तो मरे पैदा हुए या पैदा होने के बाद तुरंत उनकी मौत हो गई. उन्हें याद नहीं कि मौतें की क्या वजह थीं.
उन्हें बस इतना याद है कि हर मौत के बाद वो खुद मौत के मुंह मे चली जाती थीं.
नहीं अपनाए गर्भनिरोधक

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संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा मिनेनियम डेवलेपमेंट गोल रिपोर्ट के अनुसार भारत में पांच साल तक के बच्चों की सबसे ज़्यादा मौत होती है.
जनक देवी ने सितंबर, 2008 में पंद्रहवें बच्चे को जन्म दिया था और अंतिम बार वह जनवरी, 2012 में मां बनी थीं. ये दोनों बच्चे जीवित बच गए.
जनक को गर्भनिरोधक साधनों की जानकारी थी लेकिन बच्चे की चाह में उन्होंने इसे नहीं अपनाया.
बीते सालों को याद करते हुए वह कहती हैं, "मेरे पास और कोई चारा नहीं था. बच्चों की मौत के बाद खाना-पीना तक छूट जाता था."
दूसरी पत्नी

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जनक बताती हैं, "सब उलाहना मारते थे कि तुमसे बच्चा नहीं बचता है तो चली जाओ मायके."
ऐसे में जनक ने यह रास्ता निकाला कि वह पति की दूसरी शादी में आड़े नहीं आईं पर अपना घर भी नहीं छोड़ा. जनक के पति गनौरी साह जहानाबाद में रिक्शा चलाते हैं.
हालांकि गनौरी की दूसरी पत्नी कभी मां नहीं बन सकीं और कुछ सालों पहले बीमारी से उनकी मौत हो गई.
जनक का मामला कम उम्र में शादी, प्रसव और उसके पहले और बाद में गर्भवती महिलाओं और नवजात की देख-रेख में कमी, कुपोषण आदि से जुड़ा हुआ है.
शिशु मृत्यु दर

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जन स्वास्थ्य अभियान के संयोजक डॉक्टर शकील नवजात की मौतों के लिए कुपोषण को बड़ा कारण मानते हैं.
"बिहार में कुपोषण के स्तर और खाद्य सुरक्षा का सवाल सुलझता हुआ नजर नहीं आ रहा है. ऐसे में सिर्फ मेडिकल हस्तक्षेप से शिशु मृत्यु दर को नहीं घटाया जा सकता."
शिशु मृत्यु दर की बात करें तो हाल के कुछ सालों में बिहार ने इस स्वास्थ्य मानक पर अपेक्षित सुधार करते हुए राष्ट्रीय औसत की लगभग बराबरी कर ली है.
ताज़ा सरकारी आंकड़ो के अनुसार बिहार में शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत 40 के मुकाबले 42 है.
बढ़ी कोशिशों के बावजूद बिहार कई दूसरे राज्यों के मुकाबले यह अब भी बहुत पीछे है.
नियमित टीकाकरण

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पूरी दुनिया के लिए बच्चों की मरने की संख्या पर काबू पाना मिलेनियम डेवलेपमेंट के आठ लक्ष्यों में से एक है.
भारत मे स्थिति बेहतर हुई है लेकिन 2015 में जब इन लक्ष्यों के पूरे किए जाने की मियाद खत्म हो जाएगी तो क्या भारत में बिहार जैसा राज्य ये कह पाएगा कि अब 'जनक देवी' हमारे यहां नहीं होती हैं?
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