BBC SPECIAL: कठुआ गैंगरेप केस- 'हम अपनी बेटी को कब्रिस्तान में दफ़न भी नहीं कर पाए'

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, उधमपुर (जम्मू-कश्मीर) से
सवाल... एक मां के सैकड़ों सवाल, सवाल उस मां के जिसकी आठ साल की बेटी से सामूहिक बलात्कार कर गला घोंट दिया गया, सवाल उस मां के जिसकी बच्ची के साथ किए गए अपराध ने मज़हबी लक़ीरों को और गहरा कर दिया है.
'बच्ची हमारी... उसने क्या खाया था?क्या गुमाया था उसने?क्या चोरी किया था? उन्होंने क्यों मारा?'
'उधर दूर से ले गया. पता नहीं गड्डी में ले गये,पता नहीं कैसे उठा के ले गया,पता नहीं किस तरह मारा?...'
'हमको यही अफ़सोस है... मारा किस तरह से मारा उसे'
सवाल हैं कि रुकते नहीं. एक के बाद एक.
या एक मां के कोमल दिल की गहराइयों से फूट पड़ता दर्द!

उधमपुर के दूघर नाला की पहाड़ियों पर जब वो हमपर सवालों की झड़ियां लगा रही होती हैं तो मेरे ज़हन में आठ साल की बलात्कार का शिकार हुई उनकी बेटी का चेहरा आ जाता है.
बिल्कुल मां जैसी शक़्ल, वैसी ही बड़ी-बड़ी चमकती आंखें, गोरा रंग.
जब सेकंड भर में ध्यान वहां लौटा तो वो बता रही होती हैं, "बहुत शक्लदार थी मेरी बेटी, ख़ूबसूरत थी, चालाक थी. होशियार थी, चलती थी (जंगलों में जाकर) वापस भी आ जाती थी."

"लेकिन उस दिन नहीं आई और फिर हमको उसकी लाश मिली."
पास में भेड़, बकरियां और गायें घूम रही हैं. बकरवाली कुत्ते रात की ठंड के बाद जंज़ीरों में बंधे पड़े धूप सेंक रहे हैं. घोड़े अपने बच्चों के साथ चराई कर रहे है.

उसे भी घोड़ों का बहुत शौक़ था. उसकी बहन ने बताया कि उसे खेलने का शौक था और वो बहुत अच्छे से सवारी कर सकती थी घोड़ों की.
घोड़ा ही चराने तो गई थी उस दिन कठुआ के जंगलों में वो, जब उसे अग़वा कर लिया गया और सात दिनों तक सामूहिक बलात्कार के बाद लाश जंगल में फेंक दी गई.

दुख में डूबी मां बताती हैं, "पहले तीन बेटियां थीं मेरी, अब दो ही रह गई हैं."
उस बेटी को उन्होंने भाई को दे दिया था, भाई की बेटी की एक हादसे में मौत के बाद.
हादसे के वक़्त पीड़िता के असली माता-पिता सांबा में डेरा डाले थे. उनकी गोद ली बच्ची अपने मामू के साथ कठुआ में उस गांव में रह रही थी.

सात दिनों के बाद भी शव मिलने और उसे हासिल करना कोई आसान काम नहीं था.
पिता बताते हैं, "पुलिसवाले कहने लगे कि आपके बकरवालों में से ही किसी ने मारा होगा. वो कह रहे थे गांववाले तो ऐसा बुरा काम नहीं कर सकते."

शलवार जंपर पहने और हरी शाल ओढ़े बच्ची की मां कहती हैं, "अपनी मौत मर जाती तो सबर कर लेते. बोलते मर गया अपने से. दुनिया मरती है वो भी मर गई."
क्रीम-कलर की शलवार-क़मीज़ पहने और चेक गमछे की पगड़ी बांधे पीड़िता के पिता बताते हैं, ''हम अपनी बेटी को अपने क़ब्रिस्तान में दफ़न भी नहीं कर पाये. उसे हमें रात में ही दूसरे गांव ले जाना पड़ा.''
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