उप-चुनाव में इनकी नाराज़गी गेमचेंजर हो सकती है

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, फूलपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के लिए हो रहे उप-चुनाव में जातीय और धार्मिक समीकरणों की तो जमकर चर्चा हो रही है लेकिन एक ऐसा बड़ा तबका भी ख़ामोशी से बैठा है जो चुनाव में इन नेताओं को 'सबक' सिखाने के मूड में है.
प्रतियोगी परीक्षाओं में हो रही कथित धांधली के ख़िलाफ़ जहां दिल्ली में छात्र आंदोलनरत हैं. वहीं, पिछले क़रीब एक हफ़्ते से इलाहाबाद में कर्मचारी चयन आयोग यानी एसएससी के क्षेत्रीय कार्यालय के बाहर सैकड़ों छात्र आंदोलन कर रहे हैं.
जहां ये दफ़्तर है, वो क्षेत्र फूलपुर संसदीय सीट के ही अंतर्गत आता है. यही नहीं, इलाहाबाद में छात्रों की एक बड़ी संख्या रहती है और इनमें से अधिकांश इसी संसदीय क्षेत्र के हैं जहां उप-चुनाव हो रहे हैं.

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छात्रों में गुस्सा
बीबीसी से बातचीत में आंदोलन कर रहे छात्रों के भीतर बेहद ग़ुस्सा दिखा. चयन आयोग में हो रही कथित धांधली के चलते अपने साथ हो रहे अन्याय को लेकर ये छात्र बातें करते-करते रो पड़ते हैं.
धरने पर तीन दिन से लगातार बैठी दीपिका कहने लगीं, "मैं अपने घर से बाहर सिर्फ़ कोचिंग या कॉलेज ही जाती हूं लेकिन तीन दिन से यहां रात-दिन बैठी हूं ताकि हमारी सोई हुई सरकार जग जाए. लेकिन यहां चुनाव भी हो रहा है, बावजूद इसके न तो सत्ताधारी दल का कोई व्यक्ति हमसे मिलने आया और न ही किसी अन्य राजनीतिक दल का."
दीपिका जब तक अपनी बात ख़त्म कर पातीं, तमाम छात्र-छात्राएं एक साथ चिल्ला पड़ते हैं, "चुनाव में तो हम इन्हें दिखा देंगे. हम नोटा को जिताएंगे."
इलाहाबाद में वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश मिश्र कहते हैं कि यहां ज़्यादातर छात्र दूसरे शहरों से आए हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ये सब यहां मतदाता नहीं हैं, "बहुत से छात्र ऐसे भी हैं जिनके घर हैं या फिर कुछ छात्र कई साल से पढ़ाई या तैयारी कर रहे हैं तो उन लोगों ने अपने को मतदाता के तौर पर यहीं दर्ज करा लिया है. इसलिए इनकी नाराज़गी को इतना हल्के में भी लेना ठीक नहीं है."

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अखिलेश मिश्र कहते हैं कि ऐसा कोई आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन छात्रों की संख्या गांव-शहर मिलाकर लाखों में है और इनका रुझान चुनावी नतीजों में उलट-फेर करने की भी ताक़त रखता है.
वो कहते हैं, "लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में तो सीमित छात्र बैठते हैं लेकिन एसएससी की परीक्षाओं में छात्रों की संख्या बहुत ज़्यादा है, ख़ासकर गांवों में भी है."
इलाहाबाद में न सिर्फ़ प्रतियोगी छात्र, बल्कि विश्वविद्यालय के छात्र भी पिछले काफी समय से विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली से बेहद नाराज़ हैं. पिछले दिनों छात्रों ने सीधे तौर पर ये मांग कर दी थी कि यदि वाइस चांसलर को उप-चुनाव तक हटाया नहीं गया तो सभी छात्र सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ मतदान करेंगे.
दिलचस्प बात ये है कि इन छात्रों में बीजेपी से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुड़े छात्र भी शामिल हैं.
शिक्षा मित्रों में नाराज़गी
वहीं, दूसरी ओर पिछले दिनों शिक्षा मित्रों की नाराज़गी का मुद्दा भी उप-चुनाव में खुलकर तो नहीं दिखा लेकिन जानकार बताते हैं कि ऐसा नहीं है कि शिक्षा मित्र चुप्पी साधकर बैठ गए हैं.
फूलपुर और गोरखपुर दोनों ही जगहों पर शिक्षा मित्रों की तादाद हज़ारों में है.
गोरखपुर के रहने वाले एक व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता गौरव दुबे कहते हैं, "शिक्षा मित्र, प्रतियोगी छात्र, यूपी बोर्ड के छात्र, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ये सब ऐसे हैं जो खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं, लेकिन मौजूदा सरकार से इनकी नाराज़गी और चुप्पी चुनाव में गेमचेंजर साबित हो जाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं."

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गोरखपुर से कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. सुरहिता करीम भी छात्रों के मुद्दों को काफी अहम मानती हैं. हालांकि वो ये भी स्वीकार करती हैं कि युवा और छात्र किसी भी राजनीतिक दल से ख़ुश नहीं हैं.
डॉक्टर करीम कहती हैं, "रोज़गार की जो स्थिति है और बेरोज़गारों का जो इतना सरकारी मज़ाक उड़ाया जा रहा है, निश्चित तौर पर वो हैरान करने वाला है. छात्र जीवन में राजनीतिक दलों के एक विरोध की प्रवृत्ति वैसे भी होती है लेकिन हमने छात्रों से मिलकर उनकी समस्याओं से अपनी सहमति जताई है और अपना समर्थन दिया है."
बहरहाल, छात्रों का एक बड़ा वर्ग अभी भी योगी और मोदी की कार्यशैली का प्रशंसक बना हुआ है. अब देखना ये है कि चुनावी ऊंट किस करवट बैठता है.
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