केरल में आई बाढ़ इतनी विनाशकारी कैसे बन गई

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    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

केरल में पिछले हफ़्ते आई विनाशकारी बाढ़ से ठीक एक महीने पहले एक सरकारी रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी कि यह राज्य जल संसाधनों के प्रबंधन के मामले में दक्षिण भारतीय राज्यों में सबसे ख़राब स्तर पर है.

इस अध्ययन में हिमालय से सटे राज्यों को छोड़कर 42 अंकों के साथ उसे 12वां स्थान मिला है. जल संसाधनों के प्रबंधन के मामले में 79, 69 और 68 स्कोर के साथ गुजरात, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश शीर्ष तीन राज्य हैं.

इस लिस्ट में केरल से भी नीचे के पायदान पर चार गैर-हिमालयी, हिमालयी और चार पूर्वोत्तर राज्य हैं.

ऐसा लगता है कि एक महीने बाद ही केरल में इस अध्ययन के परिणाम भी मिलने लगे हैं.

अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रशासन कम से कम 30 बांधों से समयबद्ध तरीके से धीरे-धीरे पानी छोड़ता तो केरल में बाढ़ इतनी विनाशकारी नहीं होती.

जब पिछले हफ़्ते बाढ़ उफान पर था, तब 80 से अधिक बांधों से पानी छोड़ा गया. इस राज्य में कुल 41 नदियां बहती हैं.

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क्यों स्थिति और ख़राब हुई?

दक्षिण भारत की नदियों पर बांध के नेटवर्क के विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर कहते हैं, "यह स्पष्ट है कि केरल के प्रमुख बांधों जैसे इडुक्की और इडामाल्यार से पानी छोड़े जाने से पहले से भारी बारिश में घिरे केरल में बाढ़ की स्थिति और भी ख़राब हो गई है."

वीडियो कैप्शन, केरल में कैसी है बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों की स्थिति?

वो कहते हैं, "इससे बचा जा सकता था, यदि बांध ऑपरेटर्स (संचालक) पहले से ही पानी छोड़ते रहते ना कि उस वक्त का इंतजार करते कि बांध में पानी पूरी तरह से भर जाए और उसे बाहर निकालने के अलावा कोई और चारा न रह जाए."

"यह भी स्पष्ट है कि केरल में बाढ़ आने से पहले ऐसा काफी वक्त था जब पानी को छोड़ा जा सकता था."

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इस साल की शुरुआत में केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक आंकलन में केरल को बाढ़ को लेकर सबसे असुरक्षित 10 राज्यों में रखा गया था.

देश में आपदा प्रबंधन नीतियां भी हैं लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बावजूद केरल ने किसी भी ऐसी तबाही के ख़तरे को कम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए.

जबकि राज्य प्रशासन को उनके बेअसर बांध प्रबंधन और आपदा के ख़तरों को कम करने के लिए अपर्याप्त कामों की आलोचना की गई है, वहीं केंद्र के कामों की भी कोई अच्छी ख़बर नहीं है.

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केंद्रीय जल आयोग

विशेषज्ञ कहते हैं, "केरल को केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) से पहले बाढ़ की चेतावनी नहीं दी गई थी जो इसके लिए अधिकृत एकमात्र सरकारी एजेंसी है."

ठक्कर ने कहा, "भीषण बाढ़ और उस पर बांध से पानी का छोड़ा जाना केंद्रीय जल आयोग के पूर्वानुमानों और इस पर पहले से की गई उसकी कार्रवाई पर प्रश्न उठाता है."

हम यह जान कर चौंक गए कि केंद्रीय जल आयोग के पास कोई पूर्वानुमान साइट नहीं है, ना तो पानी के स्तर को लेकर और ना ही पानी का बहाव कितना है इसे लेकर.

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ठक्कर कहते हैं, "केरल में इसकी केवल बाढ़ निगरानी साइटें हैं. वक्त आ गया है कि केंद्रीय जल आयोग इडुक्की और इडामाल्यार जैसे कुछ प्रमुख बांधों को भी शामिल करे."

हालांकि राज्य बाढ़ रोकने के उपायों को लेकर बहुत ढीला पड़ गया, लेकिन बात यह भी उतनी ही सच है कि इस साल मानसून में हुई बारिश भी खास तौर पर कहीं अधिक हुई है.

पहले के वर्षों में चार महीने के दौरान जितनी बारिश होती रही है, इस बार केवल ढाई महीने में ही इससे 37 फ़ीसदी अधिक बारिश हुई है.

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...तो दोबारा आ सकती है इतनी बड़ी बाढ़

इतने कम समय में इस तरह की भारी बारिश के कारण राज्य में भूस्खलन भी हुए जिसमें कई लोगों की मौत हुई है. पर्यावरणविद इसके लिए जंगलों की कटाई को दोष दे रहे हैं.

भारत के उन दूसरे हिस्सों में भी जहां वनों की कटाई की गई है, वहां बहुत कम समय में भारी बारिश की वजह से पहले भी तबाही मची है.

इनमें से कुछ जगहें तो नितांत असहाय हैं क्योंकि तेज़ी से होते शहरीकरण और बुनियादी ढांचों के निर्माण की वजह से बाढ़ की विभीषिका से प्राकृतिक तौर पर रक्षा करने वाली दलदली ज़मीनें और झीलें गुम होती जा रही हैं. ठीक ऐसा ही 2015 में चेन्नई में हुआ था.

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लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि, इस बार केरल में आई बाढ़ ने आपदा के नए आयाम को जोड़ा है- और ये है बांधों से ख़तरा.

अगर इनका संचालन अच्छे से नहीं किया गया और बारिश लगातार जारी रहती है तो जलवायु परिवर्तन वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी के मुताबिक सौ वर्षों बाद आई यह आपदा निकट भविष्य में दोबारा आ सकती है.

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