नसबंदी से तबाह, अब मुआवज़े को लेकर बंटे

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर नसबंदी कांड में 10 से 15 नवंबर के बीच 13 महिलाओं की मौत हो गई थी. इन सबके परिजनों को सरकार ने चार-चार लाख रुपए का मुआवजा बांटा है.
साथ ही मृतक महिलाओं के प्रत्येक बच्चे के नाम से तीन-तीन लाख रुपए के फिक्स्ड डिपॉज़िट करने का भी काम सरकार ने शुरू किया है.
यही मुआवजा और फिक्स्ड डिपॉज़िट, अब परिवारों के बीच झगड़े का कारण बन गया है. मायके और ससुराल वाले एक-दूसरे के आमने-सामने आ गए हैं.
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बिलासपुर के नसबंदी कांड में मारी गई महिलाओं के परिवारों में अब फूट पड़ने लगी है.
मुआवजे की रक़म क्या बंटी, परिवार बंटने लगे हैं. कल तक जो दामाद आंखों का तारा था, वह अब फूटी आंख नहीं सुहा रहा है.
बच्चों को चाची, ताई, बुआ और दादी पालना चाहती हैं तो अपनी मृतक बेटी-बहन का हवाला देकर नानी, मौसी और मामियां भी बच्चों को उनके हवाले करने की मांग कर रहे हैं.

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अपनी बेटी को खोने वाली एक महिला से हमारी मुलाक़ात 14 नवंबर को जब पहली बार हुई थी तो उनके पास अपने दामाद की प्रशंसा के दर्जनों उदाहरण थे. तब तक मृतक बेटी का एक बच्चा उन्हीं के पास था.
जिस दिन मुआवजा बंटा, उसके अगले ही दिन दामाद ससुराल पहुंच कर बच्चे को लेकर चलता बना.
हमने जब इस सप्ताह उस महिला से दोबारा मुलाक़ात की तो दामाद को लेकर वो फट पड़ीं.
उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, "पक्के से जानती हूं कि उसके मन में क्या चल रहा है. मुझे तो पहले से ही शक था. पैसा मिल गया है, अब वो दूसरी शादी करेगा."
परिवारों की चिंता

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मारी गई महिलाओं के मायके वालों में से अधिकांश को इस बात की आशंका सता रही है कि महिलाओं के पति साल-दो साल के भीतर दूसरी शादी कर लेंगे, क्योंकि बहुत से पतियों की उम्र 35 साल से कम है.
इसके अलावा जिस समाज से वे आते हैं, वहां दोबारा शादी भी मान्य है.
दूसरी ओर, मारी गई महिलाओं के पति ऐसी आशंकाओं को क्रूर बताते हुए यही दावा करते हैं कि अब तो सारा समय इन बच्चों को पालने में ही जाएगा.
अपने चार महीने के बच्चे को गोद में संभाले जगदीश निर्मलकर की ढाई साल की एक और बेटी है. दोनों बच्चे अब उनके ही पास हैं.
वे कहते हैं, "बच्चों को संभालूं कि रोजी-मज़दूरी करूं. अब तो मेरे पास केवल यही चारा है कि मुआवजे की रक़म से कोई काम-धाम शुरू करके बच्चों का भविष्य बनाऊँ."
चेक और बच्चे

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कोटा इलाके के रामस्वरूप के तीन बच्चे हैं. पत्नी शांति की मौत के बाद उनके ससुर गोकुल मरकाम तीनों बच्चों को अपने साथ लेकर चले गए थे. दो लाख रुपए का चेक भी ससुर के पास ही था.
बाद में दो बच्चों को रामस्वरूप अपने साथ लेकर आ गए. लेकिन एक बच्चा और चेक ससुर के पास ही रह गया. ससुर का कहना है कि बच्चा अपने दादा-दादी के पास रहेगा.
रामस्वरूप कहते हैं, "ससुर चाहते हैं कि मैं अपना बैंक खाता उनके गांव के पास के बैंक में खुलवाऊँ, जिससे वे इस बात की खोज-खबर लेते रहें कि मैं बैंक से कितनी रक़म निकाल रहा हूं, पैसों का क्या कर रहा हूं"
टूट का ख़तरा

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सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण पटेल का कहना है कि मुआवजे के कारण कई परिवार टूट सकते हैं. कल तक एक साथ रहने वाले बच्चे नाना-नानी और दादा-दादी के यहां बंट गए हैं.
प्रवीण पटेल कहते हैं, "यह समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं, जिसमें बच्चों का भविष्य मुश्किल में नज़र आ रहा है. परिवार के साथ ही समाज को भी इस मुद्दे पर संवेदनशील होकर पहल करनी चाहिए."
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