इस साल कितनी चाक चौबंद है अमरनाथ यात्रा

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भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच इस साल की अमरनाथ यात्रा शुरू हो चुकी है.
यात्रा की शुरुआत करते हुए 2,995 तीर्थ यात्रियों का पहला जत्था अमरनाथ गुफा के लिए रवाना हो चुका है.
नुनवान के बेस कैंप से ये यात्रा पहलगाम के लिए रवाना हो चुकी है. इस जत्थे में 2,334 पुरुष, 520 महिलाएं, 21 बच्चे और 120 साधु शामिल हैं.
पहलगाम से ये दस्ता अमरनाथ गुफा के लिए रवाना हुआ. हालांकि भारी बारिश के चलते अमरनाथ यात्रा फिलहाल रोक दी गई है.
इस साल ये यात्रा 26 अगस्त रक्षा बंधन तक चलेगी. इस यात्रा के लिए अब तक दो लाख से ज़्यादा तीर्थयात्रियों ने पंजीकरण कराया हुआ है. पिछले साल दो लाख साठ हज़ार यात्रियों ने अमरनाथ की यात्रा की थी.

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माना जा रहा है कि इस बार तीर्थ यात्रियों की संख्या पिछले साल की तुलना में बढ़ सकती है. इसकी एक बड़ी वजह ये मानी जा रही है कि इस बार अमरनाथ यात्रा 60 दिनों तक रोजाना चलेगी, जबकि बीते सालों में ये यात्रा 45 दिनों तक चला करती थी.
इसके बावजूद सबसे ज़्यादा तीर्थयात्रियों के रिकॉर्ड तक पहुंचना बेहद मुश्किल लक्ष्य है क्योंकि सबसे अधिक संख्या में यात्रियों के अमरनाथ यात्रा पर जाने का रिकॉर्ड छह लाख तीस हज़ार रहा है, जो साल 2011 में बना था.
इसके बाद हर साल तीर्थयात्रियों की संख्या में गिरावट देखने को मिली है. वैसे दिलचस्प तथ्य ये भी है कि 1990 तक अमरनाथ यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या 10 हज़ार से 15 हज़ार के बीच होती थी.
90 के दशक में भारत में शुरू हुए उदारवाद ने भारत के तीर्थ स्थानों से जुड़े पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा दिया.

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क्या है सुरक्षा व्यवस्थाएं
सरकार ने हर साल की तरह इस बार सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए हैं. इस साल की यात्रा को कामयाब बनाने के लिए करीब 40 हज़ार पुलिसकर्मियों की तैनाती हुई है.
ये व्यवस्था कितनी ज़्यादा है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले साल करीब 14 हज़ार जवानों को तीर्थयात्रियों की सुरक्षा में तैनात किया गया था.
इसमें जम्मू-कश्मीर पुलिस, पैरामिलिट्री, नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स और सेना के जवानों की तैनाती की गई है.
यात्रा के शुरू होने से एक दिन पहले जम्मू के आईजी पुलिस एसडी सिंह जामवाल ने पुलिस, सेना, पैरामिलिट्री और खुफ़िया एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक करके इस यात्रा के सुरक्षा को हाई अलर्ट में रखे जाने के संकल्प को दोहराया है.

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इस यात्रा की ख़ास बातें
ऐसा पहली बार हुआ है कि अमरनाथ यात्रा में शामिल वाहनों को ट्रैक करने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं सीआरपीएफ़ ने अपने मोटर साइकिल दस्ते को कैमरा और अन्य जीवनरक्षक उपकरणों से लैस किया है.
जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से पिछले कुछ महीनों में चरमपंथी घटनाएं देखने को मिली हैं, उससे इस यात्रा को चरमपंथियों द्वारा निशाने बनाए जाने की आशंका जताई जा रही है, जिसको लेकर स्थानीय पुलिस प्रशासन से लेकर ख़ुफ़िया एजेंसियां तक कोई चूक नहीं करना चाहती हैं.

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बेहद मुश्किल होती है यात्रा
अमरनाथ गुफ़ा 12,720 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां केवल पैदल या फिर खच्चर के सहारे ही पहुंचा जा सकता है. अमरनाथ यात्रा करने वालों के लिए दो रूट हैं, एक पहलगाम के रास्ते से जाता है जबकि दूसरा बालटाल के.
पहलगाम के रास्ते से जाने पर ये अमरनाथ गुफ़ा करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहां पहुंचने पर अमूमन तीर्थयात्रियों को तीन से पांच दिन का वक्त लगता है.
जबकि बालटाल के रास्ते से यह महज 16 किलोमीटर की दूरी है, लेकिन सीधी और खड़ी चढ़ाई होने के चलते ये रास्ता बेहद मुश्किल माना जाता है.

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अमरनाथ यात्रा पर जाने वालों से एक महीने पहले रोजाना पांच किलोमीटर पैदल चलने के अभ्यास के लिए कहा जाता है, इसके अलावा गहरी सांस लेने का अभ्यास और प्राणायाम योग करने की सलाह भी दी जाती है.
छह हफ़्ते से अधिक गर्भ वाली महिलाओं, 13 साल से कम उम्र के बच्चों और 75 साल से ज़्यादा के बुजुर्गों को इस यात्रा की इजाजत नहीं दी जाती है.
इस यात्रा के दौरान महिलाओं को साड़ी नहीं पहनने की सलाह दी जाती है, जबकि सभी से फीते वाले जूते पहनने की अपेक्षा की जाती है.

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अमरनाथ यात्रा क्यों अहम है?
अमरनाथ गुफ़ा को हिंदू काफी पवित्र मानते हैं, इसकी वजह ये है कि इसे शिव भगवान से जोड़कर देखते हैं. शिव, हिंदुओं के तीन बड़े देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश में एक हैं.
दरअसल, अमरनाथ गुफ़ा की छत से बूंद बूंद पानी टपकता है, जो फ्रीजिंग पॉइंट पर जमते हुए एक विशालकाय कोन की आकार की आकृति बनाता है, जिसे हिंदू शिव लिंग का रूप मानते हैं.
इस गुफ़ा तक की यात्रा को ही अमरनाथ यात्रा के तौर पर जाना जाता है जो हर साल जुलाई-अगस्त के महीने में होती है. यह यात्रा व्यास पूर्णिमा को शुरू होती है और रक्षा बंधन यानी सावण पूर्णिमा को समाप्त होती है.
दक्षिण कश्मीर में स्थित इस गुफ़ा तक पहुंचने के लिए यात्रियों को पहलगाम, चंदनवारी, पीसू घाटी, शेषनाग और पंजतारिणी से होकर गुजरना पड़ता है.

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अमरनाथ यात्रा से जुड़ी कहानियां
अमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड की अपनी एक वेबसाइट है, इस वेबसाइट के मुताबिक अमरनाथ गुफ़ा को लेकर कई दिलचस्प कहानियां हैं.
ये बताया गया है कि एक बार पार्वती ने शिव से उनके अमर होने का रहस्य पूछ लिया. उसे बताने के लिए शिव को एक निर्जन स्थान तलाशना पड़ा ताकि उनकी बातों को कोई सुन न सके.
अमर होने के अपने रहस्य को सुनाने के लिए उन्होंने अमरनाथ गुफ़ा का चयन किया. अमरनाथ जाने के रास्ते में उन्होंने अपने नंदी बैल को पहलगाम में छोड़ा, फिर चंदनवारी में उन्होंने अपनी जटाओं से चांद को मुक्त किया, शेशनाग में उन्हें गले के सांप को छोड़ दिया. उन्होंने बेटे गणेश को महागणेश पर्वत पर छोड़ा.
जीवन के लिए आवश्यक पांच तत्व (ज़मीन, जल, वायु, अग्नि और आकाश) को उन्होंने पंजतारिणी में छोड़ा. अमरनाथ गुफ़ा में पहुंच कर उन्होंने पार्वती को अपने अमर होने का रहस्य सुनाया था.

अमरनाथ गुफ़ा को लेकर एक और पौराणिक कथा है कि प्राचीन काली में कश्मीर की घाटी पूरी तरह से जलमग्न थी. तब कश्यप मुनि ने अलग अलग नदी और नाले निकालकर पानी को बाहर निकाला. उसी दौरान भृगु ऋषि हिमालय की यात्रा करने निकले थे और उन्होंने अमरनाथ की गुफ़ा को सबसे पहले देखा था.
इस गुफ़ा का ज़िक्र करीब छठी शताब्दी में लिखी गई भृगु संहिता, नीलमाता पुराण और अमरनाथ महामात्य में मिलता है.
इनके अलावा अमरनाथ गुफ़ा का ज़िक्र कई अन्य जगहों पर भी देखने को मिलता है. मसलन जम्मू कश्मीरी लेखक कल्हण की राजतरंगिणी (11वीं शताब्दी) और अबुल फ़ज़ल की आइने अक़बरी (वॉल्यूम तीन- 16वीं शताब्दी) में भी देखने को मिलता है.

हिंदू तीर्थ का मुसलमान कनेक्शन

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वैसे आधुनिक तौर पर अमरनाथ गुफ़ा की खोज का श्रेय एक मुस्लिम बूटा मलिक को जाता है. बूटा मलिक परिवार से जुड़े गुलाम हसन मलिक ने बीते साल बीबीसी हिंदी के लिए माजिद जहांगीर को अपने पूर्वज और अमरनाथ यात्रा से जुड़ी पूरी कहानी बताई थी.
गुलाम हसन मलिक के मुताबिक, 'हुआ ये था कि हमारे पूर्वज थे बूटा मलिक. वो गड़रिए थे. पहाड़ पर ही भेड़-बकरियां वगैरह चराते थे. वहां उनकी मुलाकात एक साधु से हुई और दोनों की दोस्ती हो गई.'
'एक बार उन्हें सर्दी लगी तो वो उस गुफ़ा में चले गए. गुफ़ा में ठंड लगी तो साधु ने उन्हें एक कांगड़ी (कश्मीर में कोयले की आग रखने वाली टोकड़ी) दिया जो सुबह में सोने की कांगड़ी में तब्दील हो गया.'
मलिक बताते हैं कि सुनी सुनाई बातों के अनुसार जब बूटा मलिक गुफ़ा से निकले, तो उन्हें ढेर सारे साधुओं का एक जत्था मिला जो भगवान शिव की तलाश में घूम रहे थे. बूटा मलिक उन साधुओं को जब गुफ़ा में ले गए तो वहां बर्फ का विशाल शिवलिंग मिला. फिर उन्होंने एहसास हुआ कि वे जिस साधु से मिले वो साक्षात शिव थे.
उनका दावे में सच्चाई भले ना रही हो लेकिन उन्होंने दुनिया को अमरनाथ गुफ़ा की अहमियत के बारे में बताया, यही वजह है कि उनके गुजरने के बाद भी उनके परिवार को अमरनाथ गुफ़ा को चढ़ाए जाने वाले चढ़ावा का कुछ हिस्सा जाता रहा है.
वैसे अमरनाथ यात्रा की शुरुआत कब हुई, इसको लेकर कोई विश्वसनीय जानकारी मौजूद नहीं है. लेकिन हर साल तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अमरनाथ श्राइन बोर्ड का गठन 2000 में किया गया, जो अमरनाथ यात्रा की पूरी व्यवस्था को सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर करता है. श्राइन बोर्ड के चेयरमैन राज्य के राज्यपाल एनएन वोहरा हैं.
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