लालू और बीजेपी के लिए क्यों नाक की लड़ाई है अररिया उपचुनाव

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, अररिया से बीबीसी हिंदी के लिए
अररिया लोकसभा उपचुनाव के प्रचार का शुक्रवार को आखिरी दिन था. कद्दावर राजद नेता तस्लीमुद्दीन के निधन से खाली हुई सीट पर यहां उपचुनाव हो रहा है.
यह पक्ष-विपक्ष के लिए अहम सीट बन गई है. जहां एक ओर राजद इसे फिर से जीतकर यह दिखाना चाह रही है कि वह राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जेल जाने से कमज़ोर नहीं हुई है. वहीं भाजपा इसे वापस एनडीए की झोली में डालकर 2014 के मोदी लहर में भी मिली हार की भारपाई की कोशिशों में है.
साथ ही यह उपचुनाव इस कारण भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बीते साल जुलाई में बिहार में बदले सत्ता समीकरण के बाद यह पहला चुनाव है. इस उपचुनाव में अररिया के साथ-साथ जहानाबाद और भभुआ विधानसभा सीटों पर भी चुनाव हो रहे हैं.

अररिया शहर हो या इसके ग्रामीण या कस्बाई इलाके, हर जगह पहले की तरह चुनावी रंग अब दिखाई नहीं देता. बैनर-पोस्टर, झंडे और दीवार पर लिखे नारे न के बराबर ही दिखते हैं. प्रचार गाड़ियां भी इक्का-दुक्का ही नजर आती हैं.
इस सीट पर मुख्य मुकाबला सीमांचल के गांधी कहे जाने वाले दिवंगत मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के बेटे और राजद प्रत्याशी सरफ़राज़ आलम और भाजपा उम्मीदवार प्रदीप सिंह के बीच माना जा रहा है. हालांकि पप्पू यादव की पार्टी भी चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की पूरी कोशिश कर रही है.
मुस्लिम बहुल क्षेत्र
अररिया एक मुस्लिम बहुल ज़िला है जिसमें 40 फ़ीसदी से अधिक आबादी मुसलमानों की है. रानीगंज ब्लॉक के रघुनाथपुर के मसूद आलम के मुताबिक इलाके के मुसलमानों की राय है कि राजद का समर्थन करना है. इसकी ये वजह बताते हुए वो कहते हैं, ''तस्लीमुद्दीन ने हमारे हक़ में अच्छे काम किए. उन्होंने विकास के कई काम किए. सबसे बड़ी बात तो यह है कि लालू यादव में फ़िरका-फ़साद नहीं है. वे दोनों धर्म के लोगों को साथ लेकर चलते हैं.''

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बात-चीत में आम तौर पर पूरे इलाके में मुसलमानों की यही राय सामने आती है, हालांकि मुस्लिमों का यह भी कहना है कि 2014 के चुनाव में जब नीतीश कुमार की पार्टी ने भाजपा से अलग हटकर चुनाव लड़ा था तो उन्हें मुस्लिमों के एक हिस्से का समर्थन मिला था. लेकिन इस चुनाव में नीतीश के कारण मुस्लिमों का समर्थन भाजपा को मिलना मुश्किल दिखाई दे रहा है.
मगर ऐसे में पेशे से शिक्षक उमर फ़ारुख़ एक दूसरे पहलू की ओर इशारा करते हैं, ''अभी दोनों गठबंधन मुस्लिमों का समर्थन मिलने या न मिलने को लेकर इत्मीनान हैं. ऐसे में इनका ध्यान मुसलमानों की समस्याओं या मुद्दों पर नहीं है. हर पार्टी का ध्यान ग़ैर-मुस्लिमों पर है.''
बीते दिनों केंद्र सरकार ने मुसलमानों के एक तबके में मौजूद तीन तलाक़ की प्रथा को रोकने के लिए संसद में एक नया क़ानून पर पेश किया था. कहा जा रहा है ऐसा वह मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कर रही है.

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क्या इस पहल से मुस्लिम महिलाओं का समर्थन भाजपा को मिलेगा? इस सवाल के जवाब में दरक्षा नाज़ कहती हैं, ''इस क़ानून में कमी है. पहले का जो रिवाज़ है उससे ये अलग है, इसलिए ये अच्छा नहीं है. सरकार कह रही है वो वी तीन तलाक़ देने वालों को जेल भेजेगी, यह अच्छी बात नहीं है.''
मांझी फैक्टर
यह लोकसभा क्षेत्र पहले दलितों के आरक्षित हुआ करता था. इलाके के दलितों में मुसहर समुदाय की भी अच्छी आबादी है और वे भी हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं. यह सुमदाय बीते कुछ समय से भाजपा का समर्थक तबका माना जाता रहा है.
लेकिन कुछ दिनों पहले एनडीए छोड़ महागठबंधन के साथ आने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के कारण स्थिति बदलने के संकेत मिल रहे हैं. जैसा कि कजरा गांव के युवा मंटू कुमार कहते हैं, ''इस बार अगर मांझी लालटेन के साथ आए हैं तो वोट लालटेन में ही जाएगा. दलितों के लिए उन्होंने काम भी किया और उनकी सोच भी अच्छी है.''
हालांकि इलाके में घूमने के दौरान यह बात भी सामने आती है कि मुसहर सुमदाय में कई लोगों को यह भी नहीं पता कि जीतनराम मांझी अब महागठबंधन के साथ हैं.
'माई' समीकरण

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मध्यवर्गीय जातियों की बात करें तो यहां यादव जाति का वोट भी निर्णायक माना जाता है. राजद की पूरी कोशिश है कि वह अपने कथित 'माई' यानी मुस्लिम-यादव समीकरण को एकजुट रखे. लालू यादव के जेल में होने से उपजी सहानुभति से यह गठजोड़ पहले के मुकाबले ज़्यादा मज़बूत दिखता भी है. हालांकि यादवों के युवा तबके का थोड़ा झुकाव भाजपा की ओर भी है.
जो एक और तबका अररिया में अहम है वो है अति पिछड़ा वर्ग में आने वाली जातियां. इनका बड़ा समर्थन हाल के चुनावों में भाजपा को मिला है और इस बार भी ऐसा ही दिखता नज़र आ रहा है. जैसा कि तामगंज के पशुपति गुप्ता दावा करते हैं, ''हम लोग जितना भी पचफोरना (अति पिछड़ी जातियां) हैं, वह सब बीजेपी माइंडेड हैं. हमलोग जनसंघ के ज़माने से बीजेपी के साथ हैं.''
साथ ही तामगंज और दूसरे इलाके के अति पिछड़ा समुदाय से आने वाले भाजपा समर्थक तबके का ये भी कहना है कि वे मोदी सरकार के बीते चार साल के कामों से भी खुश हैं. इस दौरान भाजपा के प्रति उनका समर्थन बढ़ा है. वे नोटबंदी, जीएसटी, कौशल विकास योजना, काला धन वापसी आदि को मोदी सरकार के अच्छे कामों के रूप में गिनाते हैं.

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सब ने झोंकी ताकत
सीट की अहमियत को देखते हुए दोनों गठबंधनों के सभी बड़े नेताओं ने इलाके में चुनाव प्रचार किया है. इनमें नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, सुशील मोदी, शरद यादव और जीतनराम मांझी जैसे बड़े नेता शामिल हैं.
उम्मीदवारों की बात करें तो राजद उम्मीदवार सरफ़राज़ आलम ने ठीक चुनाव से पहले जोकीहाट के विधायक पद से इस्तीफा देकर जदयू छोड़ राजद का दामन थामा. जबकि भाजपा उम्मीदवार प्रदीप सिंह अररिया से पहले भी भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज कर चुके हैं. इस लोकसभा के बाकी के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से अभी दो भाजपा के पास हैं, जबकि एक-एक पर राजद, जदयू और कांग्रेस का कब्जा है.
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