नज़रिया: एमपी में 'शिवभक्त' राहुल गांधी मुद्दों पर मौन क्यों हैं

राहुल गांधी

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    • Author, रशीद किदवई
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मौजूद लाल घाटी के विश्वकर्मा मंदिर में हर साल पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार धार्मिक समारोह होते हैं.

शंख बजने की आवाज़ के बीच कन्या पूजन के लिए 21 कन्याएं एक कतार में खड़ी होती हैं और मंत्रोच्चार की आवाज़ें आती हैं.

लेकिन सोमवार की दोपहर ऐसा कुछ नहीं हुआ. एक 'शिवभक्त' मंदिर में दाख़िल हुए और उन्होंने विस्तृत रूप से पूजा की.

मध्य प्रदेश में इस साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. इसी के मद्देनज़र वहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का रोडशो रखा गया था जो सफल भी रहा.

गांधी परिवार से जुड़े इस युवा नेता को देखने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग जुटे जो वहां औपचारिक तौर पर चुनाव अभियान का बिगुल बजाने के लिए पहुंचे थे.

राहुल ने अपनी भोपाल यात्रा की शुरुआत की पीर गेट पर मौजूद 'राजू टी स्टॉल' से जहां रुककर उन्होंने चाय और पकौड़े खाए.

अपनी बनाई चाय की प्रशंसा पाने वाले चाय की दुकान के मालिक फ़रीद आरबीआई गवर्नर बिमल जालान के हस्ताक्षर वाला एक नोट गर्व से दिखाते हैं.

कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, दिल्ली में 14 सितंबर 2018 को हुआ कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन

कांग्रेस की सूची से मुद्दे ग़ायब?

आमतौर पर जब किसी राज्य में चुनाव नज़दीक आ रहे हों तो चर्चा का विषय होता है मौजूदा मुख्यमंत्री ने क्या किया और क्या नहीं कर पाए, ख़ासकर तब जब वो वहां 13 साल तक शासन कर चुके हों.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने कई मुद्दे हैं जो सरकार की नाकामी दिखाते हैं, जैसे कि अपराधों की बढ़ती संख्या, ख़ासकर महिला और बच्चों कि ख़िलाफ़ होने वाले अपराध.

हाल में करोड़ों का व्यापमं घोटाला सामने आया था जिसने कई युवाओं से मेडिकल कॉलेज में दाख़िले और सरकारी नौकरियों में उनका हक़ छीन लिया था.

व्यापमं घोटाला

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हाल में एक ई-टेंडर घोटाला सामने आया था जिसमें कथित तौर पर ठेकेदारों और नौकरशाहों के बीच एक आपराधिक सांठ-गांठ होने की बात सामने आई थी जिसका असर वास्तविक व्यापारियों और उद्यमियों पर पड़ रहा था.

लेकिन इन सब मुद्दों के होने के बावजूद भोपाल में जो होर्डिंग्स राहुल की यात्रा के दौरान देखे गए उनमें तिलकधारी 'शिवभक्त' राहुल गांधी दिखाई दे रहे थे.

धर्म के लिए कांग्रेस का जुनून कोई नई बात नहीं है, ख़ासकर राज्य में बहुसंख्यक समुदाय से नज़दीकी बनाने के लिए ये नया नहीं है.

1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने फ़ैज़ाबाद में सरयू नदी के तट से अपने लोकसभा के चुनावी अभियान की शुरुआत की थी. उनका वादा राम राज्य का था.

राजीव गांधी चुनाव हार गए थे, जिसके बाद वीपी सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार ने सत्ता संभाली थी. इस गठबंधन सरकार को बीजेपी और वामपंथी दलों का समर्थन प्राप्त था.

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भारत बंद के दौरान आगज़नी

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जाति विवाद और शिवराज चौहान की मुश्किलें

फिर से सत्ता में आने के लिए मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लड़ाई एक अकेले योद्धा की लड़ाई लगती है.

उनकी जन आशीर्वाद यात्रा के लिए प्रभात झा को छोड़कर बीजेपी का कोई वरिष्ठ नेता या केंद्रीय मंत्री उनके साथ मंच पर नहीं पहुंचा है.

यात्रा में नहीं आने वालों की सूची कहीं लंबी है जिसमें केंद्रीय मंत्रियों और बीजेपी पार्टी कार्यकर्ताओं के नाम शामिल हैं, जैसे नरेंद्र सिंह तोमर, थावरचंद गहलोत, उमा भारती, कैलाश विजयवर्गीय और कई अन्य.

हाल में चौहान की लोकप्रियता घटी है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में हालिया संशोधनों पर राज्य में दोतरफ़ा नाराज़गी है.

ताक़तवर ऊंची जाति के लोग पहले ही अनुसूचित जाति और जनजाति के सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण का विरोध कर रहे हैं.

ये लोग मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार के एससी-एसटी क़ानून में बदलाव लाने के फ़ैसले से ख़फ़ा हैं जिसके तहत एससी या एसटी समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ अत्याचार के मामले में किसी के लिए अग्रिम ज़मानत के प्रावधान को ख़त्म कर दिया गया है.

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अनुसूचित जाति और जनजाति के ख़िलाफ़ अत्याचार निवारण क़ानून में बदलाव का विरोध

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जाति विवाद के इस मुद्दे को इस तरह से साफ़ देखा जा सकता है कि हाल में सवर्णों के द्वारा आयोजित भारत बंद में कुछ प्रदर्शनकारियों ने जो टी-शर्ट पहनी थी उन पर 'हम हैं माई के लाल' लिखा था.

'हम हैं माई के लाल'- इस नारे को जून 2016 के उस मौके के संदर्भ में देखा जा सकता है जब शिवराज सिंह चौहान ने आरक्षण नीति की किसी भी तरह की समीक्षा से इनकार कर दिया था और एक योद्धा की तरह कहा था 'कोई माई का लाल आरक्षण ख़त्म नहीं कर सकता. (नौकरियों में आरक्षण ख़त्म नहीं हो सकता.)'

लेकिन जाति विवाद में एक मुश्किल स्थिति तब बन गई जब केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर बीजेपी की सरकार है और वायदों के पूरे होने में देरी या ना पूरे होने की गुंजाइश कम है.

जाति विवाद बढ़ा तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मध्य प्रदेश में 12 सितंबर से शुरू होने वाले अपने राजनीतिक कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया.

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किसानों की कर्ज़माफ़ी

किसान भी बन सकते हैं मुसीबत का कारण

मध्य प्रदेश के लिए कृषि उसकी जीवनरेखा है. यहां की आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा कृषि या कृषि संबंधित गतिविधियों पर ही निर्भर करता है.

इस साल जून में यहां खेती से जुड़े कई प्रमुख ग़ैर-सरकारी संगठनों ने सफल 'गांव बंद' आंदोलन का आयोजन किया. उन्होंने विरोध जताने के लिए खेतों में होने वाले उत्पादन को गांव से बाहर बेचना पूरी तरह बंद कर दिया.

इनमें खेती से जुड़े कुछ संगठनों ने अब 'नवंबर 2018' में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र 'वोट बंद' की धमकी भी दी है.

देश के 100 से अधिक किसान संगठनों का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रीय किसान मज़दूर महासंघ ने 'गांव बंद' आंदोलन में हिस्सा लिया था.

किसानों की नाराज़गी को वोट में तब्दील करने के लिए कांग्रेस महासंघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा कक्काजी, केदार सिरोही या अन्य किसी ताक़तवर किसान नेता के संपर्क में नहीं हैं.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस को बहुजन समाज पार्टी के साथ अपने गठबंधन को जल्द ही मज़बूत करने की ज़रूरत है क्योंकि यहां लगभग 40 ऐसी सीटें हैं, जहां बसपा का वोट बैंक है.

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किसानों का आंदोलन

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इमेज कैप्शन, बीते साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों का आंदोलन उग्र हो गया था जिसके बाद पुलिस ने फ़ायरिंग की थी. इसमें कम से कम 5 किसानों समेत 6 लोगों की मौत हो गई थी.

संजीवनी का काम कर सकता है मध्यप्रदेश

मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. ये नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए को हराने के लिए राहुल गांधी का मनोबल बढ़ाने का काम कर सकते हैं.

रही बात लोकसभा चुनावों की तो ये भी राज्यों में ही लड़े जाएंगे. लोकसभा की सभी 543 सीटें राज्यों में ही तो हैं.

राहुल गांधी

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1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सत्तारुढ़ बीजेपी सरकार को हराने में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन एक अच्छा उदाहरण रहा है.

तेलंगाना में टीडीपी, कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस के साथ में आने के फ़ैसले को अवसरवाद कहा जा सकता है लेकिन यह राजनीति की भाषा में व्यावहारिक है.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी और उनके काम करने का तरीक़ा, ममता बनर्जी, वाम दलों, कांग्रेस, चंद्रबाबू नायडू और अलग-अलग विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के साथ आने का एक उत्तम समय है.

लेकिन इसके लिए राहुल गांधी को मंदिर-मंदिर घूमने और चाय पीने की बजाए इन मुद्दों को समझना और उठाना होगा.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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